नवरात्रि में कन्या पूजन: नवरात्रि हिन्दू धर्म के सबसे बड़े और पावन पर्वों में से एक है। यह पर्व वर्ष में दो बार – चैत्र और शारदीय नवरात्रि – मनाया जाता है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि के अंतिम दिन या अष्टमी-नवमी तिथि को कन्या पूजन (कुमारी पूजन) का विशेष महत्व होता है। इसे दुर्गा पूजा का सबसे पवित्र अनुष्ठान माना जाता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि कन्या पूजन की विधि, महत्व और इतिहास क्या है।

कन्या पूजन का इतिहास और पौराणिक आधार:
कन्या पूजन का उल्लेख प्राचीन धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में मिलता है। मान्यता है कि मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर देवताओं और ऋषियों को पुनः निर्भय जीवन प्रदान किया। इस उपलक्ष्य में देवी की शक्ति स्वरूपा कन्याओं की पूजा का विधान शुरू हुआ।
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मार्कण्डेय पुराण में कहा गया है कि “कन्याएं स्वयं दुर्गा का अंश होती हैं।”
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महाभारत में भी वर्णन मिलता है कि पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान देवी की आराधना की थी और कन्या पूजन कर विजय प्राप्त की।
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लोक मान्यताओं के अनुसार, कन्या ही आदिशक्ति का जीता-जागता रूप हैं। इसीलिए नवरात्रि में उनके चरणों का पूजन कर आशीर्वाद लिया जाता है।
कन्या पूजन का महत्व:
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मां दुर्गा का आशीर्वाद – कन्या पूजन करने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और साधक को सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और शक्ति का आशीर्वाद देती हैं।
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समृद्धि और सौभाग्य – धार्मिक मान्यता है कि कन्या पूजन से घर में धन, वैभव और सकारात्मक ऊर्जा का आगमन होता है।
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कन्याओं में देवी का वास – नव वर्ष, शक्ति और भविष्य का प्रतीक कन्याओं को माना जाता है। उनके चरण पूजन से पुण्य की प्राप्ति होती है।
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आध्यात्मिक संतुलन – यह अनुष्ठान स्त्री शक्ति का सम्मान और संरक्षण करने का संदेश देता है।
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पुण्य की प्राप्ति – कन्या पूजन से मनुष्य अपने पापों का क्षय कर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।
कन्या पूजन की विधि:
नवरात्रि की अष्टमी या नवमी तिथि को प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें और संकल्प लें।
1. कन्याओं का आमंत्रण
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2 वर्ष से लेकर 10 वर्ष की आयु तक की कन्याओं को पूजन के लिए बुलाया जाता है।
कन्या पूजन में कन्याओं की संख्या का नियम इस प्रकार है:
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पारंपरिक रूप से 9 कन्याओं को आमंत्रित किया जाता है, क्योंकि नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूप (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री) की पूजा होती है।
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हर कन्या को देवी का रूप मानकर पूजना शुभ माना जाता है।
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आयु: लगभग 2 साल से 10 साल तक की बालिकाएं।
💡 कभी-कभी छोटे गांवों या घरों में कन्याओं की उपलब्धता के अनुसार 5–7 कन्याओं को भी बुला लिया जाता है, लेकिन आदर्श और पूर्ण पूजन के लिए 9 कन्याओं का होना अनिवार्य माना जाता है।
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इनके साथ एक छोटे बालक को भी आमंत्रित किया जाता है, जिसे “लांगुर” कहते हैं।
👉 लांगुर का मतलब –
जब नवरात्रि की अष्टमी या नवमी तिथि पर कन्याओं को आमंत्रित करके पूजन किया जाता है, तो उनके साथ एक छोटे लड़के को भी बुलाया जाता है। इसी छोटे बालक को लांगुर कहा जाता है।
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परंपरा के अनुसार लांगुर की आयु भी लगभग 2 साल से 10 साल तक होनी चाहिए।
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लांगुर को कन्याओं के साथ बिठाकर वही चरण पूजन, तिलक, भोजन और दक्षिणा दी जाती है।
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यह प्रथा इसलिए है क्योंकि मान्यता है कि कन्याएं मां दुर्गा के नौ रूप हैं और लांगुर भैरव बाबा का प्रतीक माना जाता है।
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मान्यता है कि भैरव बाबा मां दुर्गा के रक्षक हैं, इसलिए कन्याओं के साथ एक बालक को बिठाना अनिवार्य माना गया है।
2. पूजन स्थल की तैयारी
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घर में पूजा के स्थान को स्वच्छ करें और वहां लाल या पीले वस्त्र बिछाएं।
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मां दुर्गा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें और दीप प्रज्वलित करें।
3. चरण पूजन और आरती
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सबसे पहले कन्याओं के चरण धोकर उन्हें आसन पर बैठाएं।
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उनके माथे पर रोली, चंदन और अक्षत का तिलक लगाएं।
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उनकी आरती करें और दुर्गा मंत्र का जाप करें।
4. भोजन प्रसाद
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कन्याओं को घर पर बने सात्विक भोजन का भोग लगाया जाता है।
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सामान्यत: पूरी, चना और सूजी का हलवा परोसा जाता है।
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भोजन के बाद उन्हें दक्षिणा, फल और उपहार दिए जाते हैं।
5. विदाई
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अंत में कन्याओं का आशीर्वाद लेकर सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है।
कन्या पूजन में क्या करें और क्या न करें:
✔ कन्याओं को स्नेह और सम्मान के साथ आमंत्रित करें।
✔ शुद्ध सात्विक भोजन ही परोसें।
✔ पूजा के दौरान सच्चे मन से मां दुर्गा का ध्यान करें।
✘ कन्याओं का अपमान न करें, न ही उन्हें हल्के में लें।
✘ अधूरा भोजन या अशुद्ध वस्तुएं परोसना अनुचित माना जाता है।
सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश:
कन्या पूजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह समाज को यह संदेश भी देता है कि स्त्री शक्ति का सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। बालिकाएं ही भविष्य की जननी हैं। नवरात्रि का यह अनुष्ठान हमें स्मरण कराता है कि नारी केवल पूजनीय ही नहीं, बल्कि समाज की शक्ति और आधार भी है।
नवरात्रि में कन्या पूजन आदिशक्ति मां दुर्गा को प्रसन्न करने का सबसे पवित्र और सरल मार्ग है। यह अनुष्ठान हमें नारी शक्ति के महत्व को समझने और सम्मानित करने की प्रेरणा देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कन्या पूजन करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। अतः हर श्रद्धालु को चाहिए कि नवरात्रि पर श्रद्धा-भक्ति से कन्या पूजन करे और मां दुर्गा के आशीर्वाद से जीवन को सफल बनाए।
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