Shiva Tandava Stotram Lyrics and Meaning: शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव की महिमा का अद्भुत और ऊर्जावान स्तुति-गीत है। यह स्तोत्र शक्ति, भक्ति और अद्वितीय काव्य सौंदर्य का संगम है। मान्यता है कि इसकी रचना लंका के राजा रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए की थी। यह स्तोत्र शिव के रौद्र और तांडव रूप का दिव्य वर्णन करता है, जिसमें उनकी जटाओं, गंगा, डमरू और तीसरे नेत्र की अद्भुत छवि उभरती है।

शिव तांडव स्तोत्र का महत्व:
शिव तांडव स्तोत्र केवल एक भजन नहीं, बल्कि संस्कृत काव्य की अनुपम रचना है। इसमें लय, गति और ध्वनि का ऐसा सामंजस्य है कि इसे सुनते ही ऊर्जा और उत्साह का अनुभव होता है।
यह स्तोत्र भगवान शिव के नटराज रूप का वर्णन करता है, जिसमें वे सृष्टि के निर्माण और संहार के प्रतीक रूप में तांडव करते हैं। यह रूप विशेष रूप से दक्षिण भारत के चिदंबरम नटराज मंदिर में पूजित है।
शिव तांडव स्तोत्र कब गाएं?
शिव तांडव स्तोत्र का पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन कुछ विशेष अवसरों पर इसका महत्व अधिक होता है:
1. महाशिवरात्रि
महाशिवरात्रि की रात्रि में जागरण के दौरान शिव तांडव का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।
2. सोमवार:
सोमवार भगवान शिव का प्रिय दिन है। इस दिन प्रातः या संध्या समय इसका पाठ करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
3. प्रदोष व्रत:
प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में शिव पूजा के साथ शिव तांडव गाना विशेष फलदायी है।
4. ध्यान और साधना के समय:
जो लोग ध्यान या योग साधना करते हैं, वे ऊर्जा और एकाग्रता के लिए इसका पाठ करते हैं।
शिव तांडव स्तोत्र की रचना रावण ने भगवान शिव की आराधना में की थी। इसमें कुल 16 मुख्य श्लोक और एक फलश्रुति (अंतिम श्लोक) है। नीचे संपूर्ण श्लोक और उनका सरल हिंदी अर्थ दिया जा रहा है।
(1)
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥
🔹 अर्थ: शिवजी की जटाओं से गंगा प्रवाहित हो रही है, गले में सर्पों की माला है और डमरू की ध्वनि के साथ वे तांडव कर रहे हैं — वे हमारा कल्याण करें।
(2)
जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥
🔹 अर्थ: शिवजी की जटाओं में गंगा लहरा रही है, ललाट में अग्नि प्रज्वलित है और मस्तक पर चंद्र सुशोभित है — ऐसे शिव में मेरी निरंतर भक्ति रहे।
(3)
धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥
🔹 अर्थ: जो पार्वतीजी के प्रिय हैं और जिनकी कृपा से कठिन संकट भी दूर हो जाते हैं — उन दिगंबर शिव में मेरा मन रम जाए।
(4)
जटाभुजंगपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥
🔹 अर्थ: शिवजी के शरीर पर भस्म और सर्पों का आभूषण शोभायमान है — वे अद्भुत स्वरूप वाले हैं, मेरा मन उनमें आनंद पाए।
(5)
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥
🔹 अर्थ: इंद्र आदि देवता जिनके चरणों में पुष्प अर्पित करते हैं, जटाओं में सर्पों की माला धारण किए वे शिव हमें समृद्धि दें।
(6)
ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः॥
🔹 अर्थ: जिनके ललाट की अग्नि से कामदेव भस्म हुए, और जिनके सिर पर चंद्रमा सुशोभित है — वे महाकपालि शिव हमें कल्याण दें।
(7)
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥
🔹 अर्थ: जिनके भाल की अग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया और जो त्रिनेत्रधारी हैं — उन शिव में मेरी प्रीति बनी रहे।
(8)
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः॥
🔹 अर्थ: जो अंधकार को दूर करने वाले और गंगा को धारण करने वाले हैं — वे जगत के धारक शिव हमें ऐश्वर्य प्रदान करें।
📜 (9)
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥
🔹 अर्थ: मैं उन शिव की उपासना करता हूँ जिन्होंने कामदेव, त्रिपुर, संसार के बंधन, यज्ञ, गजासुर, अंधकासुर और यमराज तक का विनाश किया। वे सभी बुराइयों का नाश करने वाले हैं।
(10)
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥
🔹 अर्थ: मैं उन शिव को नमन करता हूँ जो मंगलमय हैं और जिन्होंने कामदेव, त्रिपुर, संसारिक दुखों, यज्ञ, गजासुर और अंधकासुर का अंत किया।
(11)
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमस्पुरत्
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥
🔹 अर्थ: शिवजी के ललाट की अग्नि प्रज्वलित है, सर्प लहरा रहे हैं और मृदंग की ध्वनि के साथ वे प्रचंड तांडव कर रहे हैं — ऐसे शिव की जय हो।
(12)
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्
गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेंद्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे॥
🔹 अर्थ: जो पत्थर और रत्न, मित्र और शत्रु, तिनके और कमल, राजा और प्रजा को समान दृष्टि से देखते हैं — ऐसे सदाशिव की मैं भक्ति करूँ।
(13)
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोचनोल्लसल्ललाटफाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥
🔹 अर्थ: कब मैं गंगा तट पर निवास करते हुए, हाथ जोड़कर “शिव” मंत्र का जाप करते हुए, मुक्त मन से आनंद प्राप्त करूँगा?
(14)
निलिम्पनाथनागरीकदम्बमौलिमल्लिका
निगुम्फनिर्भरक्षरन्मधूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनीमहर्निशं
परिश्रयप्रभाकरप्रभामुखेन्दुरः शिवः॥
🔹 अर्थ: जिनके मस्तक पर सुगंधित पुष्प और चंद्रमा सुशोभित हैं, वे शिव दिन-रात हमारे मन को आनंद दें।
(15)
प्रचण्डवाडवानलप्रभाशुभप्रचारिणी
महाष्टसिद्धिकामिनीजनावहूतजल्पना।
विमुक्तवामलोचनाविवाहकालिकध्वनिः
शिवेतिमन्त्रभूषणाजगत्जयाय जायताम्॥
🔹 अर्थ: शिव का मंत्र और उनका तांडव अग्नि के समान तेजस्वी है। वे सभी सिद्धियाँ देने वाले और जगत को विजय दिलाने वाले हैं।
(16)
इदं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥
🔹 अर्थ: जो व्यक्ति इस उत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, वह शुद्ध होकर भगवान शिव की भक्ति प्राप्त करता है और जीवन में कल्याण पाता है।
समापन:
शिव तांडव स्तोत्र के श्लोक 9–16 भगवान शिव की अपार शक्ति, समता भाव, करुणा और तांडव रूप का अद्भुत वर्णन करते हैं। इसका नियमित श्रद्धापूर्वक पाठ करने से आत्मबल, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
शिव तांडव स्तोत्र की विशेषताएं:
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इसमें कुल 16 श्लोक हैं।
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यह स्तोत्र छंद और लय से भरपूर है।
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उच्चारण में शक्ति और ताल का विशेष महत्व है।
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यह भय, तनाव और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में सहायक माना जाता है।
आध्यात्मिक लाभ:
शिव तांडव स्तोत्र का नियमित पाठ करने से:
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आत्मविश्वास बढ़ता है
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मन में सकारात्मक ऊर्जा आती है
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भय और बाधाएं दूर होती हैं
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मानसिक शांति मिलती है
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आध्यात्मिक उन्नति होती है
कहा जाता है कि सच्चे मन से इसका पाठ करने पर भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
पाठ करते समय ध्यान रखने योग्य बातें:
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स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।
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शांत और पवित्र स्थान पर बैठें।
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“ॐ नमः शिवाय” मंत्र से शुरुआत करें।
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शुद्ध उच्चारण का प्रयास करें।
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अंत में भगवान शिव से क्षमा याचना करें।
शिव तांडव और तांडव नृत्य:
तांडव केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि सृष्टि और संहार का प्रतीक है। जब भगवान शिव तांडव करते हैं, तो वह ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतीक होता है। यह नृत्य जीवन के परिवर्तन और नई शुरुआत का संदेश देता है।
शिव तांडव स्तोत्र भक्ति, शक्ति और काव्य का अद्भुत संगम है। इसकी रचना रावण ने भगवान शिव की आराधना में की थी। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, भक्ति और श्रद्धा से सब संभव है।
आप इसे सोमवार, प्रदोष व्रत या महाशिवरात्रि के दिन विशेष रूप से गा सकते हैं। नियमित पाठ से मानसिक शांति, साहस और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
हर हर महादेव!
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