Leh Ladakh Protest: लद्दाख की ठंडी वादियों में पिछले कई महीनों से आंदोलन की गर्मी महसूस की जा रही थी। स्थानीय लोगों की प्रमुख माँग — पूर्ण राज्य का दर्ज़ा और संविधान की छठी अनुसूची का विस्तार। इन मांगों को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक लगातार अनशन पर थे। लेकिन जब लेह शहर में बुलाए गए बंद के दौरान अचानक हालात बिगड़े, तो शांतिपूर्ण संघर्ष हिंसक हो गया।
प्रदर्शनकारियों ने बीजेपी कार्यालय और हिल काउंसिल मुख्यालय पर हमला कर दिया। पत्थरबाज़ी, आगज़नी और वाहनों को फूँक देने जैसी घटनाओं ने पूरे इलाके को दहला दिया। पुलिस और अर्धसैनिक बलों को हालात काबू करने के लिए लाठीचार्ज, आंसू गैस और यहाँ तक कि फायरिंग करनी पड़ी। इस भीषण हिंसा में कम से कम 4 लोग मारे गए और 30 से अधिक घायल हुए।
आंदोलन की जड़ें: क्यों उठा राज्य दर्ज़े का सवाल? Leh Ladakh Protest

लद्दाख को 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया था। उस समय स्थानीय लोगों को लगा कि यह उनके लिए विकास का नया अवसर बनेगा, लेकिन कुछ ही वर्षों में असंतोष गहराने लगा।
लद्दाखी समाज का कहना है कि बिना विधानसभा और विधायिका के वे पूरी तरह दिल्ली के आदेशों पर निर्भर हैं। स्थानीय संसाधनों और सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा खतरे में है। इसी वजह से लोगों ने माँग की कि लद्दाख को न केवल राज्य का दर्ज़ा मिले बल्कि इसे छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक संरक्षण भी दिया जाए।
छठी अनुसूची पूर्वोत्तर राज्यों जैसे असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा की जनजातीय आबादी को स्वायत्त शासन का अधिकार देती है। लद्दाखी प्रतिनिधि चाहते हैं कि उनकी भी पहचान और संसाधन इसी ढांचे में सुरक्षित रहें।
भूख हड़ताल से बंद तक: बढ़ता तनाव
10 सितंबर से लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के समर्थन से कई लोग भूख हड़ताल पर बैठे थे। सोनम वांगचुक भी इस आंदोलन का चेहरा बने। लगभग 15 दिन तक उन्होंने अनशन जारी रखा।
मंगलवार को अनशन पर बैठे 72 वर्षीय त्सेरिंग अंगचुक और 62 वर्षीय ताशी डोल्मा की हालत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इसके बाद LAB की युवा शाखा ने लेह बंद का आह्वान किया। यही बंद धीरे-धीरे हिंसक हो गया।
हिंसा कैसे भड़की?
सुबह से ही लेह शहर के बाजार बंद थे। लोग बड़ी संख्या में NDS स्मारक मैदान में इकट्ठा हुए और शांतिपूर्ण तरीके से नारे लगाते हुए शहर की सड़कों पर मार्च निकाला।
स्थिति तब बिगड़ी जब कुछ प्रदर्शनकारी बीजेपी कार्यालय और हिल काउंसिल मुख्यालय की तरफ बढ़े। वहाँ पथराव हुआ, दफ्तर के कागज़ात और फर्नीचर जला दिए गए, और कई गाड़ियों में आग लगा दी गई। भीड़ में से कुछ ने पुलिस और सीआरपीएफ की गाड़ियों पर भी हमला किया।
कानून-व्यवस्था बिगड़ती देख पुलिस ने पहले लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया, लेकिन हालात बेकाबू रहे तो फायरिंग करनी पड़ी। कई घंटों की झड़पों के बाद स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सका।
मौत और घायल: भारी कीमत चुकानी पड़ी
इस हिंसा की कीमत बेहद भारी रही।
- 4 लोग मारे गए।
- 30 से ज्यादा घायल हुए।
- कई पुलिसकर्मी और अर्धसैनिक बल के जवान भी पथराव और झड़पों में घायल हो गए।
हालात गंभीर होते देख प्रशासन ने भारतीय न्याय संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू कर दी। अब पाँच या उससे अधिक लोगों का एक जगह इकट्ठा होना मना है।
Violent protests erupted outside the BJP office in Leh town during a shutdown call issued by the Leh Apex Body in the Union Territory of #Ladakh over the Centre’s delay to hold “result-oriented” talks over several long pending demands, which include granting Statehood and Sixth… pic.twitter.com/nyV0ATvpXv
— The Hindu (@the_hindu) September 24, 2025
सोनम वांगचुक का टूटा अनशन
लेह में हिंसा और खून-खराबे की खबर मिलते ही सोनम वांगचुक ने अपना अनशन खत्म कर दिया। उन्होंने कहा:
“मैंने यह आंदोलन शांति से चलाया, लेकिन हिंसा से हमारी माँगें कमजोर होंगी। युवाओं से अपील है कि वे संयम बनाए रखें और संघर्ष को शांतिपूर्ण रखें।”
उनका मानना है कि हिंसा की जड़ युवाओं की हताशा और निराशा है। शांतिपूर्ण आंदोलन से कोई ठोस नतीजा न निकलने के कारण युवाओं ने उग्र रूप अपना लिया।
राजनीति में घमासान
हिंसा के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी शुरू हो गए। बीजेपी के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने आरोप लगाया कि हिंसा में शामिल लोगों को कांग्रेस के स्थानीय पार्षद ने उकसाया। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस पार्षद को भीड़ का नेतृत्व करते और पत्थरबाजी करते हुए देखा गया।
वहीं, कांग्रेस और आंदोलनकारी इस आरोप को खारिज करते हुए कहते हैं कि सरकार असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए विपक्ष पर दोष मढ़ रही है।
सरकार की सख्ती और साजिश का दावा
लद्दाख के उपराज्यपाल (LG) ने इस हिंसा को “साजिश” बताया और कहा कि इसमें बाहरी ताकतों का हाथ हो सकता है। उन्होंने साफ किया कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी और किसी को भी शांति भंग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
सरकार ने सुरक्षा बलों को चौकसी बढ़ाने और संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त जवान तैनात करने का निर्देश दिया है।
आगे क्या? वार्ता की उम्मीद
अब सबकी नजरें 6 अक्तूबर को प्रस्तावित गृह मंत्रालय और लद्दाखी प्रतिनिधियों की बैठक पर टिकी हैं। इस बैठक में लेह एपेक्स बॉडी और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस दोनों शामिल होंगे।
पिछले चार साल से ये दोनों संगठन संयुक्त रूप से राज्य दर्ज़ा और छठी अनुसूची की माँग कर रहे हैं। कई दौर की बातचीत पहले भी हो चुकी है, लेकिन कोई ठोस हल नहीं निकल पाया। अब देखना यह है कि 6 अक्तूबर की वार्ता लद्दाख की किस्मत बदल पाती है या नहीं।
लद्दाख का भविष्य किस दिशा में?
लेह की हिंसा ने साफ कर दिया है कि लोगों की हताशा अब सीमा पार कर चुकी है। अगर सरकार ने जल्द और ठोस कदम नहीं उठाए तो यह आंदोलन और बड़ा रूप ले सकता है।
लद्दाख न केवल सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत-चीन सीमा पर इसकी रणनीतिक अहमियत भी है। यहाँ अस्थिरता देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकती है।
इसलिए अब केंद्र सरकार और स्थानीय नेतृत्व के बीच संवाद ही एकमात्र रास्ता है। हिंसा ने भले ही आंदोलन की चमक धुंधली कर दी हो, लेकिन इसकी मूल माँगें अब भी जस की तस हैं।
लद्दाख की जनता कह रही है: हमें पहचान चाहिए, अधिकार चाहिए और अपनी ज़मीन पर अपने फैसले का अधिकार चाहिए।
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