Is AI Reinforcing Caste Bias: हाल ही में कुछ शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह चिंता जताई है कि भारतीय संदर्भ में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) सिस्टम ऊपरी जाति के डेटा और दृष्टिकोण को प्राथमिकता देते हैं, जिससे एक नए प्रकार का डिजिटल भेदभाव उत्पन्न हो रहा है। यह सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि एआई तेजी से हमारे निर्णय लेने, शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक सेवाओं को प्रभावित कर रहा है।

आरोपों का सार:
आरोप मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर केंद्रित हैं:
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प्रशिक्षण डेटा में असंतुलन: अंग्रेजी और हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में उपलब्ध अधिकांश डिजिटल कॉन्टेंट ऊपरी जाति, शहरी, शिक्षित वर्ग द्वारा निर्मित है। एआई मॉडल इसी डेटा से सीखते हैं, इसलिए उनकी समझ और प्रतिक्रियाएं इसी वर्ग के अनुभवों व मूल्यों को दर्शाती हैं।
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सांस्कृतिक पूर्वाग्रह: भाषा मॉडल जाति-संवेदनशील संदर्भों को नहीं समझ पाते। उदाहरण के लिए, दलितों या आदिवासियों के ऐतिहासिक संघर्ष, उनकी बोलियाँ, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ एआई के डेटाबेस में पर्याप्त रूप से मौजूद नहीं हैं।
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एल्गोरिदमिक निर्णय: भर्ती, कर्ज, बीमा जैसी सेवाओं में इस्तेमाल एआई तंत्र ऐतिहासिक डेटा पर आधारित हैं, जो सामाजिक असमानताओं को दर्शाते हैं। इससे जाति आधारित भेदभाव डिजिटल रूप में पुनर्उत्पादित हो सकता है।
पूर्वाग्रह के स्रोत:
एआई में पूर्वाग्रह के मूल कारण निम्नलिखित हैं:
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डेटा का अभाव: भारत की विविध आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा डिजिटल दुनिया में अदृश्य है। दलित, आदिवासी, ग्रामीण और गरीब तबकों का डेटा बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है।
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विकास टीमों की संरचना: एआई कंपनियों में काम करने वाले अधिकांश इंजीनियर और शोधकर्ता भी अपेक्षाकृत विशेषाधिकार प्राप्त सामाजिक पृष्ठभूमि से आते हैं। इससे उनकी अचेतन पूर्वाग्रह एआई डिजाइन में शामिल हो जाती है।
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भाषा की सीमा: भारतीय भाषाओं में भी ऑनलाइन कॉन्टेंट मुख्यधारा की संस्कृति को दर्शाता है। स्थानीय बोलियाँ, लोक साहित्य, सीमांत समुदायों की अभिव्यक्तियाँ डिजिटल दुनिया में कमजोर हैं।
प्रभाव और चिंताएँ:
इस तरह के पूर्वाग्रह के गंभीर परिणाम हो सकते हैं:
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सामाजिक असमानता का स्थायीकरण: एआई सिस्टम मौजूदा सामाजिक ढाँचे को और मजबूत कर सकते हैं।
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सांस्कृतिक विविधता का क्षरण: एआई द्वारा उत्पन्न कॉन्टेंट सीमित सांस्कृतिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दे सकता है।
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भेदभावपूर्ण सेवाएँ: ऑटोमेटेड निर्णय प्रणालियाँ वंचित समूहों को सेवाओं से वंचित कर सकती हैं।
समाधान के रास्ते:
इस चुनौती से निपटने के लिए कई उपाय सुझाए गए हैं:
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विविध डेटासेट: सभी सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने वाले डेटासेट तैयार करने की आवश्यकता है।
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बहु-विषयक दृष्टिकोण: एआई विकास में सामाजिक वैज्ञानिक, नृवंशविज्ञानी और सामुदायिक कार्यकर्ताओं को शामिल करना।
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नियामक ढाँचा: सरकार द्वारा एआई पारदर्शिता और निष्पक्षता के मानक निर्धारित करना।
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स्थानीय भाषाओं में एआई: स्थानीय भाषाओं और बोलियों में एआई मॉडल विकसित करना।
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निरंतर ऑडिट: एआई सिस्टम की नियमित रूप से स्वतंत्र जाँच करना।
यह सच है कि मौजूदा एआई सिस्टम में सामाजिक पूर्वाग्रह मौजूद हैं, लेकिन यह एआई तकनीक की अपनी कमी नहीं, बल्कि मानव निर्मित डेटा और एल्गोरिदम की सीमा है। खतरा यह है कि ये पूर्वाग्रह स्वचालित रूप से बड़े पैमाने पर दोहराए जा सकते हैं। हालाँकि, एआई में ही इस समस्या के समाधान की संभावना भी निहित है।
सचेत प्रयासों से हम ऐसे निष्पक्ष एआई सिस्टम विकसित कर सकते हैं जो भारत की सामाजिक विविधता को समझें और समावेशी विकास में योगदान दें। इसके लिए तकनीकी समुदाय, नीति निर्माताओं और नागरिक समाज के बीच सहयोग आवश्यक है। एआई को केवल एक तकनीकी प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व के रूप में देखने की आवश्यकता है।
समावेशी एआई की राह में सबसे बड़ी चुनौती है ऐतिहासिक और सामाजिक संवेदनशीलता वाले डेटा का संकलन। भारत जैसे बहुलतावादी समाज में, केवल भाषाई अनुवाद पर्याप्त नहीं है; सांस्कृतिक संदर्भ और सामूहिक स्मृति को एल्गोरिदम में समेटना आवश्यक है। इसके लिए ऐसे सहभागी दृष्टिकोण की जरूरत है जहाँ सीमांत समुदाय स्वयं अपनी कथाओं और ज्ञान को डिजिटल दुनिया में ला सकें। तभी एआई एक तटस्थ टूल बन पाएगा, न कि सत्ता के मौजूदा ढाँचों को मजबूत करने वाला एक यंत्र। यह केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का डिजिटल अभियान है।
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