Haq Movie Review: फिल्में सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं होतीं, कई बार वे समाज का आईना भी बनती हैं। ऐसी ही एक फिल्म है “Haq” (2025), जो अदालत की चारदीवारी से निकलकर हमारे दिलों और दिमाग में गूंज छोड़ जाती है। निर्देशक सुपर्ण एस. वर्मा की यह फिल्म न केवल एक महिला की न्याय की लड़ाई है, बल्कि यह दिखाती है कि “हक़” का मतलब सिर्फ कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान की पुकार भी है।

कहानी की जड़ें: Haq Movie Review
कहानी की केंद्र में है शाज़िया बानो (यामी गौतम धर), एक मध्यमवर्गीय मुस्लिम महिला जो अपने पति अब्बास खान (इमरान हाशमी) से तीन तलाक के बाद खुद और अपने बच्चों के हक के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाती है। फिल्म 1980 के दशक के भारत में सेट है, जब धर्म और कानून के बीच की खाई और भी चौड़ी थी।
शाज़िया का संघर्ष सिर्फ अपने पति से नहीं है, बल्कि उस सामाजिक सोच से भी है जो यह मानती है कि महिला की जगह सिर्फ घर की चारदीवारी तक है। उसका मुक़दमा समाज के उस हिस्से को आईना दिखाता है जो “इज़्ज़त” की बात तो करता है, पर उसे बराबरी की भाषा में समझना नहीं चाहता।
अभिनय जो कहानी को जीवंत करता है:Haq Movie Review
फिल्म का सबसे बड़ा बल है इसका अभिनय।
यामी गौतम ने शाज़िया के किरदार को जी लिया है। उनकी आंखों में जो खामोशी है, वही सबसे तेज़ चीख बन जाती है। जब वे अदालत में कहती हैं – “मैं अपने बच्चों के भविष्य के लिए नहीं, अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही हूँ” – तो वह संवाद नहीं, एक स्त्री की आत्मा की आवाज़ लगती है।
इमरान हाशमी ने अब्बास खान की भूमिका में गहराई दिखाई है। वे यहाँ पारंपरिक खलनायक नहीं हैं, बल्कि एक भ्रमित इंसान हैं जो समाज के दबाव और अपनी मर्दानगी की परिभाषा में उलझा हुआ है। उनका किरदार दिखाता है कि “गलती” और “गुनाह” में फर्क होता है।
सहायक भूमिकाओं में शीबा चड्ढा, डेनिश हुसैन और राजीव गुप्ता ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। शीबा चड्ढा एक सशक्त महिला वकील के रूप में फिल्म का संतुलन बनाए रखती हैं, जबकि डेनिश हुसैन पिता के रूप में भावनाओं का स्तंभ हैं।
निर्देशन और पटकथा: Haq Movie Review
निर्देशक सुपर्ण एस. वर्मा ने एक बेहद संवेदनशील विषय को बिना उपदेशात्मक बनाए प्रस्तुत किया है। वे धर्म या राजनीति का पक्ष नहीं लेते, बल्कि इंसानियत का साथ देते हैं। फिल्म की रफ्तार धीमी है, लेकिन यह धीमापन कहानी की गंभीरता को उभारता है।
पटकथा लेखक ने 1980 के दशक की बनावट, भाषा और माहौल को बेहद प्रामाणिक ढंग से पेश किया है। लखनऊ और भोपाल की गलियों, पुराने अदालतों और घरों की बनावट से फिल्म एक असली दौर में जीती हुई लगती है।
तकनीकी पहलू: Haq Movie Review
सिनेमैटोग्राफी फिल्म की आत्मा है। हल्के भूरे, नीले और सेपिया टोन में शूट किए गए फ्रेम्स उस समय की सामाजिक ऊहापोह को उजागर करते हैं। अदालत के दृश्यों में कैमरा स्थिर रहता है, जिससे हर संवाद का वजन बढ़ जाता है।
संगीत और पृष्ठभूमि स्कोर बेहद प्रभावी है। कोई भी गाना कहानी को रोकता नहीं, बल्कि आगे बढ़ाता है। खासकर शीर्षक ट्रैक “Mera Haq Mujhe Do” सुनने के बाद देर तक मन में गूंजता रहता है।
एडिटिंग थोड़ी और सटीक हो सकती थी। बीच के कुछ हिस्से, खासकर पारिवारिक झगड़ों और सामाजिक बैठकों वाले दृश्य, थोड़े लंबे खिंचते हैं। लेकिन अंतिम 30 मिनट फिल्म को ऊँचाई पर ले जाते हैं।
‘Haq’ Hits Theatres
“I really liked the movie; its story is amazing”, says a moviegoer.
“The current government has done a lot of work for the people”, says another moviegoer.
Watch this ground report from Lucknow. pic.twitter.com/fRUUZB5oZZ
— TIMES NOW (@TimesNow) November 7, 2025
संवाद और लेखन:
फिल्म के संवाद सीधे दिल में उतरते हैं।
जैसे जब शाज़िया कहती है – “खुदा ने मुझे आवाज़ दी है, चुप रहने का हुक्म नहीं।”
या जब वकील बेला कहती हैं – “कानून और ईमान जब एक दिशा में चलते हैं, तब ही इंसाफ़ होता है।”
इन संवादों में ना सिर्फ भावनात्मक गहराई है, बल्कि एक सामाजिक चेतना भी है। लेखक ने महिला सशक्तिकरण को नारे की तरह नहीं, बल्कि जीवन की जरूरत के रूप में दिखाया है।
फिल्म का संदेश:
“Haq” यह याद दिलाती है कि किसी भी समाज की असली ताकत उसके कानून में नहीं, बल्कि उस कानून को मानने वाले इंसानों में होती है। यह फिल्म हर उस महिला की कहानी है जो चुप रहना नहीं चाहती। यह बताती है कि न्याय की लड़ाई में सबसे बड़ा हथियार होता है – सच्चाई में विश्वास।
फिल्म यह भी दिखाती है कि धर्म, परंपरा और इंसानियत एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। असली संघर्ष उन लोगों से है जो धर्म को इंसान से बड़ा बना देते हैं।
दर्शक अनुभव:
यह फिल्म उन दर्शकों के लिए है जो सिनेमा में सिर्फ मसाला नहीं, विचार देखना चाहते हैं। यह फिल्म भावनाओं से भरी है, पर अतिनाटकीय नहीं। इसे देखते हुए कई बार आंखें नम होती हैं, और कई बार मन गर्व से भर जाता है।
थिएटर से निकलते वक्त दिल में एक सवाल रह जाता है – “क्या आज भी किसी शाज़िया को अपने हक के लिए इतनी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है?” और शायद यही फिल्म की सबसे बड़ी जीत है।
“Haq” ऐसी फिल्म है जो आपको सोचने पर मजबूर करती है। यह सिर्फ महिला अधिकारों की कहानी नहीं, बल्कि इंसान होने के अर्थ पर सवाल है।
यामी गौतम का करियर-परफॉर्मेंस, इमरान हाशमी की संवेदनशीलता, और सुपर्ण वर्मा का संतुलित निर्देशन इसे साल की सबसे गंभीर और प्रभावशाली फिल्मों में शामिल करता है।
रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐☆ (4/5)
देखने लायक? बिल्कुल।
क्योंकि “हक़” की लड़ाई सिर्फ शाज़िया की नहीं, हर उस इंसान की है जो अन्याय के सामने सिर झुकाना नहीं चाहता।
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