Galgotias University robot controversy: Greater Noida स्थित Galgotias University हाल ही में एक बड़े टेक इवेंट में रोबोट डॉग को लेकर विवाद में घिर गया। AI Impact Summit, नई दिल्ली में विश्वविद्यालय के स्टॉल पर प्रदर्शित रोबोटिक डॉग “Orion” को लेकर दावा किया गया कि इसे यूनिवर्सिटी के Centre of Excellence ने विकसित किया है। बाद में यह सामने आया कि यह डिवाइस चीन की कंपनी Unitree Robotics का व्यावसायिक मॉडल Unitree Go2 है।
So Galgotia university purchased a commercially available robot worth ₹2.5 lakhs, called it their own and passed it off in the Delhi AI Summit as a part of their 350 crore AI ecosystem 😭😭
I literally have no words left.
pic.twitter.com/tTozvotO5m— Roshan Rai (@RoshanKrRaii) February 17, 2026
इस पूरे घटनाक्रम के बाद यूनिवर्सिटी ने सार्वजनिक रूप से माफ़ी जारी की और अपनी प्रतिनिधि Neha Singh को “ill-informed” (अपर्याप्त जानकारी वाली) बताया। आइए समझते हैं पूरा मामला और रोबोट की तकनीकी पृष्ठभूमि ।
क्या हुआ AI Impact Summit में?
नई दिल्ली में आयोजित AI Impact Summit के दौरान, DD News को दिए एक इंटरव्यू में Neha Singh ने कहा कि प्रदर्शित रोबोटिक डॉग “Orion” को Galgotias University के Centre of Excellence ने विकसित किया है।
वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई और टेक समुदाय ने रोबोट को पहचानते हुए बताया कि यह Unitree Go2 है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध एक कमर्शियल क्वाड्रपेड (चार पैरों वाला) रोबोट है।
बढ़ते विवाद के बीच आयोजकों ने Galgotias University से अपना स्टॉल खाली करने को कहा। अगले दिन स्टॉल से डिस्प्ले हटा दिए गए और यूनिवर्सिटी ने औपचारिक माफ़ी जारी की।

यूनिवर्सिटी का आधिकारिक बयान:
Galgotias University ने बयान में कहा:
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संबंधित प्रतिनिधि को उत्पाद की तकनीकी उत्पत्ति की जानकारी नहीं थी।
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उन्हें मीडिया से बात करने की अधिकृत अनुमति नहीं थी।
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संस्थान की ओर से किसी प्रकार का जानबूझकर गलत प्रस्तुतीकरण नहीं किया गया।
Neha Singh ने भी स्पष्ट किया कि यूनिवर्सिटी ने रोबोट का निर्माण करने का दावा नहीं किया था, बल्कि इसे छात्रों को प्रेरित करने के लिए प्रदर्शित किया गया था।
Unitree Go2 क्या है?
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360° LiDAR सेंसर
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AI-आधारित ऑब्स्टेकल अवॉइडेंस
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सीढ़ियाँ चढ़ने-उतरने की क्षमता
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रिसर्च और एजुकेशन में व्यापक उपयोग
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ओपन SDK सपोर्ट (स्टूडेंट प्रोजेक्ट्स के लिए)
यह रोबोट दुनिया भर की यूनिवर्सिटीज़ और रिसर्च लैब्स में AI, रोबोटिक्स और मशीन लर्निंग प्रयोगों के लिए इस्तेमाल होता है। इसलिए किसी संस्थान द्वारा इसे खरीदकर डेमो या रिसर्च के लिए उपयोग करना असामान्य नहीं है, लेकिन इसे इन-हाउस डेवलपमेंट बताना विवाद का कारण बन गया।
भारत में Unitree Go2 रोबोट की अनुमानित कीमत और आयात शुल्क :
मूल कीमत और शिपिंग:
| घटक | राशि (USD) |
|---|---|
| Unitree Go2 बेस प्राइस | $2,800 |
| अनुमानित शिपिंग | $700 (₹3,17,345 में परिवर्तित) |
| कुल USD लागत | $3,500 |
भारतीय रुपयों में रूपांतरण:
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विनिमय दर: 1 USD = ₹90.67
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कुल INR मूल्य: $3,500 × 90.67 ≈ ₹3,17,345
अनुमानित आयात शुल्क और कर:
| कर का प्रकार | विवरण | अनुमानित राशि (INR) |
|---|---|---|
| बेस कस्टम ड्यूटी (BCD) | औद्योगिक/मनोरंजन रोबोट पर 7.5% – 10% | ₹23,800 – ₹31,700 |
| सोशल वेलफेयर सरचार्ज (SWS) | BCD का 10% | ₹2,380 – ₹3,170 |
| इंटीग्रेटेड GST (IGST) | कुल मूल्य (Base + BCD + SWS) पर 18% | ₹57,000 – ₹72,000 |
कुल अनुमानित आयात शुल्क और कर: ₹95,000 – ₹1,27,000
भारत में अनुमानित अंतिम कीमत
| घटक | अनुमानित राशि (INR) |
|---|---|
| उत्पाद + शिपिंग | ₹3,17,345 |
| आयात शुल्क और कर | ₹95,000 – ₹1,27,000 |
| कुल अनुमानित कीमत (भारत) | ₹4,12,345 – ₹4,44,345 |
विवाद क्यों बढ़ा?
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Make in India संवेदनशीलता: सरकारी समर्थित AI समिट में “घरेलू नवाचार” का दावा महत्वपूर्ण होता है।
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सोशल मीडिया फैक्ट-चेकिंग: टेक कम्युनिटी ने जल्दी ही मॉडल पहचान लिया।
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ब्रांड विश्वसनीयता: शैक्षणिक संस्थानों से पारदर्शिता की अपेक्षा अधिक होती है।
क्या है इससे मिलने वाला सबक?
टेक डेमो में पारदर्शिता ज़रूरी:
यदि कोई डिवाइस आयातित या कमर्शियल है, तो उसे स्पष्ट रूप से “डेमो/रिसर्च टूल” बताया जाना चाहिए।
मीडिया ब्रीफिंग की तैयारी:
प्रतिनिधियों को तकनीकी तथ्यों की स्पष्ट जानकारी और अधिकृत दिशा-निर्देश देना आवश्यक है।
छात्र नवाचार बनाम टेक अपनाना:
वैश्विक टेक्नोलॉजी का उपयोग करना गलत नहीं है- पर उसे स्वयं का आविष्कार बताना विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है।
Galgotias University का यह रोबोट विवाद दिखाता है कि आज के डिजिटल युग में जानकारी छिपाना या गलत प्रस्तुत करना मुश्किल है। टेक समुदाय जागरूक है और फैक्ट-चेकिंग तेज़ है।
अंत में, यह पूरा विवाद सिर्फ एक “गलत बयान” भर नहीं लगता, बल्कि संस्थागत लापरवाही और तथ्यों की अनदेखी का उदाहरण बन गया है। तकनीक और नवाचार जैसे गंभीर विषयों पर ऐसी ढिलाई विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाती है। छात्रों के भविष्य और संस्थान की साख दांव पर लगती है, जब पारदर्शिता की जगह भ्रम फैलता है। यह घटना भरोसे में आई दरार को लंबे समय तक याद दिलाती रहेगी।
हालांकि, यूनिवर्सिटी ने माफ़ी मांगकर स्थिति को संभालने की कोशिश की है। अब देखना होगा कि भविष्य में संस्थान किस तरह से पारदर्शिता और नवाचार के बीच संतुलन बनाए रखता है।
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