Diwali Date Confusion: हर साल दिवाली का त्योहार पूरे भारत में एक साथ मनाया जाता है, लेकिन अगर आप उत्तराखंड या हिमाचल के पहाड़ी इलाकों से हैं, तो आपने ज़रूर सुना होगा कि यहाँ दिवाली की तारीख को लेकर अक्सर कन्फ्यूजन रहता है। कोई कहता है दिवाली 20 अक्टूबर को है, तो कोई कहता है 21 अक्टूबर को। ऐसे में लोगों के मन में सवाल उठता है – आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या पहाड़ों में पंचांग अलग होता है या फिर इसकी कोई धार्मिक वजह है? आइए जानते हैं इस दिलचस्प विषय को विस्तार से।
दिवाली का धार्मिक आधार:

दिवाली हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाती है। यह वह दिन होता है जब भगवान श्रीराम 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे, और पूरे नगर ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था।
हालांकि पंचांग की गणना सूर्य और चंद्रमा की गति के आधार पर होती है, इसलिए हर साल तारीखें बदलती रहती हैं। लेकिन अलग-अलग जगहों पर सूर्योदय, चंद्र उदय और अमावस्या का समय थोड़ा अलग होने के कारण दिवाली की तिथि में अंतर दिखाई देता है।
पहाड़ी इलाकों में पंचांग का अंतर:
उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में अब भी “कान्यकुब्ज” या “काशी पंचांग” का पालन किया जाता है, जबकि मैदानी इलाकों में “दिल्ली” या “लाल किताब पंचांग” का अनुसरण किया जाता है।
इन पंचांगों में अमावस्या तिथि के आरंभ और समाप्ति का समय अलग-अलग बताया जाता है। उदाहरण के लिए, अगर अमावस्या तिथि 20 अक्टूबर की रात से शुरू होकर 21 अक्टूबर के दिन तक रहे, तो कुछ लोग 20 तारीख की रात को दिवाली मनाएंगे जबकि कुछ लोग 21 अक्टूबर को।
सूर्योदय के समय पर आधारित परंपरा:
हिंदू धर्म में यह नियम माना गया है कि “जिस दिन सूर्योदय के समय अमावस्या तिथि होती है, वही दिन दिवाली का माना जाता है”।
यही कारण है कि अगर अमावस्या तिथि रात में शुरू होकर अगले दिन सूर्योदय तक रहती है, तो पंचांग विशेषज्ञ अगले दिन दिवाली मानते हैं।
पहाड़ों में सूर्योदय का समय मैदानी इलाकों से थोड़ा पहले होता है, जिससे कभी-कभी तिथि की गणना में 5-6 घंटे का अंतर पड़ जाता है, और यही कन्फ्यूजन पैदा करता है।
स्थानीय परंपराओं का भी असर:
उत्तराखंड के कई गांवों में दिवाली से जुड़ी परंपराएं केवल पंचांग पर नहीं बल्कि स्थानीय आस्था और रिवाजों पर भी निर्भर करती हैं।
कुछ जगहों पर लोग “नरक चतुर्दशी” को ही दिवाली मानते हैं, जबकि कहीं लोग “अमावस्या” की रात को दीप जलाते हैं।
गढ़वाल के कुछ क्षेत्रों में दिवाली से ठीक एक दिन पहले “भगवाली” नाम की पूजा होती है, और अगले दिन “दीपावली” मनाई जाती है।
कुमाऊं में लोग “डाण-बाण” और “भूतोत्सव” जैसे लोक कार्यक्रमों के साथ दिवाली मनाते हैं, जिनकी शुरुआत अमावस्या से पहले ही हो जाती है।
इंटरनेट और सोशल मीडिया से बढ़ी उलझन:
पहले लोग अपने इलाके के पंडितजी या ग्राम प्रधान से तिथि पूछकर त्योहार मनाते थे, लेकिन आज के समय में हर कोई इंटरनेट पर तारीखें ढूंढता है।
ऑनलाइन वेबसाइट्स अलग-अलग पंचांगों के हिसाब से तारीखें दिखाती हैं – कोई 20 बताता है तो कोई 21।
यही वजह है कि सोशल मीडिया पर “आपकी दिवाली कब है?” जैसे सवाल और मीम्स खूब वायरल होते हैं।
असल में, दोनों ही तारीखें गलत नहीं होतीं — बस पंचांग की गणना और स्थान के आधार पर उनका अंतर होता है।
Diwali Date Confusion: विशेषज्ञों की राय क्या कहती है?
ज्योतिषाचार्य और पंचांगकारों के अनुसार, इस वर्ष अमावस्या तिथि 20 अक्टूबर की रात 9:30 बजे से शुरू होकर 21 अक्टूबर को शाम 7:00 बजे तक रहेगी।
इसलिए ज्यादातर उत्तर भारत में 21 अक्टूबर को दिवाली मनाई जाएगी, जबकि कुछ पहाड़ी और सीमावर्ती क्षेत्रों में 20 अक्टूबर की रात को ही दीपक जलाए जाएंगे।
यानी, दोनों पक्षों के पास अपने-अपने धार्मिक और गणनात्मक कारण हैं।
“देव दिवाली” का अलग महत्व:
पहाड़ी इलाकों में एक और परंपरा भी है जिसे “देव दिवाली” कहा जाता है, जो असल दिवाली के 15 दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाती है।
माना जाता है कि इस दिन देवता स्वयं गंगा स्नान करने पृथ्वी पर आते हैं और स्वर्गलोक में दीपोत्सव मनाते हैं।
इस दिन पहाड़ों में मंदिरों और घाटों पर भी दीप जलाए जाते हैं, इसलिए कुछ लोग इसे ही “सच्ची दिवाली” कहते हैं।
एक त्योहार, कई रूप:
दिवाली का असली अर्थ सिर्फ तारीख से नहीं जुड़ा, बल्कि आस्था, परंपरा और परिवार के मिलन से जुड़ा है।
पहाड़ों में चाहे दिवाली 20 को मनाई जाए या 21 को, उसकी रौनक, मिठास और एकजुटता में कोई कमी नहीं आती।
लोग घरों को सजाते हैं, पुराने रिश्ते जोड़ते हैं और नए आरंभ का स्वागत करते हैं — यही दिवाली की असली भावना है।
पहाड़ों में दिवाली की तारीख को लेकर जो कन्फ्यूजन है, वह कोई गलती नहीं बल्कि धार्मिक गणना, भौगोलिक स्थिति और स्थानीय परंपराओं का सुंदर मेल है।
जहां एक तरफ पंचांग के अनुसार तिथि बदलती है, वहीं दूसरी ओर लोगों की आस्था इसे एक सांस्कृतिक उत्सव बनाती है।
इसलिए चाहे आप 20 को दीप जलाएं या 21 को, मायने यह रखता है कि आपके दिल में रोशनी कितनी है।
क्योंकि दिवाली सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की भावना है — और यह भावना हर दिल में एक समान रहती है।
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