Bihar Assembly Elections 2025: बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। यह चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास, बेरोजगारी, विकास और जातीय समीकरणों के भविष्य को तय करने वाला माना जा रहा है। दो चरणों में होने वाले इस चुनाव की मतगणना 14 नवंबर को होगी, और सभी दल अपने-अपने आखिरी दांव खेलने में जुट चुके हैं।

चुनाव की पृष्ठभूमि: Bihar Assembly Elections 2025
बिहार की राजनीति हमेशा से जटिल और बहुस्तरीय रही है। 2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए ने सरकार बनाई थी, लेकिन उस गठबंधन के भीतर की खटपट कभी छिपी नहीं। समय के साथ राजनीतिक समीकरण बदलते रहे — जेडीयू का राजद से मिलना, फिर एनडीए में वापसी, और अब 2025 के चुनाव ने इन सब उतार-चढ़ावों के बीच एक नई कहानी रच दी है।
इस बार चुनाव का माहौल पहले से कहीं अधिक गर्म है क्योंकि मतदाताओं का ध्यान सिर्फ नेताओं पर नहीं, बल्कि उनकी नीतियों और कार्यों पर भी केंद्रित है।
प्रमुख गठबंधन और दलों की रणनीतियाँ:
बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा मुकाबला दो मुख्य गठबंधनों के बीच है –
- एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन): जिसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और कुछ छोटे सहयोगी दल शामिल हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस गठबंधन के चेहरे हैं।
- महागठबंधन: इसमें राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस, वाम दल और अन्य सहयोगी शामिल हैं। इस गठबंधन की कमान तेजस्वी यादव संभाल रहे हैं, जो खुद को युवाओं और बेरोजगारी के मुद्दे पर सबसे मुखर नेता के रूप में पेश कर रहे हैं।
इसके अलावा, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम भी कुछ क्षेत्रों में मुकाबला रोचक बना रही हैं।
यह पहली बार है जब छोटे दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है, खासकर सीमांचल और मगध क्षेत्र में।
प्रमुख मुद्दे: जनता क्या चाहती है?
- रोजगार और पलायन
बिहार में रोजगार का अभाव और बाहर पलायन का दर्द हर परिवार से जुड़ा है। युवाओं की सबसे बड़ी मांग स्थायी और सम्मानजनक रोजगार की है। तेजस्वी यादव ने हर सभा में “10 लाख नौकरियाँ” देने का वादा दोहराया है, जबकि एनडीए सरकार पिछले दस वर्षों के विकास कार्यों को गिना रही है। - शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था
शिक्षा प्रणाली में गिरावट और सरकारी अस्पतालों की हालत जनता की नाराज़गी का कारण बन रहे हैं। एनडीए का दावा है कि राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार हुआ है, वहीं विपक्ष इसे केवल आंकड़ों का खेल कह रहा है। - महिलाओं की सुरक्षा और भागीदारी
बिहार में महिला मतदाता प्रतिशत अब पुरुषों से अधिक है। सरकार द्वारा महिला स्व-सहायता समूह और आरक्षण योजनाएँ इस वर्ग को आकर्षित कर रही हैं, जबकि विपक्ष महिला सुरक्षा को बड़ा चुनावी मुद्दा बना रहा है। - जातीय समीकरण और सामाजिक संतुलन
बिहार में अब भी जातीय समीकरण चुनावी जीत-हार में गहरी भूमिका निभाते हैं। एनडीए सवर्ण और पिछड़ी जातियों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, वहीं महागठबंधन यादव-मुस्लिम समीकरण को मज़बूत बनाए रखने की कोशिश में है। - वोटर लिस्ट विवाद
हाल ही में लगभग 65 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए जाने के बाद विपक्ष ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाए हैं। हालांकि आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी और नियमित संशोधन का हिस्सा है। लेकिन यह विवाद कई जिलों में तनाव का कारण बन चुका है।
चुनाव प्रचार का अंदाज़: Bihar Assembly Elections 2025
इस बार चुनाव प्रचार में डिजिटल और ग्राउंड कैम्पेन दोनों का मिश्रण देखने को मिल रहा है।
- प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों में राष्ट्रीय मुद्दे, विकास और भ्रष्टाचार-मुक्त शासन पर ज़ोर दिया जा रहा है।
- तेजस्वी यादव हर जिले में “परिवर्तन यात्रा” कर रहे हैं, जहाँ वे युवाओं से सीधा संवाद स्थापित कर रहे हैं।
- नीतीश कुमार अपनी विश्वसनीय छवि और शासन के अनुभव को मुख्य हथियार बना रहे हैं।
- सोशल मीडिया पर हर दल की अलग रणनीति है – फेसबुक लाइव, शॉर्ट वीडियो, और लोकगीतों के ज़रिए मतदाताओं को लुभाने का प्रयास जारी है।
RJD उम्मीदवार खेसारी लाल यादव के लिए प्रचार करने पहुंचे तेजस्वी यादव
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— News24 (@news24tvchannel) October 29, 2025
मतदाताओं का मूड:
बिहार के मतदाता आज पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अब सिर्फ जाति नहीं, बल्कि रोजगार, बिजली-पानी, और सड़कों की स्थिति पर भी चर्चा हो रही है। युवाओं के बीच यह चुनाव भविष्य की उम्मीदों से जुड़ा हुआ है।
महिलाओं का रुझान भी निर्णायक भूमिका निभा सकता है। वे विकास और सुरक्षा को लेकर ठोस बदलाव चाहती हैं।
गाँवों में विकास कार्यों की स्थिति और शहरों में शिक्षा-रोजगार की उम्मीदें, दोनों मिलकर इस बार का जनादेश तय करेंगी।
संभावित समीकरण और सर्वेक्षण:
पहले चरण से पहले आए कुछ सर्वे बताते हैं कि एनडीए को हल्की बढ़त है, लेकिन महागठबंधन भी नज़दीकी मुकाबले में है।
कुछ एजेंसियों के अनुसार एनडीए को 130-150 सीटों तक और महागठबंधन को 90-100 सीटें मिल सकती हैं।
हालांकि, निर्णायक असर उन 40 सीटों का रहेगा जहाँ छोटे दल और निर्दलीय उम्मीदवार मुकाबले को त्रिकोणीय बना रहे हैं।
परिवर्तन की दहलीज़ पर बिहार:
बिहार का यह चुनाव केवल सरकार बदलने का नहीं, बल्कि एक नई राजनीतिक संस्कृति तय करने का चुनाव है।
लोग अब वादों से ज़्यादा परिणाम चाहते हैं। चाहे नीतीश कुमार की स्थिरता हो या तेजस्वी यादव की ऊर्जा -w जनता इस बार अपने अनुभव और उम्मीदों के आधार पर मतदान करेगी।
अगर एनडीए दोबारा सत्ता में आती है तो यह विकास मॉडल की पुष्टि होगी, और यदि महागठबंधन जीतता है तो यह बदलाव और युवाओं की आवाज़ की जीत मानी जाएगी।
कुल मिलाकर, बिहार एक बार फिर इतिहास रचने की तैयारी में है। चुनावी रैलियों की गूँज, नारों की गहमागहमी, और जनता की शांत मुस्कान के पीछे एक ही सवाल है – “अबकी बार, कौन करेगा बिहार का विकास?”
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