Vishwakarma Puja 2025: भारत की संस्कृति और परंपरा में भगवान विश्वकर्मा का नाम बड़े आदर और श्रद्धा से लिया जाता है। उन्हें सृष्टि का प्रथम शिल्पकार, देव वास्तुकार और अद्वितीय इंजीनियर माना जाता है। हर साल 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा और विश्वकर्मा जयंती पूरे देश में बड़े हर्षोल्लास से मनाई जाती है। इस दिन श्रद्धालु अपने औजारों, मशीनों, कार्यस्थलों और घरों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा करते हैं और उनसे समृद्धि और सफलता की कामना करते हैं।
विश्वकर्मा जयंती पर कई धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों पर विशेष आयोजन होते हैं, लेकिन अगर आप इस अवसर को और खास बनाना चाहते हैं तो बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित सूर्य मंदिर की यात्रा ज़रूर करनी चाहिए। यह मंदिर अपने आप में अद्भुत है क्योंकि मान्यता है कि इसे भगवान विश्वकर्मा ने स्वयं एक ही रात में निर्मित किया था। इस मंदिर की भव्यता, स्थापत्य कला और धार्मिक महत्व इसे देश के सबसे रहस्यमयी और खास मंदिरों में शामिल करती है।
औरंगाबाद का सूर्य मंदिर: विश्वकर्मा जी की दिव्य कृति | Vishwakarma Puja 2025

औरंगाबाद जिले में स्थित सूर्य मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला और धार्मिक आस्था के लिए प्रसिद्ध है। लोककथाओं और मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण त्रेता युग में भगवान विश्वकर्मा ने केवल एक रात में किया था। यह विश्वास आज भी यहां आने वाले श्रद्धालुओं को आश्चर्यचकित करता है और उनकी आस्था को और गहरा बनाता है।
मंदिर में भगवान सूर्यदेव सात घोड़ों के रथ पर विराजमान हैं और यहां उनके तीन रूपों — उदयाचल (प्रातः सूर्य), मध्याचल (मध्य सूर्य) और अस्ताचल (अस्त सूर्य) — के दर्शन होते हैं। यह दृश्य भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र और दुर्लभ अनुभव माना जाता है।
क्यों है खास औरंगाबाद का सूर्य मंदिर?
भारत में कई सूर्य मंदिर हैं, लेकिन औरंगाबाद का सूर्य मंदिर अपनी विशिष्टताओं के कारण अलग पहचान रखता है। यह देश का एकमात्र सूर्य मंदिर है जिसका द्वार पश्चिम दिशा की ओर खुलता है, जबकि अधिकतर सूर्य मंदिर पूर्वाभिमुख होते हैं। यह विशेषता इसे अन्य सभी मंदिरों से अलग बनाती है।
मंदिर की ऊंचाई लगभग 100 फीट है और इसका निर्माण बिना सीमेंट या गारे के केवल काटे गए पत्थरों को जोड़कर किया गया है। मंदिर में इस्तेमाल किए गए पत्थर काले और भूरे रंग के हैं, जो इसे और भी भव्य और रहस्यमयी रूप प्रदान करते हैं।
स्थापत्य की दृष्टि से यह मंदिर ओडिशा के प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर से मेल खाता है। दोनों ही मंदिरों की नक्काशी और कलात्मकता इतनी अद्भुत है कि इन्हें देखकर लगता है जैसे पत्थरों में जान फूंक दी गई हो।
मंदिर के बाहर लगे शिलालेख में ब्राह्मी लिपि में लिखा है कि इसका निर्माण लगभग 12 लाख 16 वर्ष पहले त्रेता युग में हुआ था। यह तथ्य इसे केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
सूर्य मंदिर की ऐतिहासिक मान्यता और पौराणिक कथाएँ
मान्यता है कि जब त्रेता युग में भगवान राम के समय सूर्य उपासना का महत्व बढ़ा, तब भगवान विश्वकर्मा ने इस मंदिर का निर्माण किया। रातभर में तैयार हुआ यह मंदिर आज भी अपनी स्थापत्य कला और रहस्यमयी इतिहास के कारण श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
कहानी यह भी कही जाती है कि यहां की भूमि इतनी पवित्र थी कि स्वयं सूर्यदेव ने विश्वकर्मा जी को आदेश दिया कि वे उनके लिए एक अद्भुत धाम तैयार करें। तभी विश्वकर्मा ने पत्थरों को तराशकर और जोड़कर इस भव्य मंदिर का निर्माण किया।
कैसे पहुंचें औरंगाबाद का सूर्य मंदिर?
अगर आप सूर्य मंदिर के दर्शन करना चाहते हैं तो यहां पहुंचना बहुत आसान है। हवाई मार्ग से आने वाले यात्रियों के लिए सबसे नजदीकी एयरपोर्ट पटना है, जो लगभग 180 किलोमीटर दूर है। पटना से टैक्सी और बसों के जरिए आप सीधे मंदिर पहुंच सकते हैं।
रेल मार्ग से यात्रा करने पर नजदीकी रेलवे स्टेशन औरंगाबाद है, जो मंदिर से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। औरंगाबाद शहर से सूर्य मंदिर मात्र 18 किलोमीटर दूर है। यहां तक पहुंचने के लिए टैक्सी, ऑटो और बस सेवाएं आसानी से उपलब्ध हैं।
आसपास के दर्शनीय स्थल
औरंगाबाद का सूर्य मंदिर अपने आप में खास है, लेकिन इसके आसपास कई अन्य धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल भी हैं जो आपकी यात्रा को और भी यादगार बना सकते हैं।
मंदिर से ज्यादा दूर नहीं देवकुंड नामक प्राचीन शिव मंदिर है। यह मंदिर अपने सुंदर प्राकृतिक झरने के लिए प्रसिद्ध है और यहां आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक जलप्रपात की खूबसूरती से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
इसके अलावा उमगा में भगवान विष्णु का प्राचीन मंदिर भी है, जो स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है। पवई, माली और चंदनगढ़ जैसे स्थान पुरातत्व और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए खास महत्व रखते हैं।
इतना ही नहीं, पास ही स्थित पीरू का गांव भी ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। कहा जाता है कि यहीं पर राजा हर्षवर्धन के दरबार के प्रसिद्ध कवि भट्ट का निवास था।
विश्वकर्मा पूजा और जयंती का महत्व
हर साल 17 सितंबर को देशभर में विश्वकर्मा पूजा और जयंती बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। इस दिन कारीगर, मजदूर, इंजीनियर, आर्किटेक्ट, और फैक्ट्री या वर्कशॉप में काम करने वाले लोग अपने औजारों और मशीनों की पूजा करते हैं।
विश्वकर्मा जी को पहला शिल्पकार और इंजीनियर माना जाता है। उनकी बनाई अद्भुत कृतियों में इंद्रपुरी, द्वारका, हस्तिनापुर और महाभारत काल का विराट सभा भवन भी शामिल है। इसलिए उन्हें निर्माण और सृजन का देवता कहा जाता है।
औरंगाबाद का सूर्य मंदिर उनकी उसी अद्भुत कला का जीता-जागता प्रमाण है। विश्वकर्मा जयंती पर यहां आने से न केवल धार्मिक पुण्य मिलता है बल्कि यह यात्रा आपको भारतीय संस्कृति की गहराइयों से भी जोड़ देती है।
बिहार का औरंगाबाद सूर्य मंदिर केवल एक धार्मिक धाम ही नहीं, बल्कि स्थापत्य कला और इतिहास का अद्भुत संगम है। मान्यता है कि इसे भगवान विश्वकर्मा ने मात्र एक ही रात में तैयार किया था। पश्चिम दिशा की ओर खुलता मंदिर का द्वार, बिना गारे के पत्थरों से बना निर्माण, त्रेता युग से जुड़ी इसकी मान्यताएं और आसपास के प्राकृतिक व ऐतिहासिक स्थल इसे एक संपूर्ण पर्यटन स्थल बना देते हैं।
अगर आप इस विश्वकर्मा जयंती पर कोई खास यात्रा करना चाहते हैं तो औरंगाबाद के सूर्य मंदिर के दर्शन ज़रूर करें। यह यात्रा न केवल आपकी आस्था को गहराई देगी बल्कि आपको भारत की प्राचीन शिल्पकला और परंपरा की अद्भुत झलक भी दिखाएगी।
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