उत्तराखंड स्नातक स्तरीय पेपर लीक: व्हाट्सएप 3 पन्नों की वायरल कॉपी और युवाओं का महाआंदोलन

उत्तराखंड स्नातक स्तरीय पेपर लीक: उत्तराखंड में हाल-ही में एक बड़े पेपर लीक ने शिक्षा व्यवस्था और प्रशासन की साख को चुनौती दी है। राज्य अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) द्वारा आयोजित स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा के एक केंद्र से परीक्षा शुरू होने के लगभग आधे घंटे बाद ही तीन पन्नों की प्रश्नपत्र प्रतियाँ व्हाट्सएप पर वायरल हो गईं। इस घटना ने हजारों अभ्यर्थियों को आहत किया, और राज्य में व्यापक आंदोलन और प्रदर्शन की शुरुआत हुई।

उत्तराखंड स्नातक स्तरीय पेपर लीक
         उत्तराखंड स्नातक स्तरीय पेपर लीक

उत्तराखंड स्नातक स्तरीय पेपर लीक, घटना की रूपरेखा:

परीक्षा और लीक का समयक्रम
परीक्षा 21 सितंबर 2025 को आल-राज्य स्तर पर आयोजित की गई। सुबह 11 बजे परीक्षा शुरू हुई, लेकिन लगभग 11:35 बजे तीन पन्नों की प्रश्नपत्र प्रतियाँ व्हाट्सएप पर प्रसारित हो गईं। 
अभ्यर्थियों ने अपनी हल की हुई प्रश्नपत्रों से मिलान किया तो पाया कि वायरल पन्नों में लिखे प्रश्न सही थे।

लीक कैसे हुआ — आरोप और पुलिस दावा
पुलिस और जांच एजेंसियों ने पाया कि मुख्य आरोपी खालिद मलिक ने परीक्षा केंद्र में एक मोबाइल फोन छुपाकर (मौज़ा में या मोजे में) प्रश्नपत्र की तस्वीरें लीं। 
उसने उन तस्वीरों को अपनी बहन साबिया को व्हाट्सएप पर भेजा। वहाँ से एक प्राध्यापिका (Suman) को भेजा गया, जिसने उन प्रश्नों के उत्तर तैयार किए और वापस भेजे जाने का आरोप है। 
पुलिस ने दावा किया कि यह एक स्वल्प संगठित घटना है, न कि बड़े गिरोह की साजिश।

तकनीकी असुविधाएँ और अनियमितताएँ
-कई कक्षों में मोबाइल जैमर काम नहीं कर रहे थे, और खालिद के कक्ष में जैमर नहीं लगाया गया था। 
-परीक्षा केंद्र की CCTV फुटेज में संदिग्ध गतिविधियाँ देखी गईं। 
-यह सवाल खड़ा हुआ कि मोबाइल प्रतिबंधित केंद्र में कैसे लाया गया और कैसे तस्वीर ली गई।

गिरफ्तारी और पूछताछ
पुलिस ने मुख्य आरोपी खालिद मलिक को हरिद्वार से गिरफ्तार किया और उसे देहरादून को भेजा। 
उसके अलावा उसकी बहन साबिया, और अन्य सह आरोपितों को भी हिरासत में लिया गया। 
स्वाभिमान मोर्चा के नेता बॉबी पवार को भी इस मामले में पूछताछ के लिए तलब किया गया, क्योंकि उन्होंने वायरल पन्नों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट की थीं।

सरकार की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा और कहा, “नकल जिहादियों को मिट्टी में मिलाने तक चैन नहीं बैठेंगे।” 
आयोग का प्रारंभिक मत था कि यह घटना केवल एक केंद्र और एक अभ्यर्थी तक सीमित है, इसलिए पूरे परीक्षा को रद्द नहीं किया जाएगा। 
सरकार ने SIT (Special Investigation Team) गठित की है और कई जांच दल सक्रिय किए हैं।

आन्दोलन और विरोध प्रदर्शन:

छात्रों एवं बेरोजगारों का गुस्सा
छात्र एवं बेरोजगारी संघों ने तुरंत विरोध किया। उन्होंने यह आरोप लगाया कि हजारों अभ्यर्थियों की मेहनत, सपने और भरोसा टूट गया। 
विशेष रूप से आलमोड़ा जिले से कहा गया कि अभ्यर्थियों ने बरसों की तैयारी की थी लेकिन यह घटना उनकी सारी मेहनत को बेकार कर गई।

धरने और प्रदर्शन
देहरादून के Parade Ground पर युवाओं ने धरना दिया। उन्हें रोकने के लिए प्रशासन ने विधिक पाबंदियाँ (प्रोिबिटरी आदेश) जारी कीं, लेकिन भीड़ बढ़ी और प्रदर्शन जारी रहे।
कई स्थानों पर आयोग का पुतला दहन हुआ और प्रदर्शनकारियों ने कहा कि परीक्षा की जवाबदेही आयोग को लेनी होगी। 
प्रदर्शन को “महाआंदोलन” का स्वर दिया गया, जिसमें युवाओं ने राज्यभर से समर्थन जताया।

पुलिस-प्रदर्शनकर्ता टकराव
कुछ स्थानों पर प्रदर्शन हिंसक रूप ले लिया। पत्थरबाज़ी हुई, पुलिस ने लाठियाँ चलाईं, छात्रों पर दबाव बनाना और भीड़ को तितर-बितर करना हुआ। कुछ प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों को चोटें आईं।
विरोधी दलों और सामाजिक संगठनों ने इस कार्रवाई की निंदा की और कहा कि छात्रों की आवाज दबाई जा रही है।

मांगें और नारा
-परीक्षा को रद्द करना और पुनः कराना
-इस पूरे मामले की CBI जांच
-दोषियों को सख्त कानूनी कार्रवाई
-आयोग या नियुक्त कार्मिकों की जवाबदेही
-भविष्य में परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था (जैमर, CCTV, इलेक्ट्रॉनिक मॉनिटरिंग) और पारदर्शिता बढ़ाने की व्यवस्था
-परीक्षा की जिम्मेदारी यदि आयोग दोषी हो, तो लोक सेवा आयोग जैसी अधिक भरोसेमंद संस्था को देना

विश्लेषण: क्या यह घटना केवल “एक केन्द्र की लापरवाही” है?

यह घटना सिर्फ एक अभ्यर्थी की कोशिश नहीं लगती, बल्कि परीक्षा-गुलामी और नकल-व्यवस्था की जड़ों में छुपी गड़बड़ी का संकेत देती है। पिछले वर्षों में उत्तराखंड में कई पेपर लीक मामले सामने आए हैं, जिसमें Hakam Singh Rawat जैसे नाम शामिल रहे हैं।

यह प्रश्न उठता है कि चाहे जैमर हों या न हों, लेकिन कैसे नेटवर्क, सामंजस्य या सहायता मिल सके। कई परीक्षा कक्षों में जैमर काम नहीं कर रहे थे, और स्टाफ, निगरानी व्यवस्था, परीक्षा केंद्र की सुरक्षा आदि सभी जांच के दायरे में हैं।

यदि यह केवल “स्वतंत्र अपराध” था, तो भी आयोग को ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करनी थी कि ऐसी स्वतंत्र गतिविधि संभव न हो। अगर किसी और का हाथ था, तो प्रणाली में और बड़े बदलाव की आवश्यकता है।

निष्कर्ष और सुझाव:

इस पेपर लीक कांड ने एक बार फिर यह दिखाया है कि केवल कानून बनाने से काम नहीं चलेगा — लागू करना, जवाबदेही तय करना और निगरानी सख्त करना आवश्यक है। छात्रों की मेहनत और भविष्‍य के लिए यह भरोसा बनाये रखना बेहद जरूरी है।

कुछ सुझाव दिए जा सकते हैं:

  • परीक्षा के दौरान ज़रूरत से ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक निगरानी (CCTV, जैमर, मानवीय निगरानी)

  • गुमशुदा सेंसर या सक्रिय जैमर की जगह ठीक से कार्यशील उपकरण

  • परीक्षा केंद्र स्टाफ की सख्त पृष्ठभूमि जांच

  • परीक्षा नोटिफिकेशन से पहले प्रश्नपत्र तैयार करना, सुरक्षित भंडारण

  • संदिग्ध गतिविधि पर असाधारण निगरानी

  • पारदर्शी जांच और दोषियों को सार्वजनिक रूप से दंडित करना

अंततः, यह मामला न सिर्फ एक लीक की घटना है, बल्कि शिक्षा अधिकार, न्याय और राज्य की जवाबदेही की परीक्षा है। प्रदेश सरकार, आयोग और कानून व्यवस्था को अब यह दिखाना होगा कि वह युवाओं के भरोसे को बहाल कर सकती है।

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