UPI Fee News: भारत में डिजिटल भुगतान की कहानी अगर किसी एक नाम से पहचानी जाती है, तो वह है UPI। कुछ साल पहले तक जहां नकद लेनदेन ही आम था, वहीं आज सब्जी वाले से लेकर ऑटो चालक, स्कूल फीस, बिजली बिल और ऑनलाइन शॉपिंग तक हर जगह UPI का इस्तेमाल हो रहा है। QR कोड स्कैन करना अब सिर्फ एक तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया मिशन ने UPI को एक ऐसा प्लेटफॉर्म बना दिया, जिसने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल पेमेंट मार्केट बना दिया। आज भारत में होने वाले कुल डिजिटल लेनदेन का करीब 85 प्रतिशत हिस्सा UPI के जरिए होता है। अक्टूबर महीने में ही 20 अरब से ज्यादा ट्रांजैक्शन हुए और करीब 27 लाख करोड़ रुपये का लेनदेन दर्ज किया गया। ये आंकड़े किसी भी देश के लिए गर्व की बात हैं।
लेकिन इस चमकती तस्वीर के पीछे एक ऐसी सच्चाई है, जो अब धीरे-धीरे सामने आ रही है। बजट 2026 से पहले UPI को लेकर जो चर्चा शुरू हुई है, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत में फ्री डिजिटल पेमेंट का दौर हमेशा के लिए रहेगा या फिर इसके लिए हमें कुछ कीमत चुकानी पड़ेगी।
जीरो MDR नीति: वरदान या चुनौती | UPI Fee News
UPI की सबसे बड़ी ताकत रही है उसकी जीरो MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट पॉलिसी। इसका मतलब यह कि दुकानदारों से UPI पेमेंट स्वीकार करने पर कोई फीस नहीं ली जाती। यही वजह है कि छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और गांवों तक डिजिटल भुगतान तेजी से पहुंच सका। ग्राहक के लिए यह पूरी तरह फ्री है और दुकानदार को भी कोई अतिरिक्त खर्च नहीं उठाना पड़ता।
सरकार ने यह नीति छोटे लेनदेन को बढ़ावा देने और कैशलेस इकोनॉमी को मजबूत करने के लिए अपनाई थी। शुरुआत में इसका असर भी शानदार रहा। लाखों नए मर्चेंट UPI से जुड़े, लोगों का भरोसा बढ़ा और डिजिटल लेनदेन में जबरदस्त उछाल देखने को मिला।
लेकिन अब यही जीरो MDR नीति UPI सिस्टम के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। वजह साफ है—हर ट्रांजैक्शन पर आने वाला खर्च। द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, एक UPI ट्रांजैक्शन को पूरा करने में करीब 2 रुपये का खर्च आता है। यह खर्च बैंक, पेमेंट ऐप्स और फिनटेक कंपनियां मिलकर उठाती हैं। सवाल यह है कि क्या यह मॉडल लंबे समय तक चल सकता है?
फ्री UPI की असली कीमत कौन चुका रहा है?

जब ग्राहक और दुकानदार दोनों को UPI पर कोई फीस नहीं देनी पड़ती, तो खर्च आखिर आता कहां से है? इसका जवाब है—बैंक और फिनटेक कंपनियों की जेब से। PhonePe, Google Pay, Paytm जैसी कंपनियां और बैंक हर ट्रांजैक्शन पर होने वाले खर्च को खुद वहन कर रहे हैं।
शुरुआती दौर में कंपनियों ने इसे भविष्य के निवेश के तौर पर देखा। उन्हें उम्मीद थी कि जैसे-जैसे यूजर बेस बढ़ेगा, वैसे-वैसे वे दूसरे तरीकों से कमाई कर पाएंगी। लेकिन हकीकत यह है कि UPI पर सीधी कमाई का कोई मजबूत मॉडल अब तक नहीं बन पाया है।
सरकार ने भी डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी दी। साल 2023-24 में सरकार ने करीब 3900 करोड़ रुपये डिजिटल पेमेंट सिस्टम के लिए दिए थे। लेकिन 2025-26 में यह राशि घटकर सिर्फ 427 करोड़ रुपये रह गई। दूसरी ओर, अनुमान है कि अगले दो सालों में UPI सिस्टम को चलाने का खर्च 8000 से 10,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। इस बढ़ते अंतर ने UPI के भविष्य पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
आंकड़ों की चमक और जमीनी हकीकत
UPI के ट्रांजैक्शन आंकड़े भले ही रिकॉर्ड तोड़ रहे हों, लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर उतनी मजबूत नहीं है। आंकड़ों के मुताबिक, भारत में सिर्फ करीब 45 प्रतिशत व्यापारी ही नियमित रूप से UPI स्वीकार करते हैं। देश के करीब एक-तिहाई पिनकोड ऐसे हैं, जहां 100 से भी कम एक्टिव UPI मर्चेंट मौजूद हैं।
यह दिखाता है कि अभी भी देश के बड़े हिस्से में डिजिटल पेमेंट की पहुंच सीमित है। गांवों और छोटे कस्बों में नेटवर्क, तकनीकी जानकारी और सुरक्षा जैसे मुद्दे अब भी चुनौती बने हुए हैं। फिनटेक कंपनियों का कहना है कि अगर उनके पास पर्याप्त फंडिंग नहीं होगी, तो वे इन इलाकों तक UPI को प्रभावी ढंग से नहीं पहुंचा पाएंगी।
RBI की चेतावनी: हमेशा फ्री नहीं चल सकता सिस्टम

भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI ने भी UPI के फ्री मॉडल को लेकर चिंता जताई है। RBI गवर्नर ने साफ कहा है कि किसी भी पेमेंट सिस्टम को चलाने में लागत आती है और वह लागत किसी न किसी को उठानी ही पड़ती है। लंबे समय तक पूरी तरह फ्री मॉडल को बनाए रखना व्यावहारिक नहीं है।
RBI का मानना है कि अगर सिस्टम को सुरक्षित, तेज और भरोसेमंद बनाए रखना है, तो उसमें लगातार निवेश जरूरी है। साइबर सिक्योरिटी, फ्रॉड प्रिवेंशन, सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर और नए फीचर्स के लिए पैसा चाहिए। अगर यह पैसा नहीं आया, तो सिस्टम की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है।
इंडस्ट्री की मांग: बीच का रास्ता
पेमेंट इंडस्ट्री अब सरकार के सामने एक बीच का रास्ता सुझा रही है। उनका कहना है कि छोटे दुकानदारों और आम लोगों के आपसी लेनदेन यानी P2P ट्रांजैक्शन के लिए UPI पूरी तरह फ्री रहना चाहिए। इससे डिजिटल समावेशन को कोई नुकसान नहीं होगा।
लेकिन बड़े कारोबारियों के मामले में तस्वीर अलग है। जिन व्यापारियों का सालाना टर्नओवर 10 करोड़ रुपये से ज्यादा है, उनसे हर ट्रांजैक्शन पर 0.25 से 0.30 प्रतिशत तक की मामूली MDR फीस लेने का प्रस्ताव रखा गया है। इंडस्ट्री का मानना है कि बड़े व्यापारी इस फीस को आसानी से वहन कर सकते हैं और इससे सिस्टम को आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिलेगी।
क्या ग्राहक पर पड़ेगा असर?
UPI पर MDR लागू होने की चर्चा से आम लोगों के मन में सबसे बड़ा डर यही है कि कहीं इसका बोझ ग्राहक पर न आ जाए। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर MDR सिर्फ बड़े कारोबारियों तक सीमित रहती है, तो आम यूजर पर इसका सीधा असर नहीं पड़ेगा।
आज भी क्रेडिट और डेबिट कार्ड पर MDR लगता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में ग्राहक को इसका एहसास नहीं होता। उसी तरह अगर UPI पर भी सीमित MDR लागू होती है, तो संभव है कि यह कीमतें तय करने में शामिल हो जाए, लेकिन रोजमर्रा के छोटे लेनदेन पर इसका असर नगण्य रहेगा।
बजट 2026: UPI के लिए निर्णायक पल
अब सारी निगाहें बजट 2026 पर टिकी हैं। यह बजट UPI के भविष्य के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। सरकार के पास दो रास्ते हैं। पहला, भारी सब्सिडी देकर UPI को पूरी तरह फ्री बनाए रखना। दूसरा, सीमित MDR लागू करके इसे धीरे-धीरे आत्मनिर्भर बनाना।
अगर सरकार पहले रास्ते को चुनती है, तो उसे हर साल हजारों करोड़ रुपये का खर्च उठाना होगा। यह मॉडल सामाजिक रूप से आकर्षक जरूर है, लेकिन आर्थिक रूप से कितना टिकाऊ होगा, यह सवाल बना रहेगा। वहीं दूसरा रास्ता UPI को लंबे समय तक मजबूत और सुरक्षित बना सकता है, लेकिन इसके लिए राजनीतिक और सामाजिक सहमति जरूरी होगी।
डिजिटल आजादी और उसकी कीमत
UPI ने भारत को डिजिटल आजादी दी है। कैश की झंझट कम हुई, लेनदेन आसान हुआ और पारदर्शिता बढ़ी। लेकिन हर आजादी की एक कीमत होती है। सवाल सिर्फ इतना है कि वह कीमत कौन और कैसे चुकाएगा।
अगर सही संतुलन बनाया गया, तो UPI न सिर्फ फ्री या सस्ता रह सकता है, बल्कि आने वाले सालों में और भी ज्यादा मजबूत बन सकता है। बजट 2026 यही तय करेगा कि भारत का डिजिटल पेमेंट सिस्टम सिर्फ संख्या में बड़ा रहेगा या आर्थिक रूप से भी टिकाऊ बनेगा।
फ्री से फेयर की ओर?
UPI का सफर अभी खत्म नहीं हुआ है। यह एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां फ्री और फेयर के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। आम लोगों और छोटे व्यापारियों के लिए यह सिस्टम जितना आसान और सस्ता रहेगा, उतना ही डिजिटल इंडिया का सपना मजबूत होगा।
लेकिन साथ ही, यह भी जरूरी है कि UPI को चलाने वाली संस्थाएं आर्थिक रूप से स्वस्थ रहें। तभी वे नई तकनीक, बेहतर सुरक्षा और देश के आखिरी कोने तक डिजिटल भुगतान पहुंचा पाएंगी। आने वाले महीनों में होने वाले फैसले तय करेंगे कि UPI हमेशा के लिए फ्री रहेगा या फिर भारत एक नए, संतुलित डिजिटल पेमेंट मॉडल की ओर बढ़ेगा।
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