The Birth Anniversary of Khatu Shyam Ji: राजस्थान के सीकर ज़िले में स्थित खाटू धाम देशभर के भक्तों के लिए एक पवित्र स्थान है। यहाँ विराजमान हैं भगवान श्रीकृष्ण के ही स्वरूप माने जाने वाले बाबा श्याम, जिन्हें “खाटू श्याम जी” या “शीश के दानी” के नाम से भी जाना जाता है। हर वर्ष कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को बाबा श्याम का जन्मदिन बड़े हर्ष और श्रद्धा से मनाया जाता है। इस दिन को “देवउठनी एकादशी” भी कहा जाता है, और इसी दिन बाबा श्याम के जन्म का स्मरण किया जाता है।
खाटू श्याम जी का जन्मदिन हर साल कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है।
2025 में खाटू श्याम जी का जन्मदिन 1 नवंबर, शनिवार को मनाया जाएगा।
इस दिन देवउठनी एकादशी (या तुलसी विवाह की एकादशी) भी होती है — और यही दिन बाबा श्याम के जन्मोत्सव के रूप में विशेष रूप से मनाया जाता है।
इस अवसर पर राजस्थान के सीकर ज़िले के खाटू धाम में लाखों भक्तों की भीड़ उमड़ती है। मंदिर को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है, निशान यात्राएँ निकलती हैं, और दिनभर भजन-कीर्तन का माहौल रहता है।
बाबा श्याम का जन्म और कथा: The Birth Anniversary of Khatu Shyam Ji

खाटू श्याम जी का मूल नाम बरबरिक था। वे महाभारत के वीर योद्धा घटोत्कच और मौरवी के पुत्र थे। बाल्यावस्था से ही वे अत्यंत पराक्रमी और भक्तिपरायण थे। उन्हें भगवान शिव से तीन अभेद्य बाणों का वरदान प्राप्त हुआ था, जिनसे वे पूरे युद्ध का परिणाम पल भर में बदल सकते थे। जब महाभारत का युद्ध आरंभ होने वाला था, तब वे भी युद्ध में भाग लेने के लिए कुरुक्षेत्र पहुँचे।
लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि बरबरिक के बाणों की शक्ति से युद्ध का परिणाम असंतुलित हो जाएगा। तब उन्होंने एक साधु का वेश धारण कर बरबरिक से पूछा कि वे युद्ध में किसका पक्ष लेंगे। बरबरिक ने कहा – “मैं हारने वाले पक्ष का साथ दूँगा।” कृष्ण मुस्कराए और बोले, “तो अंत में तुम केवल एक ही योद्धा को जीवित छोड़ोगे – स्वयं को।”
तब श्रीकृष्ण ने उनसे शीशदान (सिर का बलिदान) माँगा, और बरबरिक ने बिना विलंब किए अपना शीश भगवान को अर्पित कर दिया। प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने वरदान दिया कि कलियुग में तुम मेरे नाम “श्याम” से पूजे जाओगे और जो भी सच्चे मन से तुम्हारा नाम लेगा, उसकी मनोकामना पूर्ण होगी।
खाटू श्याम मंदिर और जन्मोत्सव: The Birth Anniversary of Khatu Shyam Ji

राजस्थान के सीकर ज़िले के खाटू गाँव में स्थित मंदिर को खाटू श्याम जी का प्रमुख धाम माना जाता है। कहा जाता है कि बरबरिक का शीश यहीं भूमि में दफनाया गया था और बाद में स्वप्न में राजा रूपसिंह चौहान को स्थान का पता चला, जहाँ उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया।
बाबा श्याम का जन्मदिन कार्तिक शुक्ल एकादशी को मनाया जाता है। इस दिन मंदिर को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है। हजारों भक्त देश-विदेश से यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर के द्वार सुबह विशेष “मंगल आरती” से खुलते हैं और दिनभर भजन-कीर्तन, दान-भोग और सेवा कार्यक्रम चलते हैं।
पूजा और धार्मिक परंपराएँ:
खाटू श्याम जी के जन्मदिन पर भक्त उपवास रखते हैं और पूरे दिन भक्ति में लीन रहते हैं।
- बाबा को दूध, चूरमा, मावा, और खीर का भोग लगाया जाता है।
- निशान यात्रा निकाली जाती है, जिसमें भक्त अपने सिर पर झंडे लेकर चलते हैं और “जय श्री श्याम” के जयकारे लगाते हैं।
- कई भक्त अपने घरों में भी खाटू श्याम जी की मूर्ति स्थापित कर पूजा-पाठ करते हैं।
- रात में भजन संध्या का आयोजन होता है जहाँ भक्त उनके नाम के गीत गाते हैं।
आस्था का महत्व: The Birth Anniversary of Khatu Shyam Ji
बाबा श्याम को “हारे का सहारा” कहा जाता है क्योंकि वे अपने भक्तों के दुःख-दर्द हर लेते हैं। जो व्यक्ति सच्चे मन से बाबा से प्रार्थना करता है, उसकी इच्छा अवश्य पूरी होती है। बाबा के भक्त मानते हैं कि जो कुछ हमारे जीवन में होता है, वह उनकी इच्छा से होता है – और वही अंततः भलाई के लिए होता है।
बाबा श्याम का जन्मोत्सव केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भक्ति, सेवा और त्याग का प्रतीक है। उनका शीशदान हमें यह सिखाता है कि ईश्वर-भक्ति में सबसे बड़ा बलिदान भी तुच्छ होता है, यदि वह सत्य और धर्म की रक्षा के लिए दिया जाए।
खाटू श्याम जी का जन्मदिन हमें न केवल उनके जीवन की वीरता और भक्ति की याद दिलाता है, बल्कि यह भी सिखाता है कि सच्ची आस्था में न कोई लोभ होता है, न भय। हर वर्ष यह पावन दिन लाखों भक्तों के लिए एक नया संकल्प लेकर आता है – ईश्वर-भक्ति, सेवा और प्रेम के मार्ग पर चलने का।
जय श्री श्याम! हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा!
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