द बंगाल फाइल्स: विवेक रंजन अग्निहोत्री की अगली बहुप्रतीक्षित फ़िल्म “द बंगाल फाइल्स” उनके “Files Trilogy” की तीसरी कड़ी है — इससे पहले “The Tashkent Files” और “The Kashmir Files” आ चुकी हैं। कहानी 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली नरसंहार जैसी दर्दनाक घटनाओं के इर्द-गिर्द बुनी गई है — जिसे निर्देशक ‘हिंदू जनसंहार’ के रूप में वर्णित करते हैं, जो कथित तौर पर मुख्यधारा की यादों से मिटा दिया गया।

फिल्म “द बंगाल फाइल्स: राइट टू लाइफ़” नाम से दो हिस्सों में रिलीज हो रही है; पहला भाग 5 सितंबर 2025 (शिक्षक दिवस) को थिएटर्स में आएगा।
“द बंगाल फाइल्स” सीधा तौर पर “द कश्मीर फाइल्स” से प्रेरित मानी जा रही है।
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दोनों ही फिल्में विवेक अग्निहोत्री की “Files Trilogy” का हिस्सा हैं।
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“द कश्मीर फाइल्स” ने 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों के पलायन और नरसंहार की कहानी उठाई थी।
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उसी तरह “द बंगाल फाइल्स” 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली नरसंहार की घटनाओं को दिखाने का दावा करती है।
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दोनों फिल्मों की शैली लगभग समान है — भूले हुए या दबाए गए साम्प्रदायिक त्रासदियों को “मुख्यधारा इतिहास” के खिलाफ रखकर सामने लाना।
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“कश्मीर फाइल्स” के बाद जिस तरह से राजनीतिक बहस छिड़ी थी, वैसा ही विवाद बंगाल वाली फिल्म के साथ पहले ही शुरू हो चुका है (ट्रेलर लॉन्च रुकवाना, राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया इत्यादि)।
यानि कहा जा सकता है कि “द बंगाल फाइल्स” थीम और ट्रीटमेंट दोनों में ही ‘द कश्मीर फाइल्स’ से प्रेरित है, लेकिन यह नया भूगोल और नई ऐतिहासिक त्रासदी को सामने रखती है।
कलाकार और तैयारी
मिथुन चक्रवर्ती, पल्लवी जोशी, अनुपम खेर, दर्शन कुमार और सास्वता चटर्जी जैसे प्रतिष्ठित कलाकार इसमें शामिल हैं।
— अनुपम खेर महात्मा गांधी की भूमिका में दिखेंगे — बिना किसी प्रोस्थेटिक के उन्होंने इस रोल की तैयारी की है।
— पल्लवी जोशी ने एक सौ वर्षीय वृद्धा का किरदार निभाया है; उन्होंने छह महीने तक स्किन केयर तक बंद कर रखी थी, और प्रोस्थेटिक मेकअप के ज़रिए वृद्धा की रूपरेखा तैयार की गई — एक सशक्त चुनौतीपूर्ण भूमिका।

कॉम्प्लेट ट्रेलर और प्रतिक्रिया:
ट्रेलर की रिलीज
16 अगस्त, डायरेक्ट एक्शन डे के अवसर पर रिलीज हुआ ट्रेलर, “द बंगाल फाइल्स” के मुख्य भाव को सीधे बताता है — “यह पश्चिम बंगाल है, यहाँ दो संविधान चलते हैं: एक हिंदुओं के लिए, एक मुसलमानों के लिए”। इसे “भूल-चूक गई हिंदू जनसंहार की कहानी” बताया गया — एक चेतावनी भरी कहानी जिसमें बंगाल को “एक जगमगता प्रकाशस्तंभ” बताया गया है, जिसकी कीमत चुकानी होगी। कुछ धारदार संवादों ने ट्रेलर को ज़्यादा ही शक्तिशाली और बेहद असहज बना दिया।
दर्शकों और समीक्षकों की प्रतिक्रिया
— एक बंगाली दर्शक ने लिखा, “कम से कम एक फिल्मकार के पास हिम्मत और इरादा था कि वह इस कहा हुआ अतीत और क्रूर इतिहास को उजागर करे।”
—ट्रेलर ने कवरेज और चर्चा दोनों बढ़ा दी, खासकर इतिहास के इस हिस्से पर जो कई बार नजरअंदाज कर दिया गया।
— Koimoi की समीक्षा के अनुसार, ट्रेलर एक “असहज सच्चाई” का आश्वासन देता है, और शायद “द कश्मीर फाइल्स” से ज़्यादा चुभने वाला हो सकता है।
विवाद और राजनीति: ट्रेलर लॉन्च के दौरान अराजकता
लॉन्च में अनपेक्षित अड़चनें
कोलकाता में ट्रेलर लॉन्च इवेंट विवादों से घिर गया — घटनाओं में शामिल थे:
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होटल के तार काट दिए गए, जिससे स्क्रीनिंग रुकी गई।
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Agnihotri ने आरोप लगाया कि पुलिस और राजनीतिक दबाव के कारण यह रोक लगाई गई; “अगर यह तानाशाही नहीं, तो क्या है?” उन्होंने मलती चेहरे की सियासी वजह बताई।
राजनीतिक टिप्पणियाँ और आरोप-प्रत्यारोप
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TMC नेता कुनाल घोष ने इसे “बंगाल को बदनाम करने की कोशिश” करार दिया, और पूछा — “अगर राजनीति का उद्देश्य था विभाजन, तो ‘गुजरात फाइल्स’ या अन्य प्रांतों की कहानी क्यों नहीं?”।
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BJP नेता सुंतक मंडल ने एक बेहद तीखी टिप्पणी की: “सुगम फिल्में आज बंद हो रही हैं, कानून और व्यवस्था बिखर चुकी है” — ये घटना “लोकतंत्र की गरिमा को तोड़ता है”।
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Agnihotri ने हाई कोर्ट से मिली रोक (बैन) की बात कही; उनका दावा है कि उन्होंने कानूनी रुख लेना तय किया है और ज़ल्द सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेंगे।
विवादास्पद लेकिन ज़रूरी: एक परख
यह फिल्म एक ऐतिहासिक घटना की अशांति और साम्प्रदायिक विभाजन की कहानी को आधार बनाकर संवेदना जगाती है — लेकिन क्या यह इतिहास का सच है, या आज की राजनीति का प्रतिबिंब?
— ट्रेलर की भाषा और दृश्यों में उभरने वाली तीव्रता स्पष्ट रूप से दिखाती है कि यह फिल्म सफ़ा खोलने नहीं, बल्कि समय की देहात को हिला देने का इरादा रखती है।
— विवाद इस बात पर भी गहराता है कि कलात्मक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति को किस हद तक दबाया जा रहा है। ट्रेलर लॉन्च को रोकना — तार काटना, पुलिस हस्तक्षेप — ये सामूहिक निर्णय ना सिर्फ कला पर प्रतिबंध लगाते हैं बल्कि “तथ्यों” पर भी कुहराम ढाते हैं।
— क्या यह फिल्म केवल बंगाल का इतिहास दिखाती है, या पूरे देश को यह पूछने पर मजबूर करती है — “क्या कुछ इतिहास, यदि ज़्यादातर हमारे राष्ट्र की विरासत हो, उसे मिटाकर ‘नए इतिहास’ गढ़ा जा सकता है?”
“द बंगाल फाइल्स” — इतिहास या राजनीति?
“द बंगाल फाइल्स” किसी भी हिसाब से साधारण फिल्म नहीं — यह एक राजनीतिक बात, संवेदनशील इतिहास, और विवाद का केंद्र है। यदि यह इतिहास को उजागर करने का साहसिक प्रयास है — तो उसे वही सम्मान मिलना चाहिए जो किसी भी गंभीर दस्तावेज़ को मिलता है।
दूसरी ओर, यदि प्रायोजित विचारधाराएँ इस कहानी को आकार दे रही हैं, तो इसे नजरअंदाज करना सही नहीं होगा।
फ़िल्म की रिलीज के समय — 5 सितंबर — जब पर्दा उठेगा, तब हमें यह भी पता चलेगा कि यह केवल एक नाटक नहीं, बल्कि साम्प्रदायिक मानसिकता, राजनीतिक छायाएं और इतिहास के संदर्भ में एक तालमेल का प्रचार नहीं बल्कि तालमेल का सच उजागर कर रही है।
आपका क्या अनुभव या सवाल है?
— क्या यह फिल्म आपको इतिहास की नई समझ देती दिख रही है, या एक राजनैतिक बयान? टिप्पणियाँ में ज़रूर बताएं।
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