Surya Hansda Encounter: झारखंड में राजनीति इन दिनों एक बार फिर गरमा गई है। वजह है सूर्या हांसदा एनकाउंटर, जिसे लेकर सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। सूर्या हांसदा कभी भाजपा के नेता रहे और बाद में उन्होंने झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) का दामन थामा। लेकिन पुलिस के रिकॉर्ड में उनका नाम एक “हिस्ट्रीशीटर” के तौर पर दर्ज था। झारखंड के गोड्डा ज़िले के बोआरीजोर थाना क्षेत्र के जिरली समारी पहाड़ी में पुलिस मुठभेड़ में उनकी मौत ने राज्य की राजनीति में बवाल मचा दिया है।
कौन थे सूर्या हांसदा? Surya Hansda Encounter
लालमटिया थाना क्षेत्र के डकैता गाँव के निवासी सूर्या हांसदा कभी इस इलाके के प्रभावशाली राजनीतिक चेहरे माने जाते थे। उन्होंने 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के रूप में बोरियो सीट से चुनाव लड़ा था। हालांकि जीत नहीं मिली। बाद में, 2024 में टिकट न मिलने पर उन्होंने JLKM पार्टी जॉइन कर फिर से चुनाव लड़ा, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। राजनीति में सक्रिय रहते हुए भी उन पर कई आपराधिक मामले दर्ज थे।
आपराधिक मामलों का लंबा इतिहास
सूर्या हांसदा का नाम कई हिंसक घटनाओं में सामने आया। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, उन पर हिंसक हमले करने, संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और सरकारी काम में बाधा डालने जैसे आरोप थे।
मई 2024 में ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) की राजमहल परियोजना में गोलीबारी की घटना में भी उनका नाम सामने आया था। इस हमले में एक मशीन ऑपरेटर घायल हुआ था।
इसके अलावा, साहिबगंज ज़िले में एक क्रशर मिल में ट्रकों और वाहनों को आग लगाने के मामले में भी उनका नाम जुड़ा। 2021 में भी उन्हें एक मामले में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, लेकिन बाद में वे जमानत पर बाहर आ गए।
पुलिस का दावा बनाम विपक्ष के आरोप
पुलिस का दावा है कि सूर्या हांसदा एक खतरनाक अपराधी थे और उनके खिलाफ कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे। पुलिस ने जानकारी दी कि उन्हें जिरली समारी पहाड़ी के पास छिपे होने की सूचना मिली थी। इसके बाद सर्च ऑपरेशन चलाया गया और इसी दौरान मुठभेड़ में उनकी मौत हो गई।
लेकिन विपक्षी दलों का कहना है कि यह एनकाउंटर “फर्जी” था। उनका आरोप है कि राजनीतिक दबाव और सरकार के इशारे पर पुलिस ने यह कार्रवाई की।
बाबूलाल मरांडी का बड़ा बयान
BJP प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने JMM सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि 11 जून को JMM की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सूर्या हांसदा का नाम विवादित तरीके से लिया गया और अगले ही दिन उन पर केस दर्ज कर लिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब एक “पॉलिटिकल गेम” था।
मरांडी ने मांग की है कि इस पूरे मामले की जांच CBI से कराई जाए ताकि सच सामने आ सके।
सदन से लेकर सड़क तक प्रदर्शन
एनडीए गठबंधन के विधायकों ने विधानसभा के बाहर जमकर प्रदर्शन किया। उनका कहना है कि राज्य सरकार पुलिस का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने के लिए कर रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर जांच CBI को नहीं सौंपी गई तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक मिसाल होगी।
घटनास्थल पर सुरक्षा का कड़ा पहरा
एनकाउंटर के बाद प्रशासन ने तुरंत पूरे इलाके को सील कर दिया। बड़ी संख्या में पुलिस और सुरक्षा बलों की तैनाती की गई। आसपास के गांवों में किसी को भी आने-जाने की इजाज़त नहीं थी। इस कदम से ग्रामीणों में डर और गुस्सा दोनों देखने को मिला।
राजनीतिक माहौल पर असर
सूर्या हांसदा एनकाउंटर का असर झारखंड की राजनीति पर साफ देखा जा सकता है। जहां JMM सरकार पुलिस की कार्रवाई को सही ठहरा रही है, वहीं BJP और उसके सहयोगी इसको पूरी तरह से राजनीतिक साजिश बता रहे हैं। यह मुद्दा आने वाले चुनावों पर भी असर डाल सकता है।
जनता की राय बंटी
गांव और शहरों में लोग इस घटना को लेकर दो हिस्सों में बंटे हुए हैं। कुछ का मानना है कि सूर्या हांसदा जैसे लोगों का एनकाउंटर होना ज़रूरी था, ताकि अपराध पर लगाम लगे। वहीं, दूसरी ओर कई लोग इसे “लोकतंत्र की हत्या” बता रहे हैं और न्यायिक जांच की मांग कर रहे हैं।
क्यों ज़रूरी है CBI जांच?
चूंकि मामला एक बड़े राजनीतिक चेहरे और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति से जुड़ा है, इसलिए इसकी जांच स्वतंत्र एजेंसी से कराना ही न्यायसंगत होगा। विपक्ष का कहना है कि जब तक निष्पक्ष जांच नहीं होगी, तब तक इस मामले की सच्चाई सामने नहीं आएगी।
सूर्या हांसदा एनकाउंटर ने झारखंड की राजनीति में बड़ा भूचाल ला दिया है। एक ओर पुलिस इसे अपराधियों के खिलाफ बड़ी सफलता बता रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष इसे पूरी तरह से राजनीतिक साजिश और फर्ज़ी एनकाउंटर करार दे रहा है। सच क्या है, यह तो केवल निष्पक्ष और पारदर्शी जांच से ही सामने आ पाएगा। ऐसे मामलों में CBI जैसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग जायज़ लगती है, ताकि न केवल जनता का भरोसा बरकरार रहे बल्कि यह भी साबित हो सके कि कानून से बड़ा कोई नहीं है।
यह मामला केवल एक व्यक्ति की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि झारखंड की राजनीति, शासन और पुलिस व्यवस्था की साख पर भी सीधा सवाल खड़ा करता है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या सरकार और जांच एजेंसियां इस मुद्दे पर पारदर्शिता और न्याय का पालन करती हैं या फिर यह मामला भी धीरे-धीरे राजनीतिक बहसों में खोकर रह जाएगा।
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