Sheetla Shashti 2026: शीतला षष्ठी व्रत से मिलेगा सौभाग्य और संतान सुख, जानिए पूजा विधि और असरदार उपाय

Sheetla Shashti 2026: 24 जनवरी 2026, शनिवार का दिन धार्मिक दृष्टि से बेहद खास माना जा रहा है, क्योंकि इसी दिन माघ शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर शीतला षष्ठी का व्रत रखा जाएगा। यह व्रत मां शीतला को समर्पित होता है, जिन्हें रोगों से रक्षा करने वाली, संतानों की पालनहार और सौभाग्य प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। शीतला षष्ठी का पर्व विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है, जो संतान सुख की कामना करती हैं या अपने परिवार के स्वास्थ्य और शांति की प्रार्थना करती हैं।

यह व्रत सदियों से आस्था और परंपरा के साथ मनाया जा रहा है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से मां शीतला की पूजा करने से जीवन की कई परेशानियां दूर होती हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।

शीतला माता कौन हैं और क्यों होती है उनकी पूजा | Sheetla Shashti 2026: 

Sheetla Shashti 2026

शीतला माता को ठंडक, शांति और आरोग्य की देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां शीतला चेचक, खसरा, फोड़े-फुंसी और अन्य संक्रामक रोगों से रक्षा करती हैं। पुराने समय में जब चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं, तब लोग शीतला माता की पूजा करके रोगों से मुक्ति की कामना करते थे। यही कारण है कि आज भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में मां शीतला के प्रति गहरी श्रद्धा देखने को मिलती है।

शीतला शब्द का अर्थ ही शीतलता यानी ठंडक होता है। यही वजह है कि इस दिन देवी को ठंडे और बांसी भोजन का भोग लगाया जाता है। यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य से भी जुड़ी मानी जाती है।

शीतला षष्ठी व्रत का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

शीतला षष्ठी का व्रत विशेष रूप से मातृत्व, संतान सुरक्षा और पारिवारिक सुख से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि जो महिलाएं यह व्रत श्रद्धा के साथ करती हैं, उन्हें संतान पक्ष से शुभ समाचार मिलता है। जिन परिवारों में बच्चों को बार-बार बीमारियां घेर लेती हैं, वहां यह व्रत विशेष फलदायी माना जाता है।

यह व्रत केवल शारीरिक रोगों से ही नहीं, बल्कि मानसिक अशांति से भी मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। मां शीतला की कृपा से मन शांत होता है और नकारात्मक विचार दूर होते हैं।

शीतला षष्ठी की पूजा विधि और परंपराएं

शीतला षष्ठी की पूजा सादगी और श्रद्धा के साथ की जाती है। इस व्रत की सबसे खास परंपरा है ठंडा या बांसी भोजन ग्रहण करना। एक दिन पहले यानी पंचमी तिथि को भोजन पकाया जाता है और षष्ठी के दिन वही भोजन देवी को भोग स्वरूप अर्पित किया जाता है।

सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण किए जाते हैं। घर या मंदिर में मां शीतला की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर पूजा की जाती है। पूजा के दौरान देवी को ठंडे व्यंजन जैसे मीठे चावल, दही, पूड़ी, पुए और हलवा अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद परिवार के सभी सदस्य वही भोजन प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

अगर किसी कारणवश एक दिन पहले भोजन बनाना संभव न हो, तो सुबह जल्दी उठकर भोजन बनाकर शाम को पूजा करना भी स्वीकार्य माना गया है।

शीतला षष्ठी पर ठंडा भोजन क्यों होता है जरूरी

शास्त्रों के अनुसार शीतला माता को ठंडी चीजें प्रिय हैं। ठंडा या बांसी भोजन देवी को अर्पित करने से शरीर और मन दोनों में शीतलता बनी रहती है। यह परंपरा हमें संयम और सादगी का संदेश भी देती है।

आयुर्वेदिक दृष्टि से भी देखा जाए तो मौसम परिवर्तन के समय हल्का और ठंडा भोजन शरीर के लिए लाभकारी माना जाता है। इस तरह शीतला षष्ठी का व्रत धार्मिक के साथ-साथ स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है।

संतान प्राप्ति के लिए शीतला षष्ठी के उपाय

मान्यता है कि जिन महिलाओं को संतान सुख की कामना होती है, उन्हें शीतला षष्ठी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन मां शीतला से संतान की रक्षा और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना की जाती है। श्रद्धा के साथ व्रत रखने और पूजा करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे मनोकामनाएं पूर्ण होने की संभावना बढ़ जाती है।

आचार्य इंदु प्रकाश जी के अनुसार, इस दिन मां शीतला की सच्चे मन से आराधना करने पर संतान पक्ष से जुड़े कष्ट दूर होते हैं और परिवार में खुशहाली आती है।

शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए मंत्र जाप

शीतला षष्ठी के दिन मंत्र जाप का विशेष महत्व होता है। माना जाता है कि “ॐ ह्रीं श्रीं शीतलायै नमः” मंत्र का श्रद्धा के साथ जाप करने से देवी शीघ्र प्रसन्न होती हैं। इस मंत्र का नियमित जाप करने से रोगों से रक्षा होती है और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

मंत्र जाप करते समय मन को शांत रखना और पूरी आस्था के साथ देवी का ध्यान करना बेहद जरूरी होता है।

नीम और जल का धार्मिक महत्व

शीतला माता की पूजा में नीम के पत्तों का विशेष स्थान है। नीम को शुद्धता और आरोग्य का प्रतीक माना जाता है। पूजा के दौरान नीम के पत्ते और स्वच्छ जल मां शीतला को अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही घर के चारों ओर पवित्र जल का छिड़काव करने की परंपरा भी है, जिससे नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और वातावरण शुद्ध रहता है।

नीम का संबंध आयुर्वेद से भी है, इसलिए यह परंपरा धार्मिक के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

शीतला षष्ठी पर दान का महत्व

शीतला षष्ठी के दिन दान करना बहुत पुण्यकारी माना गया है। इस दिन जरूरतमंदों को जल से भरा बर्तन, भोजन या अन्य उपयोगी वस्तुएं दान करने से जीवन में सकारात्मकता आती है। कहा जाता है कि दान से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-शांति बनी रहती है।

दान करते समय मन में अहंकार नहीं, बल्कि सेवा का भाव होना चाहिए। यही भावना इस व्रत को पूर्ण फलदायी बनाती है।

शीतला षष्ठी और महिलाओं की आस्था

शीतला षष्ठी का व्रत विशेष रूप से महिलाओं के बीच बहुत लोकप्रिय है। मां अपने बच्चों की सलामती और उज्ज्वल भविष्य के लिए यह व्रत रखती हैं। कई जगहों पर महिलाएं एक साथ इकट्ठा होकर पूजा करती हैं, जिससे सामाजिक और पारिवारिक जुड़ाव भी मजबूत होता है।

यह व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मातृत्व, करुणा और प्रेम का प्रतीक भी है।

शीतला षष्ठी का सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष

भारत की विविध संस्कृति में शीतला षष्ठी का अपना खास स्थान है। खासकर बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में यह पर्व बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। हालांकि पूजा की परंपराएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन भावनाएं और आस्था एक जैसी रहती हैं।

यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलना कितना जरूरी है और स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है।

शीतला षष्ठी से मिलने वाला जीवन संदेश

शीतला षष्ठी का व्रत हमें धैर्य, संयम और श्रद्धा का महत्व सिखाता है। यह पर्व याद दिलाता है कि सादगी में ही सच्चा सुख छिपा होता है। मां शीतला की पूजा करके हम न केवल अपने परिवार की सुरक्षा की कामना करते हैं, बल्कि समाज और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी समझते हैं।

शीतला षष्ठी 2026 केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, स्वास्थ्य और पारिवारिक सुख का संगम है। इस दिन श्रद्धा के साथ व्रत और पूजा करने से मां शीतला की कृपा प्राप्त होती है। सौभाग्य, संतान सुख और मानसिक शांति की कामना रखने वालों के लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है।

अगर यह पर्व सच्चे मन और विश्वास के साथ मनाया जाए, तो जीवन में सकारात्मक बदलाव निश्चित रूप से देखने को मिलते हैं।

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