SC on Death Penalty: भारत में मौत की सजा को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने फांसी देने के मौजूदा तरीके को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर गुरुवार को अहम सुनवाई की। इन याचिकाओं में दावा किया गया है कि फांसी देना एक क्रूर, अमानवीय और अत्यधिक पीड़ादायक तरीका है, जो संविधान के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने को कहा है। अदालत ने केंद्र और याचिकाकर्ताओं दोनों से तीन सप्ताह के भीतर लिखित दलीलें दाखिल करने को कहा है। इसके साथ ही कोर्ट ने इन याचिकाओं पर अपना फैसला फिलहाल सुरक्षित रख लिया है।
किस पीठ ने की सुनवाई | SC on Death Penalty

इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने की। अदालत के सामने यह सवाल रखा गया कि क्या आज के आधुनिक और संवेदनशील समाज में मौत की सजा देने का तरीका भी बदला जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने कहा कि फांसी का तरीका न सिर्फ शारीरिक पीड़ा देता है, बल्कि यह मानसिक यातना भी है। वहीं, केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने पक्ष रखा और अदालत से समय मांगा ताकि सरकार इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी विस्तृत राय पेश कर सके।
याचिकाओं में फांसी को क्यों बताया गया क्रूर
याचिकाओं में साफ तौर पर कहा गया है कि फांसी देकर मौत की सजा देना मानव गरिमा के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब दुनिया के कई देश मौत की सजा के तरीकों को ज्यादा मानवीय बना चुके हैं, तब भारत में अब भी फांसी जैसे पुराने और पीड़ादायक तरीके का इस्तेमाल किया जा रहा है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि फांसी के दौरान मौत तुरंत नहीं होती, बल्कि दोषी को लंबे समय तक तड़पना पड़ता है। यह प्रक्रिया न सिर्फ शारीरिक दर्द देती है, बल्कि मानसिक रूप से भी व्यक्ति को तोड़ देती है।
फांसी के बजाय क्या विकल्प सुझाए गए
याचिकाओं में अदालत के सामने फांसी के कई वैकल्पिक तरीकों का सुझाव रखा गया है। इनमें कहा गया है कि दोषी को फांसी देने के बजाय घातक इंजेक्शन (Lethal Injection) दिया जा सकता है, जिसे दुनिया के कई देशों में अपनाया जा चुका है।
इसके अलावा, याचिका में यह भी सुझाव दिया गया है कि दोषी को गोली मारकर, इलेक्ट्रिक चेयर या फिर जहर के इंजेक्शन के जरिए मौत की सजा दी जा सकती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये तरीके तुलनात्मक रूप से कम पीड़ादायक और ज्यादा मानवीय हैं।
क्या कहता है भारतीय कानून
भारत में अभी तक मौत की सजा देने का एकमात्र कानूनी तरीका फांसी ही है। भारतीय दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता के तहत फांसी को वैध माना गया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि मौत की सजा केवल “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” मामलों में ही दी जानी चाहिए।
अब सवाल यह उठ रहा है कि जब सजा देने के नियम समय के साथ बदले हैं, तो क्या सजा देने के तरीके में भी बदलाव की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों मांगा केंद्र से जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को बेहद संवेदनशील मानते हुए केंद्र सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत चाहती है कि सरकार यह बताए कि मौजूदा फांसी प्रणाली को जारी रखना संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के तहत कितना सही है।
अदालत ने केंद्र सरकार को तीन सप्ताह का समय दिया है ताकि वह इस मुद्दे पर कानूनी, सामाजिक और नैतिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपना पक्ष रख सके।
समाज और कानून के बीच टकराव
यह मामला सिर्फ कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की सोच और नैतिकता से भी जुड़ा हुआ है। एक तरफ पीड़ितों को न्याय दिलाने की बात है, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी है कि क्या किसी दोषी को सजा देते वक्त भी मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
कई कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि मौत की सजा अपने आप में अंतिम और कठोर सजा है, ऐसे में उसे देने का तरीका कम से कम पीड़ादायक होना चाहिए।
लाल किला हमला केस में भी सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने एक और अहम मामले में सुनवाई पर सहमति जताई। यह मामला 2000 के लाल किला आतंकी हमले से जुड़ा है। इस हमले में भारतीय सेना के तीन जवान शहीद हो गए थे।
इस केस में मौत की सजा पाए लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी मोहम्मद आरिफ की उपचारात्मक याचिका पर सुनवाई करने के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार हो गया है।
कौन है मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक
मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक को अक्टूबर 2005 में निचली अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी। बाद में सितंबर 2007 में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
आरिफ ने इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील और पुनर्विचार याचिका दायर की थी। हालांकि, 3 नवंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी।
अब क्या है उपचारात्मक याचिका
उपचारात्मक याचिका न्याय की अंतिम प्रक्रिया मानी जाती है। जब किसी दोषी की अपील और पुनर्विचार याचिका दोनों खारिज हो जाती हैं, तब वह उपचारात्मक याचिका दाखिल कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अब इस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई है और इस मामले में दिल्ली सरकार को नोटिस भी जारी किया गया है।
क्या फांसी के तरीके पर फैसला बदल सकता है इतिहास
फांसी के तरीके को लेकर यह सुनवाई भारतीय न्याय प्रणाली के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। अगर सुप्रीम कोर्ट इस पर कोई बड़ा फैसला देता है, तो यह देश में मौत की सजा के पूरे सिस्टम को बदल सकता है।
यह फैसला न सिर्फ मौजूदा दोषियों पर असर डालेगा, बल्कि भविष्य में दिए जाने वाले फैसलों की दिशा भी तय करेगा।
मानवाधिकार संगठनों की नजरें टिकीं
इस पूरे मामले पर मानवाधिकार संगठनों की भी नजर बनी हुई है। लंबे समय से ये संगठन फांसी की सजा और उसके तरीके को अमानवीय बताते आए हैं।
उनका मानना है कि अगर मौत की सजा पूरी तरह खत्म नहीं की जा सकती, तो कम से कम उसे देने का तरीका मानवीय और कम पीड़ादायक होना चाहिए।
अब सबकी नजरें केंद्र सरकार के जवाब पर टिकी हैं। तीन सप्ताह बाद जब सरकार अपनी लिखित दलीलें दाखिल करेगी, तब सुप्रीम कोर्ट इस पर आगे की सुनवाई करेगा।
संभावना है कि अदालत इस मुद्दे पर एक ऐतिहासिक फैसला दे, जो आने वाले समय में भारतीय दंड प्रणाली को नई दिशा दे सकता है।
फांसी देने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह सुनवाई सिर्फ एक कानूनी बहस नहीं है, बल्कि यह इंसानियत, संविधान और न्याय के मूल सिद्धांतों से जुड़ा सवाल है। आने वाले दिनों में इस मामले पर जो भी फैसला आएगा, वह भारतीय कानून के इतिहास में एक अहम अध्याय साबित हो सकता है।
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