Right to Disconnect Bill 2025: हाल में संसद (Lok Sabha) में एक नया विधेयक पेश किया गया है – राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2025। इस बिल का मकसद है – काम के घंटे खत्म होने के बाद कर्मचारी को काम-संबंधित कॉल, ई-मेल या मैसेज का जवाब देने की बाध्यता नहीं होना। यानी, ऑफिस समय से बाहर डिजिटल काम का बोझ हटाना।
बिल की पृष्ठभूमि में आज के समय का बदलता हुआ कार्य-संस्करण और डिजिटल युग का दबाव है। अब अधिकतर लोगों का काम सिर्फ 9–5 तक सीमित नहीं रहा; दिन भर मोबाइल, ई-मेल, मीटिंग्स आदि से जुड़े रहना पड़ता है। इस कारण “वर्क–लाइफ बैलेंस” बिगड़ रहा है – काम का तनाव, मानसिक थकावट, निजी जीवन में असंतुलन, परिवार या खुद के लिए समय न मिलने जैसे हालात बन रहे हैं। बिल का उद्देश्य इसी तनाव और असंतुलन को कम करना है।
The Bill was first introduced on October 28, 2019. It comes at a time when remote work, digital communications, and “on-call culture” have become widespread.
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— Mint (@livemint) December 7, 2025
इस विधेयक में क्या–क्या प्रावधान हैं?
अगर यह बिल कानून बनता है, तो यह निम्न प्रमुख बातें सुनिश्चित करेगा:
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कर्मचारी – चाहे सरकारी हों या निजी क्षेत्र में – ऑफिस टाइम ख़त्म होने के बाद काम-संबंधित कॉल, ई-मेल या मैसेज का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं होंगे।
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इस अधिकार का उल्लंघन (माना जाए कि नियोक्ता कर्मचारी को ऑफिस के बाद संपर्क करता है और जवाब देने के लिए दबाव डालता है) करने पर कंपनी को दंड देना होगा – प्रस्तावित जुर्माना है: उनकी कुल रिम्यूनरेशन (वेतन आदि) का 1 प्रतिशत।
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यदि कर्मचारी ऑफिस के बाद काम करने के लिए सहमत होते हैं, तब उसे ओवरटाइम वेतन देना होगा – सामान्य वेतन दर के अनुसार।
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बिल में एक नए संस्थान की स्थापना का प्रावधान है – Employees’ Welfare Authority – जो इस अधिकार की रक्षा करेगा, नियम बनाएगा, उल्लंघन की निगरानी करेगा और जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप करेगा।
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इसके अलावा – जैसा कि प्रस्ताव है – ओवरलेट डिजिटल काम और सतत कनेक्टिविटी के दुष्प्रभाव (जैसे मानसिक तनाव, “बर्नआउट”, नींद न होने, पारिवारिक जीवन प्रभावित होना) को ध्यान में रखते हुए – काउंसलिंग और “डिजिटल-डिटॉक्स” जैसे उपायों पर भी जोर है।

इसके फायदे: क्यों है यह जरूरी?
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वर्क–लाइफ बैलेंस – सबसे बड़ा लाभ। ऑफिस के बाद काम और घर/पर्सनल ज़िंदगी में स्पष्ट विभाजन से, कर्मचारी अपने परिवार, स्वास्थ्य या खुद के शौक-रुचि को समय दे पाएंगे।
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मानसिक स्वास्थ्य पर सुधार – लगातार काम से जुड़े रहना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करता है। काम से “डिटैच” होने का कानूनी अधिकार मिलने से तनाव, थकान, घबराहट, नींद न आने जैसी समस्याओं में कमी हो सकती है।
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काम की गुणवत्ता में सुधार – जब कर्मचारी काम और आराम दोनों के बीच अच्छा संतुलन बनाएगा, तो वो ऑफिस में चुस्ती-फुर्ती के साथ काम करेगा – बजाय थके-हारे।
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न्याय और पारदर्शिता – ओवरटाइम या ऑफिस टाइम से बाहर काम का भुगतान सुनिश्चित हो, और अनैतिक दबाव ख़त्म हो – इससे कामगारों के अधिकार मजबूत होंगे।
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डिजिटल संस्कृति का सकारात्मक परिवर्तन – 24×7 उपलब्ध रहने की “आवश्यकता” को कानूनी रूप से सीमित कर, समाज में स्वस्थ काम-सोच और निजी ज़िंदगी के प्रति सम्मान बढ़ेगा।
चुनौतियाँ और सवाल: क्या सब ठीक रहेगा?
हालाँकि, बिल में अच्छी मंशा है, लेकिन इसके क्रियान्वयन और प्रभाव को लेकर कुछ चिंताएँ भी हो सकती हैं:
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यह अभी एक निजी सदस्य का बिल (private member’s bill) है, न कि सरकार द्वारा प्रस्तुत – ऐसे बिल अक्सर पारित नहीं होते या चर्चाओं के बाद खारिज हो जाते हैं। इसलिए अभी यह सिर्फ एक प्रस्ताव है; यह कानून बनना तय नहीं है।
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“काम के घंटों” (work hours) और “ऑफिस टाइम” की एक सामान्य रूप से परिभाषा तय करना मुश्किल हो सकता है – हर कंपनी में समय और काम की प्रकृति अलग होती है। यदि इस बात की स्पष्टता नहीं हुई, तो कर्मचारी और नियोक्ता दोनों के लिए भ्रम रह सकता है।
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कुछ ऐसे सेक्टर हैं जहाँ “हमेशा ऑन” रहना जरूरी है – जैसे हेल्थकेयर, इमरजेंसी सर्विसेज, मीडिया आदि। उन जगहों पर इस बिल को लागू करना, या उसके लिए अलग प्रावधान बनाना होगा।
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नियोक्ता दबाव बना सकते हैं – चाहे कानूनी रूप से जवाब देने का अधिकार हो, लेकिन काम की ज़रूरत के नाम पर कर्मचारियों को फोन और मेल करने का अनुरोध जारी रह सकता है। अगर निगरानी ढंग से न हो, तो यह सिर्फ कागज़ी अधिकार ही बनकर रह सकता है।
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ओवरटाइम भुगतान और निगरानी की प्रक्रिया का प्रबंधन – कई कंपनियों, ख़ासकर छोटे व्यवसायों में – मुश्किल हो सकता है; जिससे विवाद, गलतफहमी या काम में ढील हो सकती है।
सामाजिक और व्यावसायिक मायने: भारत के लिए क्यों अहम है आज?
भारत में बदलती आर्थिक संरचना, बढ़ता कॉर्पोरेट या डिजिटल-काम (IT, BPO, स्टार्टअप, आदि) – इन सबके कारण अब ज़्यादातर लोग सिर्फ 9 से 5 तक नहीं, बल्कि 7 दिन × 24 घंटे “कनेक्टेड” रहते हैं। फोन, व्हाट्सऐप, ई-मेल, मीटिंग्स, वर्क-अपडेट्स – घर हो या ऑफिस – समस्या हो गई है कि “कभी विराम” नहीं मिलता। ऐसे में पारिवारिक जीवन, स्वास्थ्य, सामाजिक समय – सब प्रभावित हो रहे हैं।
अगर राइट टू डिस्कनेक्ट बिल पारित हो जाए, तो यह सिर्फ कॉर्पोरेट कर्मचारियों के लिए नहीं, बल्कि सरकार, सोशल-वर्कर्स, सेवा-क्षेत्र और अन्य अनियमित समय कार्य करने वालों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा कि “काम के बाद काम नहीं” करना कानूनी अधिकार है।
इसके अलावा, यह विचार एक सकारात्मक कदम होगा – यह दिखाएगा कि भारत में अब सिर्फ अधिक काम करना ही लक्ष्य नहीं, बल्कि “सही समय पर काम और सही समय पर आराम” भी अधिकार है। यह वर्क कल्चर, सामाजिक समझ, कार्य-प्रणाली और मानसिक स्वास्थ्य सभी के लिए बेहतर हो सकता है।
एक स्वागत योग्य पहल – पर अभी रास्ता लंबा: Right to Disconnect Bill 2025
राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2025 – अगर कानून बन जाता है – तो भारत में काम करने वालों के लिए एक बड़ा राहत भरा कदम हो सकता है। यह वर्क–लाइफ बैलेंस, मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक समय और काम की गुणवत्ता – सबको सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है।
लेकिन, अभी यह सिर्फ एक प्रस्ताव (private member’s bill) है – कानून बनने तक, इस पर बहस, सुधार, मंथन और व्यावहारिकता की जरूरत है।
हम – आम कर्मचारी, नौजवान, मेहनतकश – इस बिल के पक्ष में हैं। लेकिन साथ ही उन परिलक्षित चुनौतियों और काम की वास्तविकता को भी समझते हैं। यदि सही रूप में लागू किया जाए – यानी स्पष्ट नियम, निगरानी, जिम्मेदारी, पारदर्शिता के साथ – तो यह सिर्फ एक संगीन बिल नहीं, बल्कि बदलती सोच और बेहतर भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
आशा है कि आने वाले समय में संसद और सरकार – कर्मचारियों, नियोक्ताओं, और सामाजिक हितधारकों के साथ मिलकर – इस तरह की कार्य-संस्कृति सुधारों पर आगे बढ़ेंगे।
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