Remembering Mannathu Padmanabhan on His 148th Birth Anniversary: भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका योगदान समय की सीमाओं से परे होता है। ऐसे ही महान समाज सुधारक थे मन्नाथु पद्मनाभन, जिनकी 148वीं जयंती पूरे देश, विशेषकर केरल में, श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई। इस अवसर पर राजनीतिक और सामाजिक जीवन से जुड़े कई प्रमुख नेताओं ने उन्हें याद किया और उनके विचारों को आज भी प्रासंगिक बताया।

प्रारंभिक जीवन और विचारधारा:
मन्नाथु पद्मनाभन का जन्म वर्ष 1878 में केरल में हुआ था। उस समय समाज गहरे जातिगत भेदभाव, सामाजिक असमानता और रूढ़ियों से जकड़ा हुआ था। पद्मनाभन ने बहुत कम उम्र में ही यह समझ लिया था कि समाज की प्रगति के लिए शिक्षा, संगठन और आत्मसम्मान सबसे जरूरी हैं। उन्होंने अपना जीवन सामाजिक सुधारों और वंचित वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।
नायर सर्विस सोसाइटी की स्थापना:
1914 में मन्नाथु पद्मनाभन ने नायर सर्विस सोसाइटी (NSS) की स्थापना की। यह संगठन केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका उद्देश्य पूरे समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देना था। NSS के माध्यम से उन्होंने स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों और छात्रावासों की स्थापना की, जिससे हजारों लोगों को शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हो सकीं।
शिक्षा और महिला सशक्तिकरण पर जोर:
पद्मनाभन का मानना था कि जब तक महिलाएं शिक्षित और सशक्त नहीं होंगी, तब तक समाज वास्तविक प्रगति नहीं कर सकता। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई अभियान चलाए। उस दौर में, जब महिलाओं का स्कूल जाना भी एक चुनौती था, उन्होंने समाज को यह समझाने का प्रयास किया कि शिक्षित महिलाएं ही मजबूत परिवार और समृद्ध समाज की नींव रखती हैं।
सामाजिक आंदोलनों और सत्याग्रह में भूमिका:
मन्नाथु पद्मनाभन केवल विचारक ही नहीं, बल्कि एक कर्मठ आंदोलनकारी भी थे। उन्होंने केरल में कई महत्वपूर्ण सत्याग्रहों का नेतृत्व किया, जिनका उद्देश्य सामाजिक समानता और धार्मिक स्वतंत्रता स्थापित करना था। मंदिर प्रवेश आंदोलन में उनकी भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। उन्होंने हर वर्ग के लोगों के लिए मंदिरों के द्वार खोलने की मांग की और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई।
Paid floral tributes to Bharata Kesari Mannathu Padmanabhan on the occasion of his 149th birth anniversary.
It was a privilege and honour to be part of the Mannam Jayanthi celebrations at the NSS Headquarters in Perunna, Changanassery and to commemorate the life and legacy of a… pic.twitter.com/2GywQSjF2q
— Rajeev Chandrasekhar 🇮🇳 (@RajeevRC_X) January 2, 2026
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान:
पद्मनाभन ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय भूमिका निभाई। वे महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित थे और अहिंसा तथा सत्य के मार्ग पर चलकर सामाजिक परिवर्तन में विश्वास रखते थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई आंदोलनों का समर्थन किया और लोगों को राष्ट्रीय एकता के लिए प्रेरित किया।
राष्ट्रीय सम्मान और अंतिम वर्ष:
उनके अद्वितीय सामाजिक योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1966 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके जीवनभर के संघर्ष और समाज के लिए किए गए कार्यों की मान्यता था। 1970 में उनके निधन के साथ एक युग का अंत जरूर हुआ, लेकिन उनके विचार और कार्य आज भी जीवित हैं।
148वीं जयंती पर नेताओं की श्रद्धांजलि:
मन्नाथु पद्मनाभन की 148वीं जयंती के अवसर पर नायर सर्विस सोसाइटी के मुख्यालय में विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि पद्मनाभन का जीवन समानता, शिक्षा और सामाजिक न्याय की प्रेरणा देता है। उन्होंने समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने का जो सपना देखा था, वह आज भी भारत के लिए मार्गदर्शक है।
गृह मंत्री अमित शाह ने भी पद्मनाभन के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने सामाजिक सुधारों के जरिए एक अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी समाज की नींव रखी। कांग्रेस नेताओं, सांसद शशि थरूर और अन्य प्रमुख हस्तियों ने भी इस अवसर पर एकजुट होकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। यह दृश्य अपने आप में यह दर्शाता है कि मन्नाथु पद्मनाभन की विरासत राजनीति से ऊपर है।
आज के संदर्भ में प्रासंगिकता:
आज जब भारत तेजी से विकास की ओर बढ़ रहा है, तब भी सामाजिक समानता, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दे उतने ही महत्वपूर्ण हैं। मन्नाथु पद्मनाभन का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा विकास केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी होना चाहिए। उनके विचार आज के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
मन्नाथु पद्मनाभन केवल एक समाज सुधारक नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी नेता थे, जिन्होंने अपने विचारों और कार्यों से समाज को नई दिशा दी। उनकी 148वीं जयंती हमें यह याद दिलाती है कि समानता, शिक्षा और न्याय के लिए किया गया संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता। यदि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएं, तो निश्चित रूप से एक अधिक समतामूलक और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण कर सकते हैं।
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