Raat Akeli Hai Review: हिंदी सिनेमा में जब भी थ्रिलर और मर्डर मिस्ट्री की बात होती है, तो अक्सर कहानी सिर्फ “कातिल कौन?” तक सीमित रह जाती है। लेकिन निर्देशक हनी त्रेहन की फिल्म “रात अकेली है: द बंसल मर्डर्स” इस दायरे से आगे जाकर अपराध को समाज, वर्ग और अधिकारबोध (एंटाइटलमेंट) से जोड़ती है। यह फिल्म न सिर्फ एक हत्या की गुत्थी सुलझाने की कोशिश करती है, बल्कि उस मानसिकता को भी उजागर करती है जो ताकत, पैसा और सामाजिक हैसियत के दम पर खुद को कानून और नैतिकता से ऊपर समझती है।

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Toggleकहानी की बुनियाद:
फिल्म की कहानी एक हाई-प्रोफाइल मर्डर केस के इर्द-गिर्द घूमती है। बंसल परिवार, जो समाज में प्रतिष्ठित और संपन्न माना जाता है, अचानक एक जघन्य अपराध के केंद्र में आ जाता है। इसी केस की जांच की जिम्मेदारी मिलती है एक शांत, अंतर्मुखी और अनुभव से भरे पुलिस अधिकारी- जांच अधिकारी जटिल यादव- को, जिसे निभाया है नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने।
कहानी धीरे-धीरे परतें खोलती है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे परिवार के हर सदस्य, उनके रिश्ते, छिपे राज़ और आपसी तनाव सामने आने लगते हैं। यह सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं रहती, बल्कि एक ऐसे समाज का आईना बन जाती है जहाँ अपराध अक्सर विशेषाधिकार की आड़ में छुपा रहता है।
Raat Akeli Hai 2 review: The Bansal Murders is a carefully crafted crime thriller that makes you love the devil in the details, whether in how they lead to the killer or in how they quietly unveil the film’s social commentary! pic.twitter.com/DH1ohdckk0
— Social Ketchup Binge (@KetchupBinge) December 19, 2025
नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का संयमित अभिनय:
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी। उन्होंने जांच अधिकारी के किरदार को किसी बड़े नाटकीय अंदाज़ में नहीं, बल्कि बेहद संयम और ठहराव के साथ निभाया है। उनका चेहरा कम बोलता है, लेकिन आँखें और बॉडी लैंग्वेज बहुत कुछ कह जाती हैं। वह न तो गुस्से में दिखते हैं और न ही जरूरत से ज्यादा भावुक- उनकी यह “फ्लैगमैटिक” (शांत लेकिन सतर्क) उपस्थिति फिल्म को एक यथार्थवादी आधार देती है।
नवाज़ुद्दीन का किरदार दर्शक को भरोसा दिलाता है कि असली दुनिया के पुलिस अधिकारी भी ऐसे ही होते हैं—कम शब्दों में, ज्यादा निरीक्षण के साथ काम करने वाले। यह भूमिका उनके करियर की यादगार परफॉर्मेंस में से एक मानी जा सकती है।

निर्देशन और सामाजिक टिप्पणी:
हनी त्रेहन का निर्देशन इस फिल्म को साधारण थ्रिलर बनने से बचाता है। वह अपराध को केवल व्यक्तिगत कृत्य के रूप में नहीं दिखाते, बल्कि उसे सामाजिक ढांचे से जोड़ते हैं। फिल्म बार-बार इस सवाल को उठाती है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है? और क्या समाज के ताकतवर लोग खुद को जवाबदेही से ऊपर समझते हैं?
बंसल परिवार के सदस्य इस अधिकारबोध का प्रतीक हैं। उनके लिए नैतिकता एक लचीला विचार है, जिसे सुविधा के अनुसार मोड़ा जा सकता है। फिल्म इसी मानसिकता को उजागर करती है- जहाँ पैसा और प्रतिष्ठा अपराध को ढकने का साधन बन जाते हैं।
गति और कमज़ोरियाँ:
हालाँकि फिल्म की कहानी मजबूत है, लेकिन इसकी गति (पेसिंग) हर जगह संतुलित नहीं लगती। कुछ हिस्सों में कहानी बहुत धीमी हो जाती है, जिससे दर्शकों का धैर्य थोड़ा परखा जाता है। कुछ सब-प्लॉट्स ऐसे भी हैं जिन्हें और कसकर प्रस्तुत किया जा सकता था।
फिर भी, यह धीमापन पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। यह फिल्म के मूड और वातावरण को गहराई देता है, जिससे दर्शक किरदारों के मनोविज्ञान को बेहतर समझ पाते हैं।
सिनेमैटोग्राफी और माहौल:
फिल्म का दृश्य पक्ष भी सराहनीय है। रात, अंधेरा, बंद कमरे और सीमित रोशनी—ये सब मिलकर एक बेचैन करने वाला माहौल बनाते हैं। यह माहौल कहानी के शीर्षक “रात अकेली है” को भी सार्थक करता है। हर किरदार अपनी-अपनी रात में अकेला है, अपने राज़ और अपराध के बोझ के साथ।
बैकग्राउंड स्कोर ज़रूरत से ज्यादा हावी नहीं होता, बल्कि सीन के तनाव को धीरे-धीरे बढ़ाता है। यह सादगी फिल्म की गंभीरता के अनुकूल है।
“रात अकेली है: द बंसल मर्डर्स” एक ऐसी फिल्म है जो दर्शक से धैर्य और ध्यान की मांग करती है। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करने वाला सिनेमा है। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का सधा हुआ अभिनय, हनी त्रेहन का संवेदनशील निर्देशन और फिल्म की सामाजिक टिप्पणी इसे एक साधारण मर्डर मिस्ट्री से कहीं आगे ले जाती है।
अगर आप तेज़-रफ्तार थ्रिलर के बजाय परतदार कहानी, यथार्थवादी अभिनय और समाज पर सवाल उठाने वाली फिल्मों में रुचि रखते हैं, तो यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए। यह हमें याद दिलाती है कि अपराध सिर्फ कानून का उल्लंघन नहीं होता—कभी-कभी वह समाज की चुप्पी और विशेषाधिकार से भी जन्म लेता है।
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