Polygraph Tests in Indian Bodybuilding: भारत में बॉडीबिल्डिंग की दुनिया लगातार बदल रही है। जहां पहले केवल मांसपेशियों का आकार और प्रस्तुति मायने रखती थी, वहीं अब “नेचुरल बॉडीबिल्डिंग” की विश्वसनीयता पर ज़ोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में हाल ही में एक बड़ा कदम उठाया गया है – कुछ भारतीय नेचुरल बॉडीबिल्डिंग आयोजनों में पॉलिग्राफ टेस्ट (Polygraph Test) को शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रतियोगी किसी भी प्रकार के स्टिरॉइड या प्रदर्शन-वर्धक दवाओं (Performance Enhancing Drugs) का उपयोग न कर रहे हों।

पॉलिग्राफ टेस्ट क्या होता है:
पॉलिग्राफ टेस्ट जिसे आम भाषा में “लाई डिटेक्टर टेस्ट” कहा जाता है, एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके दौरान व्यक्ति से प्रश्न पूछते समय उसके शरीर की कुछ शारीरिक प्रतिक्रियाओं को मापा जाता है। इसमें हृदय गति, रक्तचाप, श्वसन गति और त्वचा पर आने वाले पसीने के स्तर को रिकॉर्ड किया जाता है।
टेस्ट का मूल सिद्धांत यह है कि जब कोई व्यक्ति झूठ बोलता है, तो उसके शरीर की प्रतिक्रियाएँ बदल जाती हैं – उदाहरण के लिए, नाड़ी की गति तेज़ हो जाती है या पसीना बढ़ जाता है। इस आधार पर परीक्षक यह अनुमान लगाता है कि व्यक्ति ने सही जवाब दिया या नहीं।
हालाँकि यह टेस्ट 100% सटीक नहीं माना जाता, फिर भी कई देशों में इसे नेचुरल बॉडीबिल्डिंग में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए प्रयोग किया जा रहा है।
भारत में बॉडीबिल्डिंग का बदलता चेहरा: Polygraph Tests in Indian Bodybuilding
पिछले कुछ वर्षों में भारत में बॉडीबिल्डिंग का स्तर तेजी से बढ़ा है। छोटे शहरों से लेकर बड़े महानगरों तक जिम संस्कृति का प्रसार हुआ है। लेकिन इसी के साथ स्टिरॉइड और प्रतिबंधित पदार्थों के उपयोग ने भी चिंताओं को जन्म दिया है।
“नेचुरल” शब्द अब हर प्रतियोगिता की पहचान बन गया है, परंतु सच्चाई यह है कि कई प्रतियोगिताओं में यह दावा केवल कागज़ों पर रह जाता है। इस अविश्वास को दूर करने के लिए आयोजक अब आधुनिक तकनीक का सहारा ले रहे हैं, और इसी में पॉलिग्राफ टेस्ट को एक महत्वपूर्ण हथियार के रूप में देखा जा रहा है।
भारतीय आयोजनों में पॉलिग्राफ की शुरुआत:
हाल ही में कुछ नेचुरल बॉडीबिल्डिंग इवेंट्स जैसे कि WNBF India और अन्य स्वतंत्र आयोजनों ने पॉलिग्राफ टेस्ट को अपनी चयन प्रक्रिया का हिस्सा बनाया है। इन आयोजनों में प्रत्येक प्रतिभागी को मंच पर आने से पहले इस टेस्ट से गुजरना पड़ता है।
टेस्ट का मकसद यह जांचना होता है कि प्रतिभागी ने बीते वर्षों में किसी भी प्रतिबंधित पदार्थ का उपयोग किया है या नहीं। यदि टेस्ट में किसी प्रकार की शंका उत्पन्न होती है, तो उस प्रतिभागी को अलग से ब्लड या यूरिन टेस्ट के लिए भेजा जाता है।
इस तरह की प्रणाली से प्रतियोगिता की पारदर्शिता बढ़ती है और दर्शकों तथा खिलाड़ियों का विश्वास भी मजबूत होता है।
पॉलिग्राफ टेस्ट कैसे कराया जाता है:
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पूर्व-सहमति: खिलाड़ी से लिखित अनुमति ली जाती है कि वह स्वेच्छा से टेस्ट में भाग ले रहा है।
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सवाल-जवाब की प्रक्रिया: प्रशिक्षित विशेषज्ञ द्वारा तय प्रश्न पूछे जाते हैं, जैसे- “क्या आपने पिछले एक वर्ष में कोई प्रतिबंधित पदार्थ लिया है?”, “क्या आपने किसी अवैध इंजेक्शन या दवा का प्रयोग किया है?”
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शारीरिक संकेतों का रिकॉर्ड: टेस्ट के दौरान शरीर के संकेत मॉनिटर से जोड़े जाते हैं, जिससे हर प्रश्न पर प्रतिक्रियाएं दर्ज होती हैं।
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विश्लेषण और निर्णय: परिणाम के आधार पर यह तय किया जाता है कि खिलाड़ी “साफ” है या संदिग्ध।
इस कदम के फायदे:
(i) पारदर्शिता में वृद्धि:
जब आयोजक खुद यह दिखाते हैं कि वे ईमानदार प्रतियोगिता के लिए तैयार हैं, तो खिलाड़ियों और दर्शकों का भरोसा भी बढ़ता है।
(ii) नेचुरल खिलाड़ियों को सुरक्षा:
वे खिलाड़ी जो सच्चे अर्थों में मेहनत से शरीर बनाते हैं, उन्हें अब अनुचित प्रतिस्पर्धा से राहत मिलती है।
(iii) भारत में अंतरराष्ट्रीय मानक:
पॉलिग्राफ टेस्ट पहले से ही अमेरिका और यूरोप के नेचुरल बॉडीबिल्डिंग फेडरेशन में लागू है। भारत में इसका आना एक सकारात्मक संकेत है कि हमारा खेल अब वैश्विक मानकों की ओर बढ़ रहा है।
(iv) प्रतिबंधित दवाओं के खिलाफ संदेश:
यह टेस्ट साफ संदेश देता है कि जो भी खिलाड़ी अवैध साधनों का उपयोग करेगा, उसे मंच पर जगह नहीं मिलेगी।
चुनौतियाँ और सीमाएँ:
हालांकि यह पहल सराहनीय है, लेकिन कुछ चुनौतियाँ भी सामने हैं।
(i) सटीकता का सवाल:
पॉलिग्राफ टेस्ट हमेशा सही परिणाम नहीं देता। तनाव या घबराहट के कारण भी कई बार “फाल्स पॉजिटिव” परिणाम आ सकते हैं।
(ii) कानूनी वैधता:
भारत में पॉलिग्राफ को कानूनी रूप से निर्णायक सबूत नहीं माना जाता। इसलिए यदि कोई खिलाड़ी परिणाम को चुनौती देता है, तो आयोजकों को कठिनाई हो सकती है।
(iii) लागत और प्रबंधन:
हर प्रतियोगिता में प्रशिक्षित विशेषज्ञ और उपकरण उपलब्ध कराना महंगा पड़ सकता है। छोटे स्तर के आयोजनों के लिए यह आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण है।
(iv) खिलाड़ियों का मानसिक तनाव:
कई खिलाड़ी टेस्ट से पहले ही तनाव महसूस करते हैं, जिससे उनके प्रदर्शन और मानसिक स्थिति पर असर पड़ सकता है।
The Drugs Control Administration, #Telangana, conducted a *special drive* to detect the illegal stocking and sale of anabolic-androgenic steroids and #cardiacstimulants, such as #MephentermineSulphateInjection, being supplied to gym-goers for abuse in #bodybuilding.… pic.twitter.com/dB0LgVUm2h
— NewsMeter (@NewsMeter_In) October 24, 2025
आगे का रास्ता:
अगर भारत में पॉलिग्राफ टेस्ट को स्थायी रूप से अपनाना है, तो कुछ कदम आवश्यक हैं:
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राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनाना: भारतीय बॉडीबिल्डिंग फेडरेशन को स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने चाहिए।
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संयुक्त परीक्षण प्रणाली: पॉलिग्राफ के साथ-साथ यूरिन और ब्लड टेस्ट को भी अनिवार्य किया जाए ताकि परिणाम अधिक भरोसेमंद हों।
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विशेषज्ञ प्रशिक्षण: आयोजकों को प्रमाणित विशेषज्ञों की मदद लेनी चाहिए ताकि प्रक्रिया निष्पक्ष और तकनीकी रूप से सही हो।
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पारदर्शिता बनाए रखना: प्रतिभागियों और दर्शकों के सामने पूरी प्रक्रिया स्पष्ट रूप से रखी जानी चाहिए।
भारतीय बॉडीबिल्डिंग अब उस दौर में प्रवेश कर रही है जहाँ ईमानदारी ही सबसे बड़ी ताकत मानी जाएगी। पॉलिग्राफ टेस्ट इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल नेचुरल बॉडीबिल्डिंग को नई विश्वसनीयता मिलेगी, बल्कि यह उन खिलाड़ियों के लिए भी प्रेरणा बनेगा जो मेहनत के दम पर नाम कमाना चाहते हैं।
हालाँकि यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है और इसमें सुधार की जरूरत है, लेकिन अगर इसे सही तरीके से अपनाया गया तो यह भारतीय फिटनेस उद्योग की विश्वसनीयता को एक नई ऊँचाई पर पहुँचा सकती है।
आने वाले समय में पॉलिग्राफ टेस्ट सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं रहेगा, यह “नेचुरल बॉडीबिल्डिंग” की पहचान और सम्मान का प्रतीक बन जाएगा।
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