Pollution And Cloud Seeding: कृत्रिम वर्षा से दिल्ली में राहत की नई कोशिश

Pollution And Cloud Seeding: हर साल दिवाली के बाद दिल्ली का आसमान धुएँ और धुंध की मोटी चादर में ढक जाता है। आतिशबाज़ी, पराली जलाने और ठंडी हवाओं के रुकने से हवा में प्रदूषक कणों की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ जाती है। 2025 की दिवाली के बाद भी यही हुआ – दिल्ली का AQI (Air Quality Index) कई इलाकों में 600 से ऊपर दर्ज किया गया, जो ‘Severe+’ श्रेणी में आता है।

Pollution And Cloud Seeding

इस स्थिति ने सरकार और वैज्ञानिक संस्थाओं को एक बार फिर मजबूर किया कि वे क्लाउड सीडिंग (Cloud Seeding) यानी कृत्रिम वर्षा की योजना पर तेजी से काम करें। यह तकनीक फिलहाल प्रदूषण से अस्थायी राहत का एक नया प्रयास मानी जा रही है।

क्लाउड सीडिंग क्या है? 

क्लाउड सीडिंग एक वैज्ञानिक तकनीक है जिसके ज़रिए बादलों में कृत्रिम रूप से सिल्वर आयोडाइड (Silver Iodide), सोडियम क्लोराइड (NaCl) या पोटैशियम आयोडाइड (KI) जैसे रासायनिक पदार्थ छोड़े जाते हैं। इन कणों से बादलों के अंदर मौजूद जलवाष्प संघनित होकर पानी की बूंदों में बदल जाता है, जिससे कृत्रिम वर्षा (Artificial Rain) होती है।

यह प्रक्रिया तब की जाती है जब बादल तो मौजूद हों लेकिन उनमें बारिश करने की क्षमता पर्याप्त न हो। सही मौसमीय परिस्थितियाँ मिलने पर यह तकनीक प्राकृतिक बारिश जैसी ही वर्षा करा सकती है।

दिवाली के बाद दिल्ली की हवा क्यों हुई जहरीली?

2025 की दिवाली के तुरंत बाद दिल्ली का वायु प्रदूषण फिर से खतरनाक स्तर पर पहुँच गया। इसके पीछे कई कारण थे —

  1. आतिशबाज़ी से उठता धुआँ:
    दिवाली की रात भारी मात्रा में फोड़े गए पटाखों ने हवा में PM2.5 और PM10 कणों की मात्रा कई गुना बढ़ा दी।

  2. पराली जलाने की समस्या:
    हरियाणा और पंजाब के खेतों में पराली जलाने की घटनाएँ नवंबर के पहले सप्ताह तक जारी रहीं। यह धुआँ दिल्ली की हवा में मिलकर स्मॉग (Smog) का रूप ले लेता है।

  3. मौसमी स्थिति:
    सर्दियों की शुरुआत में तापमान कम होने और हवा की गति धीमी होने से प्रदूषक कण ज़मीन के पास ही फँसे रह जाते हैं।

इन सभी कारणों से दिल्ली का AQI कई जगहों पर 600+ तक पहुँच गया – जैसे आनंद विहार, जहां AQI 660 रिकॉर्ड किया गया। यह स्तर सांस, आंख और हृदय रोगियों के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है।

क्लाउड सीडिंग क्यों चुना गया उपाय?

जब प्राकृतिक बारिश नहीं होती और प्रदूषण का स्तर नियंत्रित से बाहर चला जाता है, तो कृत्रिम वर्षा ही एकमात्र उम्मीद बन जाती है।

क्लाउड सीडिंग से अगर कुछ मिलीमीटर भी बारिश हो जाए तो यह हवा में मौजूद प्रदूषक कणों को नीचे बैठा देती है, जिससे AQI में अचानक सुधार देखा जा सकता है।

दिल्ली सरकार ने इस बार IIT कानपुर और भारतीय मौसम विभाग (IMD) के साथ मिलकर यह योजना तैयार की है कि दिवाली के बाद जैसे ही बादल बनें, तुरंत क्लाउड सीडिंग की प्रक्रिया शुरू की जा सके।

Pollution And Cloud Seeding: क्लाउड सीडिंग कैसे की जाती है?

  1. मौसम का अध्ययन:
    वैज्ञानिक सबसे पहले बादलों के प्रकार, नमी (humidity) और तापमान का विश्लेषण करते हैं।

  2. विमान या ड्रोन का उपयोग:
    जब मौसम अनुकूल पाया जाता है, तब विशेष विमानों या ड्रोन के जरिए सिल्वर आयोडाइड के सूक्ष्म कण बादलों में छोड़े जाते हैं।

  3. संघनन की प्रक्रिया:
    ये कण बादलों में बर्फ के नाभिक (ice nuclei) की तरह कार्य करते हैं, जिससे जलवाष्प बूंदों में बदलता है और अंततः वर्षा होती है।

दुनिया में क्लाउड सीडिंग के सफल उदाहरण:

  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE): रेगिस्तानी क्षेत्रों में बारिश बढ़ाने के लिए यह तकनीक लंबे समय से उपयोग में है।

  • चीन: 2008 बीजिंग ओलंपिक से पहले मौसम को नियंत्रित करने के लिए क्लाउड सीडिंग की गई थी।

  • अमेरिका: पश्चिमी राज्यों में सूखे से निपटने के लिए यह तकनीक नियमित रूप से अपनाई जाती है।

इन प्रयोगों से यह सिद्ध होता है कि क्लाउड सीडिंग व्यवहारिक रूप से संभव है, हालांकि इसकी सफलता पूरी तरह मौसम की अनुकूलता पर निर्भर करती है।

चुनौतियाँ और सीमाएँ:

  1. मौसम पर निर्भरता:
    क्लाउड सीडिंग तभी की जा सकती है जब पर्याप्त नमी और बादल मौजूद हों। अगर आसमान साफ है, तो यह तकनीक काम नहीं करती।

  2. अस्थायी समाधान:
    यह प्रदूषण की जड़ नहीं मिटाती — केवल हवा को कुछ दिनों के लिए साफ करती है।

  3. लागत और समन्वय:
    एक बार की प्रक्रिया पर लाखों रुपये का खर्च आता है और इसमें कई संस्थाओं के बीच तालमेल जरूरी होता है।

  4. पर्यावरणीय चिंता:
    यद्यपि सिल्वर आयोडाइड की मात्रा बहुत कम होती है, फिर भी लंबे समय तक इसके प्रभावों का अध्ययन आवश्यक है।

क्या कृत्रिम वर्षा सच में दिल्ली को राहत देगी?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मौसम अनुकूल रहा तो क्लाउड सीडिंग से प्रदूषण में 30–40% तक की अस्थायी कमी देखी जा सकती है।
हालांकि, यह केवल कुछ दिनों की राहत होगी।

प्रदूषण के स्थायी समाधान के लिए जरूरी है कि –

  • वाहनों से उत्सर्जन घटे,

  • पराली जलाने पर रोक लगे,

  • औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रित हो,

  • और शहरों में हरियाली बढ़े।

जनता और वैज्ञानिकों की राय:

दिल्ली की जनता में इस कदम को लेकर उम्मीद और जिज्ञासा दोनों हैं। कई लोग मानते हैं कि जब सांस लेना मुश्किल हो जाए, तो कोई भी राहत स्वागत योग्य है। वहीं कुछ पर्यावरणविद् कहते हैं कि क्लाउड सीडिंग से ध्यान स्थायी नीतियों से हट सकता है।

IIT कानपुर के वैज्ञानिकों के अनुसार, अगर सही समय पर किया जाए, तो यह तकनीक “Short-Term Relief, Not a Permanent Cure” साबित हो सकती है।

विज्ञान और जिम्मेदारी का संतुलन:

क्लाउड सीडिंग दिल्ली जैसे महानगरों के लिए एक नवोन्मेषी प्रयोग है। यह हमें यह एहसास कराता है कि जब इंसान की बनाई समस्या बहुत बड़ी हो जाए, तो समाधान भी विज्ञान से ही निकल सकता है।

परंतु, यह समाधान अस्थायी है। असली जरूरत है जागरूक नागरिकता, सख्त नीतियाँ, और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना

यदि हम प्रदूषण को जड़ से मिटाने के कदम नहीं उठाएंगे, तो हर साल दिवाली के बाद हमें क्लाउड सीडिंग जैसी आपात योजनाओं की जरूरत पड़ती रहेगी।

अंतिम संदेश:

क्लाउड सीडिंग हमें थोड़ी राहत ज़रूर दे सकती है, लेकिन साफ हवा के लिए हमें अपनी आदतें और नीतियाँ दोनों बदलनी होंगी। दिवाली की खुशी अगर प्रदूषण की परत में ढक जाए, तो त्यौहार का असली अर्थ ही खो जाता है।
समय आ गया है कि हम सब मिलकर कहें —
“स्वच्छ हवा, सबका अधिकार।”

WATCH | Delhi Conducts Successful Cloud Seeding Trial | Artificial Rain Project #delhinews | News18

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