भारत में पहली बार मिला 20 करोड़ साल पुराना Phytosaur जीवाश्म, जैसलमेर से उजागर हुआ जुरासिक युग का रहस्य

भारत में पहली बार मिला 20 करोड़ साल पुराना Phytosaur जीवाश्म: भारत के वैज्ञानिक जगत के लिए यह एक ऐतिहासिक क्षण है। राजस्थान के जैसलमेर ज़िले के मेघा गाँव में वैज्ञानिकों ने लगभग 20 करोड़ साल पुराना Phytosaur (फाइटोसॉर) का जीवाश्म खोजा है। यह खोज न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए दुर्लभ और मूल्यवान है। यह जीवाश्म जुरासिक युग का है और पहली बार भारत में इतने अच्छे ढंग से संरक्षित फाइटोसॉर अवशेष मिले हैं।

भारत में पहली बार मिला 20 करोड़ साल पुराना Phytosaur जीवाश्म
  भारत में पहली बार मिला 20 करोड़ साल पुराना        Phytosaur जीवाश्म

Phytosaur क्या था?

Phytosaur प्राचीन काल के जलीय और अर्ध-जलीय सरीसृप थे, जो आकार और रूप से मगरमच्छ जैसे दिखते थे। हालांकि वैज्ञानिकों के अनुसार ये मगरमच्छों के सीधे पूर्वज नहीं थे। ये जीव मुख्य रूप से दलदली नदियों, झीलों और झीलों के किनारों पर रहते थे। लंबी थूथन और नुकीले दांत इनके शिकार करने के तरीके को दर्शाते हैं। ये मछलियों और अन्य छोटे जीवों को खाते थे।

Phytosaur लगभग 200 मिलियन वर्ष पहले यानी ट्राइऐसिक और जुरासिक काल में मौजूद थे। माना जाता है कि इनका आकार कई बार 8 से 10 मीटर तक का भी होता था।

जैसलमेर में कैसे मिली यह खोज:

वैज्ञानिकों की एक टीम ने जैसलमेर ज़िले के मेघा गाँव में स्थित लाठी फॉर्मेशन (Lathi Formation) में खुदाई की। यह इलाका पहले से ही जीवाश्म और भूगर्भीय खोजों के लिए प्रसिद्ध है। खुदाई के दौरान वैज्ञानिकों को हड्डियों के अवशेष मिले, जिन्हें बारीकी से जांचने पर यह पुष्टि हुई कि यह Phytosaur का जीवाश्म है।

इस खोज की एक और बड़ी उपलब्धि यह रही कि यहाँ पर अंडे का अवशेष (egg fossil) भी मिला है। अंडे का मिलना बेहद दुर्लभ माना जाता है, क्योंकि यह जीव के प्रजनन व्यवहार और पारिस्थितिकी (ecology) के बारे में अनमोल जानकारी प्रदान करता है।

भारत में पहली बार:

अब तक भारत में Phytosaur के जीवाश्म बहुत कम और अधूरे रूप में मिले थे। लेकिन यह पहली बार है जब इतना अच्छी तरह संरक्षित (well-preserved) जीवाश्म खोजा गया है। इस वजह से इसे भारत के पैलियॉन्टोलॉजी (paleontology) यानी जीवाश्म विज्ञान के क्षेत्र में एक मील का पत्थर माना जा रहा है।

इस खोज से भारत की वैज्ञानिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी और जैसलमेर एक बार फिर वैश्विक मानचित्र पर पैलियॉन्टोलॉजी हब के रूप में स्थापित होगा।

वैज्ञानिक महत्व:

यह खोज हमें बताती है कि आज का थार रेगिस्तान कभी एक हरा-भरा और जलीय क्षेत्र था, जहाँ नदियाँ बहती थीं और विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु रहते थे। Phytosaur का जीवाश्म इस बात का सबूत है कि यहाँ पर प्राचीन काल में जलीय जीवन बेहद समृद्ध था।

इसके अलावा, इस जीवाश्म से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि उस समय की जलवायु (climate) कैसी थी, जीव कैसे प्रजनन करते थे और वे अन्य जीवों के साथ किस प्रकार से रहते थे। अंडे का जीवाश्म मिलने से यह जानकारी और भी गहरी होगी।

स्थानीय और वैश्विक महत्व:

जैसलमेर पहले से ही डायनासोर अंडों और अन्य जीवाश्मों की खोज के लिए जाना जाता है। यहाँ पाए गए Phytosaur जीवाश्म से यह इलाका वैज्ञानिकों के लिए और भी महत्वपूर्ण हो गया है।

दुनिया में भी Phytosaur के जीवाश्म बहुत सीमित जगहों पर मिले हैं। भारत का नाम अब उन देशों की सूची में शामिल हो गया है जहाँ इतने पुराने और संरक्षित फाइटोसॉर के प्रमाण मौजूद हैं। इससे वैश्विक स्तर पर भारतीय विज्ञान को नई पहचान मिलेगी।

भू-पर्यटन (Geo-Tourism) की संभावना:

इस खोज से जैसलमेर के पर्यटन को भी बड़ा लाभ हो सकता है। पहले से ही यहाँ रेगिस्तान और किलों की वजह से लाखों पर्यटक आते हैं। अब यदि जीवाश्म स्थलों को वैज्ञानिक पर्यटन (scientific tourism) से जोड़ा जाए, तो जैसलमेर दुनिया भर के शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए एक आकर्षण बन सकता है।

आगे की दिशा:

वैज्ञानिक अब इस जीवाश्म का गहन अध्ययन करेंगे। विशेष रूप से अंडे का विश्लेषण महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि इससे प्रजनन प्रणाली और अंडों के विकास की प्रक्रिया पर प्रकाश डाला जा सकता है। इसके अलावा, जीवाश्म की संरचना से यह समझने में भी मदद मिलेगी कि Phytosaur का शरीर किन परिस्थितियों में विकसित हुआ और यह कैसे नष्ट हुआ।

जैसलमेर से मिला Phytosaur जीवाश्म भारत के वैज्ञानिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ता है। यह खोज हमें बताती है कि थार का रेगिस्तान कभी जीवन से भरा हुआ था और यहाँ नदियाँ तथा झीलें बहती थीं। यह जीवाश्म न केवल प्रागैतिहासिक जीवन के रहस्यों को उजागर करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान का मजबूत आधार भी बनेगा।

भारत में पहली बार मिला यह 20 करोड़ साल पुराना Phytosaur जीवाश्म हमारे अतीत की अनकही कहानियों को सामने लाने वाला है। यह खोज आने वाले समय में भारतीय पैलियॉन्टोलॉजी और भू-पर्यटन दोनों के लिए वरदान साबित हो सकती है।

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