O Romeo Honest Review In Hindi: इश्क़ और इंतकाम के बीच भटकती एक कमजोर कहानी

O Romeo Honest Review In Hindi: कुछ फिल्में देखने के बाद दिल में सवाल नहीं, बल्कि अफसोस रह जाता है। ‘O’ Romeo’ उन्हीं में से एक है। यह फिल्म खूबसूरत है, खून से सनी है, शायरी में डूबी हुई है और अभिनय के लिहाज़ से कई जगह चौंकाती भी है। लेकिन 179 मिनट लंबी इस रोमांटिक-एक्शन ड्रामा के खत्म होते-होते यह एहसास गहरा हो जाता है कि फिल्म अपने वादे पूरे नहीं कर पाती।

निर्देशक Vishal Bhardwaj से उम्मीदें हमेशा ज़्यादा रहती हैं – Maqbool, Kaminey और Haider जैसी फिल्मों ने जो स्तर तय किया है, ‘O’ Romeo’ उसी कसौटी पर खुद को साबित नहीं कर पाती। यह एक ऐसी फिल्म है जो अतीत की महानता से प्रेरित ज़्यादा लगती है, वर्तमान की ज़रूरत से नहीं।

O Romeo Honest Review In Hindi

शेक्सपियर से मुंबई माफिया तक:

फिल्म शेक्सपियर के Romeo and Juliet की सीधी रीमेक नहीं है, बल्कि उसकी भावनात्मक संरचना उधार लेती है – अंधा प्रेम, तयशुदा विनाश और भाग्य के आगे बेबस इंसान। फर्क बस इतना है कि वेरोना की बालकनी की जगह यहां मुंबई का अंडरवर्ल्ड है, और गुलज़ार की पंक्तियाँ हैं – “नीचे पान की दुकान, ऊपर जूली का मकान”

कहानी गैंगस्टर हुसैन उस्तारा उर्फ रोमियो के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे Shahid Kapoor ने निभाया है। यह किरदार आंशिक रूप से हुसैन ज़ैदी की किताब Mafia Queens of Mumbai से प्रेरित है। रोमियो एक बेरहम हिटमैन है, लेकिन भीतर से टूटा हुआ, थका हुआ और प्यार के लिए तरसता इंसान भी।

शाहिद कपूर: फिल्म की सबसे बड़ी ताकत

अगर किसी वजह से ‘O’ Romeo’ देखी जानी चाहिए, तो वह हैं शाहिद कपूर। उनकी एंट्री बिजली की तरह होती है और उनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस फिल्म को बार-बार संभालती है। एक उग्र प्रेमी, क्रूर किलर और टूटे हुए इंसान के बीच झूलता उनका किरदार प्रभाव छोड़ता है।

चाहे एक्शन सीन हों या इमोशनल मोमेंट्स, शाहिद हर फ्रेम में जान डाल देते हैं। यहां तक कि एक तथाकथित आइटम नंबर में, जिसमें Disha Patani नजर आती हैं, वहां भी असली आकर्षण शाहिद ही हैं।

तृप्ति डिमरी का संयमित अभिनय:

अफशां के रोल में Tripti Dimri ने साबित किया है कि वह सिर्फ खूबसूरत चेहरा नहीं, बल्कि सशक्त कलाकार भी हैं। उनका किरदार निजी त्रासदी से जूझ रहा है और बदले की आग में जल रहा है। तृप्ति अपने अभिनय से उस दर्द को ईमानदारी से सामने लाती हैं।

हालांकि, पटकथा उन्हें उतनी गहराई नहीं देती, जितनी वह संभाल सकती थीं। रोमियो और अफशां की प्रेम कहानी कागज़ पर दिलचस्प लगती है, लेकिन परदे पर वह धीरे-धीरे ठंडी पड़ जाती है।

कहानी जो भटक जाती है:

यहीं फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है। विशाल भारद्वाज कहानी को बहुत देर तक “उबलने” देते हैं, लेकिन वह कभी पूरी तरह पकती नहीं।

इंटेलिजेंस ऑफिसर खान ( Nana Patekar ) और रोमियो की नोकझोंक कुछ हल्के-फुल्के पल देती है, लेकिन फिल्म का मूल संघर्ष कमजोर पड़ता जाता है।

गैंगस्टर जलाल, जिसे Avinash Tiwary ने निभाया है, शुरुआत में खतरनाक लगता है, लेकिन धीरे-धीरे वह सिर्फ एक “पेपर टाइगर” बनकर रह जाता है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आतंकवादी बन चुके जलाल का ट्रैक गंभीर मुद्दे छूता है, लेकिन गहराई में नहीं जाता।

बिखरी हुई भव्यता:

यह साफ दिखता है कि फिल्म को बड़े स्तर पर बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन इसी चक्कर में किरदारों की बारीकियाँ कुर्बान हो गईं। Tamannaah Bhatia का किरदार लगभग सजावटी बनकर रह जाता है।

एक्शन सीन्स “मासी” हैं, लेकिन आर्टहाउस अंदाज़ से मेल नहीं खाते। विशाल भारद्वाज की सिग्नेचर स्टाइल कई जगह आत्ममुग्ध (self-indulgent) लगती है।

सह-कलाकार और शायरी का जादू:

फिल्म में कुछ सह-कलाकार ज़रूर चमकते हैं। राहुल देशपांडे एक ठुमरी गाने वाले भ्रष्ट पुलिस अफसर के रूप में याद रहते हैं। हुसैन दलाल साइडकिक बनकर कुछ अच्छे वन-लाइनर्स देते हैं। और Farida Jalal को शरारत करने का पूरा मौका मिला है।

हमेशा की तरह Gulzar की शायरी दिल को छूती है – “सांस भी दुबली लगती है, हल्का-हल्का फीवर है” जैसी पंक्तियाँ देर तक याद रहती हैं। लेकिन अफसोस, वह “फीवर” कभी नसों तक नहीं पहुंचता।

‘O’ Romeo’ एक ऐसी फिल्म है जिसे देखकर आप उसके हिस्सों की तारीफ करते हैं, लेकिन पूरी फिल्म से जुड़ नहीं पाते। यह शाहिद कपूर की अभिनय क्षमता का शानदार शो-रील है, लेकिन विशाल भारद्वाज की फिल्मोग्राफी में यह एक कमजोर कड़ी साबित होती है।

जो दर्शक गहरे प्रेम, हिंसा और शायरी के संगम की उम्मीद लेकर आएंगे, उन्हें निराशा हाथ लग सकती है। यह फिल्म खूबसूरत दिखती है, लेकिन महसूस कम होती है।

रेटिंग: 2.5/5

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