Nobel Peace Prize 2025: मानवता ने सदियों से युद्ध, संघर्ष और हिंसा की मार झेली है। ऐसे में शांति को बढ़ावा देना सिर्फ एक आदर्श नहीं बल्कि ज़रूरी मिशन है। इसी उद्देश्य के साथ नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize) स्थापित किया गया। यह पुरस्कार उन व्यक्तियों या संगठनों को दिया जाता है जिनका योगदान शांति, मानवाधिकार, संघर्ष समाधान और मानव भाईचारे को बढ़ावा देने में अत्यंत महत्वपूर्ण हो। आइए जानते हैं इसका इतिहास, प्रक्रिया, कुछ विवाद और आज की चुनौतियाँ।

इतिहास: कैसे शुरू हुआ नोबेल शांति पुरस्कार | Nobel Peace Prize 2025
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अल्फ्रेड नोबेल नामक स्वीडिश आविष्कारक और उद्योगपति ने अपनी वसीयत (will) 1895 में तय किया कि उनकी संपत्ति से कुछ हिस्से का उपयोग पाँच नोबेल पुरस्कारों की स्थापना के लिए किया जाए — विज्ञान (रसायन विज्ञान, भौतिकी, जीवविज्ञान/चिकित्सा), साहित्य, और शांति।
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विशेष रूप से, नोबेल ने लिखा कि शांति पुरस्कार वह व्यक्ति या संगठन पाएगा जिसने पिछले वर्ष “राष्ट्रीयों के बीच भ्रातृत्व (fraternity between nations), स्थायी सेनाओं की कमी या समाप्ति (abolition or reduction of standing armies) और शांति सम्मेलनों (peace congresses) के आयोजन एवं प्रसार” में सबसे बड़ा योगदान किया हो।
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पहला नोबेल शांति पुरस्कार 1901 में दिया गया, और वह पुरस्कार हनी डुनेन्ट (Henri Dunant) और फ्रेडरिक पासी (Frédéric Passy) को मिला। Dunant ने युद्ध में घायल सैनिकों की सहायता और अंतरराष्ट्रीय समझ बढ़ाने का काम किया, जबकि Passy लंबे समय तक शांति सम्मेलनों और मध्यस्थता (diplomacy & arbitration) के माध्यम से की गई कामों के लिए जाना जाता था।
चयन प्रक्रिया और पुरस्कार की विशेषताएँ:
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पुरस्कार का चयन नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी करती है, जिसे नॉर्वे की संसद (Storting) नियुक्त करती है।
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नामांकन (nominations) विभिन्न पात्र लोगों या संगठनों द्वारा किए जाते हैं — जैसे कि पूर्व नोबेल विजेता, विश्व नेताओं, विश्वविद्यालय प्रोफेसर, मानवाधिकार संस्थाएँ आदि।
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पुरस्कार समारोह हर साल 10 दिसंबर को होता है, अल्फ्रेड नोबेल की मृत्यु की वर्षगाँठ पर। शांति पुरस्कार की घोषणा आमतौर पर अक्टूबर महीने में होती है।
महत्वपूर्ण उदाहरण और उपयोग:
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शांति पुरस्कार ने विश्व भर में शांति, मानवाधिकार और संघर्ष प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले संगठन और व्यक्तियों को मान्यता दी है। उदाहरण के लिए:
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यूनीसेफ (UNICEF) — 1965 में दुनिया भर के बच्चों के लिए काम और गरीबी के असमानता को कम करने के लिए।
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विली ब्रांट (Willy Brandt) — 1971 में, उन्होंने पूर्व और पश्चिम यूरोप के बीच संवाद स्थापित करने और विशेष रूप से जर्मनी-पूर्वी यूरोपीय देशों के साथ समझ का मार्ग बनाने में मदद की।
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मार्टिन लूथर किंग जूनियर (Martin Luther King Jr.) — 1964 में, अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलन के माध्यम से नस्लीय असमानता के खिलाफ अहिंसात्मक संघर्ष के लिए।
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अभी हाल ही में (2024) Nihon Hidankyo, जापान की एक संस्था को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला, जो परमाणु हथियारों की समाप्ति और बम विस्फोटों से बचे लोगों की गवाही देने के माध्यम से शांति की पैरवी कर रही है।
विवाद और आलोचनाएँ:
नोबेल शांति पुरस्कार जितना प्रशंसित है, उतना ही विवादित भी रहा है। कुछ विवादों की झलक इस प्रकार है:
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चयन में राजनीति का हस्तक्षेप
कुछ पुरस्कारों पर आलोचना हुई है कि चयन सिर्फ शांति के कार्यों के आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक स्थिति, वैश्विक रुझानों या बाहरी दबावों से प्रभावित होता है। -
महत्वपूर्ण व्यक्ति/चर्चित मामले न जाने देना
महात्मा गांधी, जिन्हें अहिंसा और शांति के प्रतीक माना जाता है, पाँच बार नामांकित होने के बाद भी कभी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं पा सके। यह omission इतिहास में एक बड़ी चूक मानी जाती है। -
रचनाएँ और प्रभाव का मापन
शांति के क्षेत्रों में काम मापन करना कठिन होता है — किस तरह से यह तय किया जाए कि कौन-सा प्रयास “सबसे बड़ा” है? कितने लोग प्रभावित हुए, कितनी जीवन बची — यह आंकड़े अक्सर पूरे संदर्भ में नहीं मिल पाते। -
पुरस्कार के समय की प्रासंगिकता
कभी-कभी पुरस्कार ऐसे समय में दिया जाता है जब शांति की स्थिति गंभीर नहीं हो, या भविष्य की प्रतिबद्धता की अपेक्षा होती हो — जिससे लोगों को लगता है कि पुरस्कार “symbolic” हो गया हो।
वर्तमान परिदृश्य: 2025 की उम्मीदें और चुनौतियाँ
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अभी नोबेल शांति पुरस्कार 2025 की वजह से चर्चा में है क्योंकि कई नामों का सुझाव हो रहा है।
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राजनीतिक बदलाव, संघर्ष क्षेत्रों (जैसे मध्य पूर्व, अफ्रीका), मीडिया की आज़ादी, शरणार्थी संकट, मानवाधिकार उल्लंघन — ये ऐसे विषय हैं जो अभी दुनिया भर में शांति पुरस्कार के लिए चर्चा के केंद्र में हैं।
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यह भी देखा जा रहा है कि पुरस्कार को सिर्फ “असमय या विवादित” घटनाओं के जवाब में न बनाये बल्कि ऐसे कामों को चुना जाए जो लंबे समय तक प्रभाव डालें।
शांति का वादा और हमारी जिम्मेदारियाँ:
नोबेल शांति पुरस्कार सिर्फ मान्यता नहीं, प्रेरणा है। यह याद दिलाता है कि शांति सिर्फ राज्य-स्तर की राजनीति या राजनयिक समझौतों से नहीं आती – बल्कि आम लोगों की मेहनत, मानवीय संवेदनाएँ, अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना, और दूसरे से भ्रातृत्व की भावना से आती है।
जब भी हमें शांति की राह पर चलने वालों की कहानियाँ सुनने को मिलें — चाहे वह किसी छोटे संगठन की हो, किसी शिक्षक की हो, किसी सामाजिक कार्यकर्ता की हो — हमें उन्हें सराहना चाहिए। क्योंकि शांति का काम सिर्फ इन पुरस्कारों से नहीं बनता, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में छोटे-छोटे फैसलों और संबंधों से बनता है।
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