Nithari Case Update – एक ऐसा नाम जो सुनते ही आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। साल 2005–2006 के बीच नोएडा के निठारी गांव में जो कुछ हुआ, उसने न केवल पूरे देश को हिला कर रख दिया, बल्कि भारत की जांच व्यवस्था, न्याय प्रक्रिया और मानवता पर गहरे सवाल भी खड़े कर दिए।
बच्चों के गायब होने, उनके कंकाल मिलने और इस केस में सामने आए आरोपों ने समाज के हर तबके को झकझोर दिया। पर आज, लगभग दो दशकों बाद, जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया है, तो फिर वही सवाल उठता है — क्या असली अपराधी आज़ाद घूम रहे हैं? क्या न्याय सच में हुआ?

निठारी कांड की शुरुआत कैसे हुई:
साल 2005 के अंत में नोएडा के सेक्टर-31 के निठारी गांव में अचानक बच्चों और महिलाओं के गायब होने की घटनाएं बढ़ने लगीं। शुरुआत में लोगों को लगा कि ये सामान्य अपहरण के मामले होंगे, लेकिन दिसंबर 2006 में सच्चाई का वो काला चेहरा सामने आया जब नाले के पास से कई बच्चों के कंकाल बरामद हुए।
स्थानीय लोगों ने पुलिस को बुलाया, और जैसे-जैसे खुदाई आगे बढ़ी, वैसे-वैसे ज़मीन से भयावह राज निकलते गए। 16 से ज़्यादा कंकाल, बच्चों के कपड़े, हड्डियां, खिलौने – सब कुछ वहां से मिला।
इस भयानक दृश्य ने पूरे देश को सन्न कर दिया। नोएडा का वो पॉश इलाका अचानक अपराध, अमानवीयता और दहशत का प्रतीक बन गया।
#WATCH | Supreme Court acquitted Surendra Koli yesterday; he was convicted in the 2006 Nithari serial killings case, and set aside his conviction.
In UP’s Noida, mother of a deceased says, “…Moninder (Moninder Singh Pandher) and Surendra (Surendra Koli) killed so many… pic.twitter.com/4MJHFCgHpq
— ANI (@ANI) November 12, 2025
मुख्य आरोपी कौन थे? Nithari Case Update
इस मामले में दो नाम सबसे ज़्यादा सामने आए –
-
मोनींदर सिंह पंढेर, जो एक उद्योगपति था और उस मकान का मालिक था जहाँ ये घटनाएं हुईं।
-
सुरेंद्र कोली, जो पंढेर का घरेलू नौकर था।
पुलिस ने शुरुआती जांच में कोली को “मुख्य अपराधी” बताया। आरोप लगे कि वह बच्चों को घर में लाता, उनकी हत्या करता, और शवों के टुकड़े कर नाले में फेंक देता। बाद में कई मीडिया रिपोर्ट्स में नरभक्षण (cannibalism) के भी आरोप लगे, हालांकि इसे अदालत में साबित नहीं किया जा सका।
जांच और न्यायिक प्रक्रिया: Nithari Case Update
घटना की गंभीरता को देखते हुए यह मामला सीबीआई (CBI) को सौंपा गया। सीबीआई ने अलग-अलग एफआईआर दर्ज कीं और कुल 16 मामलों में चार्जशीट दाखिल की।
सुरेंद्र कोली को लगभग हर केस में दोषी ठहराया गया और कई बार मौत की सज़ा भी सुनाई गई। मोनींदर सिंह पंढेर को भी कुछ मामलों में सज़ा सुनाई गई।
लेकिन जांच के दौरान कई गंभीर खामियां सामने आईं –
-
अपराध स्थल को सही तरीके से सुरक्षित नहीं रखा गया।
-
सबूतों की “चेन ऑफ कस्टडी” टूटी हुई थी।
-
डीएनए और फॉरेंसिक जांच में गड़बड़ियाँ रहीं।
-
पुलिस पूछताछ के दौरान कोली से जबरन कबूलनामे कराए जाने के आरोप लगे।
इन सब कारणों से इस केस की जांच की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला (2023):
साल 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुरेंद्र कोली और मोनींदर सिंह पंढेर दोनों को 12 मामलों में बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों ने उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया, और जो सबूत अदालत में पेश किए गए, वे “संशय से परे” साबित नहीं होते।
कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में समाज का दबाव और मीडिया ट्रायल न्याय की निष्पक्षता को प्रभावित नहीं करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला (2025): Nithari Case Update
नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने निठारी कांड के अंतिम लंबित मामले में भी सुरेंद्र कोली की दोषसिद्धि को रद्द करते हुए उसे रिहा करने का आदेश दिया।
कोर्ट ने कहा –
“अपराध भले ही कितना भी जघन्य क्यों न हो, लेकिन किसी व्यक्ति को सज़ा देने से पहले यह सिद्ध होना चाहिए कि वही अपराधी है। न्याय की नींव शक या अटकलों पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों पर टिकती है।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच एजेंसियों की लापरवाही के कारण असली अपराधी अब तक नहीं पकड़े जा सके। यह बात “न्याय प्रणाली के लिए बेहद खेदजनक” है।
पीड़ित परिवारों की व्यथा:
निठारी के पीड़ित परिवारों ने वर्षों तक न्याय की आस में अदालतों के चक्कर लगाए। कई परिवार आर्थिक रूप से टूट गए, कई माता-पिता अपने बच्चों की लाश तक नहीं देख पाए।
जब सुप्रीम कोर्ट ने सभी अभियुक्तों को बरी किया, तो इन परिवारों ने कहा –
“अगर ये दोषी नहीं हैं, तो फिर हमारे बच्चों को किसने मारा?”
यह सवाल आज भी हवा में तैर रहा है।
इस केस से हमें क्या सीख मिली:
-
वैज्ञानिक जांच की आवश्यकता:
पुलिस और जांच एजेंसियों को अब भी आधुनिक फॉरेंसिक उपकरणों और तकनीक की जरूरत है। घटनास्थल की सुरक्षा, डीएनए ट्रैकिंग और डिजिटल सबूतों का इस्तेमाल आज के दौर में अनिवार्य होना चाहिए। -
न्याय प्रणाली की निष्पक्षता:
किसी भी केस में जनभावनाओं या मीडिया के दबाव में आकर निर्णय नहीं होना चाहिए। अदालत ने इस केस में यही संदेश दिया। -
संविधानिक मूल्यों की रक्षा:
सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) की व्याख्या करते हुए कहा कि “किसी निर्दोष को सज़ा देना न्याय से बड़ा अपराध है।” -
पीड़ित परिवारों के पुनर्वास पर ध्यान:
ऐसे मामलों में सरकार और समाज दोनों को पीड़ित परिवारों को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक सहायता देनी चाहिए।
न्याय और समाज के बीच की दूरी:
निठारी कांड सिर्फ एक आपराधिक मामला नहीं था – यह हमारी सामाजिक असमानता, कानूनी तंत्र की कमजोरी और प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक भी बन गया।
जहाँ अमीर इलाकों में तुरंत कार्रवाई होती है, वहीं गरीब तबके के बच्चे गायब होते रहे और कोई परवाह नहीं करता रहा। अगर पुलिस ने शुरुआती शिकायतों को गंभीरता से लिया होता, तो शायद कई जानें बचाई जा सकती थीं।
निठारी कांड की कहानी एक चेतावनी है – कानून की लापरवाही और न्यायिक प्रक्रिया की देरी किस तरह से समाज के विश्वास को तोड़ देती है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय सबूतों की कमी के कारण दिया, लेकिन यह बात निश्चित है कि अपराध हुआ था, कई मासूमों की जान गई थी।
आज, जब सुरेंद्र कोली और मोनींदर पंढेर दोनों जेल से बाहर हैं, तब देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है – “क्या निठारी के असली गुनहगार अब भी आज़ाद हैं?”
यह मामला हमें सिखाता है कि न्याय सिर्फ “सज़ा देने” में नहीं, बल्कि “सही व्यक्ति को सज़ा देने” में है।
जब तक जांच प्रणाली मज़बूत नहीं होगी और संवेदनशीलता नहीं बढ़ेगी, तब तक निठारी जैसे दर्दनाक किस्से फिर दोहराए जा सकते हैं।
लेखक का संदेश:
निठारी कांड हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि “न्याय” सिर्फ अदालतों में नहीं, बल्कि समाज की ज़िम्मेदारी में भी बसता है। हमें हर उस आवाज़ को सुनना होगा जो चुपचाप किसी नाले के किनारे गुम हो जाती है।
ऐसे और भी National लेखों के लिए हमारे साथ जुड़े रहें! Khabari bandhu पर पढ़ें देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरें — बिज़नेस, एजुकेशन, मनोरंजन, धर्म, क्रिकेट, राशिफल और भी बहुत कुछ।
Faridabad RDX News: डॉक्टरों के फ्लैट से बरामद 360 किलो विस्फोटक ने हिलाया दिल्ली-NCR