Nepal Protest | नेपाल की संभावित अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की का पहला बयान: ‘मैं राष्ट्रहित में काम करने के लिए तैयार हूं’

Nepal Protest: नेपाल में पिछले कई दिनों से मचे बवाल और हिंसा ने आखिरकार देश की राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। सोशल मीडिया बैन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जेन-जी युवाओं के नेतृत्व में शुरू हुए बड़े आंदोलन ने न केवल सरकार को हिला कर रख दिया बल्कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को भी इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद से ही नेपाल में अंतरिम सरकार की चर्चा तेज हो गई थी। अब खबर यह है कि देश की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।

कार्की का नाम जेन-जी आंदोलनकारियों ने आगे बढ़ाया और अब उन्होंने खुद इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अपना पहला बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर उन पर भरोसा जताया गया है, तो वे राष्ट्रहित में काम करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

नेपाल में हिंसा और बदलाव का दौर | Nepal Protest

Nepal Protest

पिछले हफ्ते नेपाल सरकार ने अचानक 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर प्रतिबंध लगा दिया था। सरकार का कहना था कि ये प्लेटफॉर्म गलत सूचना और अफवाहों का केंद्र बन चुके हैं और कंपनियों ने देश में पंजीकरण की शर्तें पूरी नहीं की हैं। लेकिन यह फैसला युवाओं को नागवार गुजरा। इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में पले-बढ़े जेन-जी ने इसे अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना।

हजारों की संख्या में युवा सड़कों पर उतरे। राजधानी काठमांडू समेत कई शहरों में प्रदर्शन हिंसक हो गए। पुलिस और सुरक्षाबलों की कार्रवाई में अब तक 22 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों घायल हुए हैं। हालात बिगड़ते देख सेना को सड़कों पर उतारा गया और देशभर में कर्फ्यू लगा दिया गया।

इसी बीच प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और उनके मंत्रिमंडल ने इस्तीफा दे दिया। सरकार गिर चुकी है और अब देश को संभालने के लिए अंतरिम सरकार बनाने की कवायद शुरू हो गई है।

जेन-जी की ओर से सुशीला कार्की का नाम

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इस पूरे आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे राजनीतिक दलों ने नहीं, बल्कि युवाओं ने आगे बढ़ाया। जेन-जी समूह के प्रतिनिधियों ने चर्चा के बाद नेपाल की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया है।

युवाओं का मानना है कि कार्की एक ईमानदार और निष्पक्ष चेहरा हैं, जो न तो किसी राजनीतिक दल से जुड़ी रही हैं और न ही किसी वंशवादी राजनीति का हिस्सा रही हैं। यही कारण है कि उन्हें इस कठिन समय में देश को संभालने के लिए उपयुक्त माना जा रहा है।

सुशीला कार्की का पहला बयान

71 वर्षीय सुशीला कार्की ने इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा है कि जेन-जी युवाओं ने उन पर जो भरोसा जताया है, उससे वे अभिभूत हैं। उन्होंने साफ किया कि यदि उन्हें थोड़े समय के लिए सरकार का नेतृत्व सौंपा जाता है तो वे राष्ट्रहित में काम करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

कार्की ने कहा कि नेपाल इस समय जिस संकट से गुजर रहा है, उसमें केवल सामूहिक प्रयास ही समाधान ला सकते हैं। उन्होंने युवाओं की भूमिका को सराहा और कहा कि यह पीढ़ी अब केवल दर्शक नहीं रही, बल्कि परिवर्तन की असली ताकत बन चुकी है।

आर्मी चीफ से मुलाकात और राजनीतिक समीकरण

सूत्रों के मुताबिक जेन-जी प्रतिनिधियों और सेना प्रमुख के बीच इस मुद्दे पर निर्णायक बैठक होनी है। सेना प्रमुख ने इस बैठक के लिए नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल को भी आमंत्रित किया है। यह माना जा रहा है कि आंदोलनकारियों की ओर से पहले ही सुशीला कार्की के नाम पर सहमति बन चुकी है और अब सेना प्रमुख से मुलाकात के बाद इसे औपचारिक रूप दिया जाएगा।

हालांकि, इस नाम पर अभी भी कुछ विरोधाभास मौजूद हैं। नेपाल की पारंपरिक राजनीतिक पार्टियां अंतरिम सरकार में अपनी भूमिका चाहती हैं और वे एक गैर-राजनीतिक चेहरे को प्रधानमंत्री पद पर देख कर असहज हो सकती हैं।

कौन हैं सुशीला कार्की?

सुशीला कार्की नेपाल की जानी-मानी न्यायविद हैं। वे नेपाल के सुप्रीम कोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश रह चुकी हैं और इस पद पर पहुंचने वाली देश की पहली और अब तक की एकमात्र महिला हैं।

उन्होंने 11 जुलाई 2016 को मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला था। उनके कार्यकाल में न्यायपालिका को पारदर्शी और स्वतंत्र बनाने के कई प्रयास हुए।

कार्की की शिक्षा-दीक्षा भी बेहद मजबूत रही है। 1975 में उन्होंने भारत के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। इसके बाद 1978 में उन्होंने नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय से कानून में स्नातक किया। 1979 में उन्होंने विराटनगर से वकालत की शुरुआत की।

उनका पूरा करियर ईमानदारी, पारदर्शिता और निष्पक्षता के लिए जाना जाता है। यही कारण है कि आज के संकट में उन्हें युवाओं ने अपने भरोसे का केंद्र बनाया है।

जेन-जी और नेपाल का भविष्य

नेपाल की युवा पीढ़ी इस समय देश की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई है। करीब 40% आबादी जेन-जी समूह से आती है और यह वर्ग अब सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रह गया है।

इस पीढ़ी ने राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी का सबसे ज्यादा असर झेला है। 15 सालों में 14 सरकारें बदलने का अनुभव इसी पीढ़ी ने देखा है। यही वजह है कि अब वे मौजूदा व्यवस्था से समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं।

सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में चुनना युवाओं की इसी सोच को दर्शाता है। वे राजनीति के पुराने ढांचे को बदलकर एक नई पारदर्शी व्यवस्था चाहते हैं।

आगे की चुनौतियाँ

हालांकि, रास्ता आसान नहीं है।

नेपाल की न्यायपालिका, नौकरशाही और सुरक्षा तंत्र अभी भी पुराने राजनीतिक ढांचे और नेताओं के प्रभाव में हैं। ऐसे में एक स्वतंत्र चेहरा कितनी स्वतंत्रता से काम कर पाएगा, यह देखना बाकी है।

इसके अलावा, अंतरिम सरकार केवल अस्थायी समाधान है। असली परीक्षा तब होगी जब नए चुनाव होंगे और यह तय होगा कि देश का स्थायी नेतृत्व किसके हाथ में जाता है।

अंतरराष्ट्रीय नजरें

नेपाल में हो रही घटनाओं पर अंतरराष्ट्रीय जगत भी बारीकी से नजर रख रहा है। भारत, चीन और अमेरिका जैसे देशों की दिलचस्पी नेपाल की राजनीति में हमेशा रही है। अब जब युवाओं ने सत्ता परिवर्तन का बिगुल बजा दिया है, तो यह देखना अहम होगा कि अंतरराष्ट्रीय शक्तियाँ किस तरह प्रतिक्रिया देती हैं।

नेपाल इस समय इतिहास के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। जेन-जी युवाओं की ताकत ने यह साबित कर दिया है कि अब पुरानी राजनीति से देश नहीं चल सकता। उन्होंने देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकी सुशीला कार्की पर भरोसा जताया है और उन्हें अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया है।

                  कार्की ने भी अपने पहले बयान में साफ कर दिया है कि वे राष्ट्रहित में काम करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। अब यह देखना होगा कि सेना, राष्ट्रपति और राजनीतिक दल किस तरह इस प्रस्ताव को औपचारिक रूप देते हैं।

यदि यह प्रयोग सफल हुआ तो नेपाल न केवल अपने वर्तमान संकट से बाहर आएगा, बल्कि लोकतंत्र और पारदर्शिता की दिशा में एक नया अध्याय भी लिखेगा।

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