Nepal Protest LIVE: नेपाल इस समय बड़े संकट से गुजर रहा है। सरकार द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद युवा वर्ग, खासकर जनरेशन-ज़ेड (Gen-Z), सड़कों पर उतर आया है। काठमांडू की गलियों से लेकर संसद भवन तक, हर जगह विरोध की आग भड़क उठी है। सोमवार को हालात इतने बिगड़े कि प्रदर्शन हिंसक हो गया और अब तक 18 लोगों की मौत हो चुकी है। पुलिस और सुरक्षाबलों की सख्ती के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन परिसर तक घुसपैठ कर दी।
यह प्रदर्शन अब केवल “सोशल मीडिया बैन” तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें भ्रष्टाचार, आर्थिक मंदी और सरकार की नीतियों के खिलाफ गुस्सा भी शामिल हो गया है। इसे लोग “Gen-Z Revolution” का नाम दे रहे हैं।
नेपाल में क्या हो रहा है? Nepal Protest LIVE

काठमांडू समेत कई शहरों में हजारों की संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए हैं। शुरुआत शांतिपूर्ण विरोध से हुई थी, लेकिन जैसे-जैसे पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग किया, हालात बिगड़ते चले गए।
प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ दिए, सरकार विरोधी नारे लगाए और संसद भवन परिसर में घुस गए। पुलिस ने भीड़ को काबू करने के लिए आंसू गैस और पानी की बौछार का इस्तेमाल किया। लेकिन इस दौरान गोली चलने की खबरें भी आईं, जिसमें 14 लोगों की मौत हो गई और 150 से ज्यादा लोग घायल हो गए।
हालात बेकाबू होते देख काठमांडू के कई इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया है।
किन इलाकों में लगा कर्फ्यू?
प्रशासन ने राजधानी के कई संवेदनशील इलाकों में कर्फ्यू लागू किया है। इनमें न्यू बानेश्वर चौक से लेकर एवरेस्ट होटल, बिजुली बाजार आर्च ब्रिज, मिन भवन, शांतिनगर होते हुए टिंकुने चौक तक का इलाका शामिल है। इसके अलावा, आईप्लेक्स मॉल से रत्न राज्य माध्यमिक विद्यालय और शंखमुल ब्रिज तक का इलाका भी कर्फ्यू के दायरे में है।
कर्फ्यू का मकसद हालात को काबू में रखना और संसद व अन्य संवैधानिक इमारतों को प्रदर्शनकारियों से बचाना है।
क्यों भड़के युवा?
नेपाल सरकार ने 4 सितंबर को फेसबुक, ट्विटर (अब एक्स), इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सएप, रेडिट और लिंक्डइन सहित 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पाबंदी लगा दी थी।
सरकार का कहना था कि इन कंपनियों ने निर्धारित समय सीमा में सूचना एवं संचार मंत्रालय से रजिस्ट्रेशन नहीं कराया। 28 अगस्त को नोटिस जारी कर उन्हें सात दिन का समय दिया गया था, लेकिन समय सीमा खत्म होने तक किसी भी बड़े प्लेटफॉर्म ने पंजीकरण नहीं किया।
इसके बाद सरकार ने अचानक प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया, जिससे युवाओं में गुस्सा फूट पड़ा।
सोशल मीडिया बैन और लोकतंत्र पर सवाल
नेपाल के पत्रकारों, वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस बैन को अभिव्यक्ति की आज़ादी और प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताया है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक देश में इस तरह की सेंसरशिप बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
युवाओं का गुस्सा भी इसी बात पर है। उनके मुताबिक, सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि शिक्षा, नौकरी और संवाद का जरिया है। आज की पीढ़ी अपनी पढ़ाई, व्यापार और रिश्तों के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर निर्भर है।
इस बैन ने बेरोजगारी से जूझ रहे नेपाल के युवाओं को और ज्यादा परेशान कर दिया है।
प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का बयान
नेपाल के प्रधानमंत्री ओली ने अपने सख्त रुख को दोहराते हुए कहा है कि उनकी सरकार किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटेगी। उन्होंने हाल ही में एक सम्मेलन में कहा था—
“सरकार राष्ट्र को कमजोर करने वाले किसी भी कार्य को कतई बर्दाश्त नहीं करेगी। ये प्रदर्शनकारी सिर्फ कठपुतलियां हैं, जो देश को अस्थिर करने की साजिश कर रहे हैं।”
ओली ने साफ कर दिया है कि बैन हटाने का सवाल ही नहीं उठता।
क्या है Gen-Z Revolution?
8 सितंबर से शुरू हुए इस आंदोलन को लोग “Gen-Z Revolution” कह रहे हैं। इसमें ज्यादातर 18 से 25 साल के युवा शामिल हैं, जो डिजिटल दुनिया से कटने को तैयार नहीं हैं।
उनका कहना है कि सरकार को सोशल मीडिया पर नियंत्रण लगाने के बजाय भ्रष्टाचार और आर्थिक मंदी जैसे असली मुद्दों पर काम करना चाहिए।
युवाओं के नारे—
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“हमें चाहिए आज़ादी, नहीं चाहिए सेंसरशिप।”
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“भ्रष्टाचार हटाओ, सोशल मीडिया नहीं।”
भ्रष्टाचार और आर्थिक मंदी भी बने मुद्दे
नेपाल पहले से ही गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। महंगाई बढ़ रही है, बेरोजगारी चरम पर है और विदेशी निवेश लगातार घट रहा है। ऐसे में सोशल मीडिया बैन ने लोगों को और नाराज़ कर दिया।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में नाकाम रही है। इसके बजाय वह जनता की आवाज़ दबाने पर तुली हुई है।
सरकार के सामने बढ़ती मुश्किलें
सोशल मीडिया बैन के बाद विपक्षी दलों ने ओली सरकार पर हमला तेज कर दिया है। नेपाली कांग्रेस समेत कई पार्टियां सरकार से इस फैसले को वापस लेने की मांग कर रही हैं।
संसद के अंदर भी हंगामा मचा हुआ है। विपक्ष ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में नारे लगाए और सरकार पर असंवैधानिक कदम उठाने का आरोप लगाया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह आंदोलन और उग्र हुआ तो ओली सरकार के लिए सत्ता में बने रहना मुश्किल हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय दबाव
नेपाल की घटनाओं पर अब अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और पड़ोसी देशों की नजर भी है। संयुक्त राष्ट्र की तरफ से चिंता जताई गई है और कहा गया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद होती है।
भारत और चीन जैसे पड़ोसी देश भी हालात पर नजर बनाए हुए हैं। अगर आंदोलन और हिंसक हुआ तो इसका असर नेपाल की विदेश नीति और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी पड़ सकता है।
आगे का रास्ता क्या है?
नेपाल सरकार के पास फिलहाल दो ही विकल्प हैं—
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अपने फैसले पर पुनर्विचार करना और सोशल मीडिया बैन हटाकर युवाओं के गुस्से को शांत करना।
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कठोर कार्रवाई करना, जिससे हालात और बिगड़ सकते हैं और सरकार की छवि को भारी नुकसान हो सकता है।
प्रधानमंत्री ओली जिस तरह अड़े हुए हैं, उससे लगता है कि सरकार दूसरा विकल्प चुन सकती है। लेकिन ऐसा हुआ तो नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता और गहराना तय है।
नेपाल का मौजूदा आंदोलन सिर्फ सोशल मीडिया बैन के खिलाफ नहीं है। यह युवाओं की उस बेचैनी की आवाज है जो बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता से परेशान हैं।
18 मौतें और सैकड़ों घायल इस बात की गवाही हैं कि यह सिर्फ एक साधारण विरोध नहीं बल्कि एक बड़े जनाक्रोश का रूप ले चुका है।
अब देखना यह होगा कि ओली सरकार इस चुनौती से कैसे निपटती है। क्या वह अपनी जिद पर कायम रहती है या जनता की मांग के आगे झुककर सोशल मीडिया पर से बैन हटाती है।
अगर सरकार ने संवाद का रास्ता नहीं चुना तो यह आंदोलन नेपाल के लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है।
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