Navratri Day 9: नवरात्रि का हर दिन देवी माँ के एक रूप की आराधना के लिए समर्पित होता है। इन नौ दिनों की साधना और भक्ति का चरम बिंदु नवमी तिथि है। इस दिन माँ दुर्गा के नवम स्वरूप माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यही कारण है कि इसे महानवमी भी कहा जाता है।
नवरात्रि का यह अंतिम दिन आध्यात्मिक दृष्टि से उतना ही विशेष है जितना सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से। इस दिन भक्त न केवल देवी की आराधना करते हैं बल्कि कन्या पूजन, हवन, भजन और सामूहिक कार्यक्रमों के माध्यम से त्योहार को एक दिव्य समापन प्रदान करते हैं।
नवमी तिथि का समय
वर्ष 2025 में नवमी तिथि 30 सितम्बर की शाम से आरंभ होकर 1 अक्टूबर की शाम तक रहेगी। इस अवधि में नवमी पूजा, कन्या पूजन और मां सिद्धिदात्री की उपासना करना अत्यंत शुभ माना गया है।
माँ सिद्धिदात्री कौन हैं?
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माँ दुर्गा का नौवां स्वरूप सिद्धिदात्री कहलाता है। ‘सिद्धि’ का अर्थ है आध्यात्मिक शक्तियाँ और ‘दात्री’ का अर्थ है देने वाली। अर्थात वह देवी, जो अपने भक्तों और देवताओं को सिद्धियाँ प्रदान करती हैं।
मान्यता है कि ब्रह्मांड की सृष्टि के आरंभ में जब देवताओं ने तपस्या की, तो माँ सिद्धिदात्री ने उन्हें अष्ट सिद्धियाँ और कई दिव्य शक्तियाँ प्रदान कीं। इसीलिए उन्हें “सिद्धिदात्री” कहा गया।
माँ सिद्धिदात्री को कमल के आसन पर विराजमान, चार भुजाओं वाली और हाथों में शंख, गदा, चक्र तथा कमल धारण किए हुए चित्रित किया जाता है। उनकी आराधना से भक्त को अद्वितीय आत्मबल, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
माँ सिद्धिदात्री की कथा
पौराणिक मान्यता है कि जब ब्रह्मांड का सृजन आरंभ हुआ, तब भगवान शिव ने यह संकल्प लिया कि वे समस्त शक्तियों के साथ परमसिद्धि को प्राप्त करेंगे। इसके लिए उन्होंने माँ आदिशक्ति की उपासना आरंभ की।
माँ दुर्गा ने उनकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर अपने नवम स्वरूप में प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिए। माँ ने शिव को अष्ट सिद्धियाँ और नवरत्न शक्तियाँ प्रदान कीं। यही कारण है कि भगवान शिव को “अर्धनारीश्वर” भी कहा जाता है, क्योंकि आधा अंग देवी का और आधा उनका है।
कथा के अनुसार, माँ सिद्धिदात्री ने न केवल शिव को वरदान दिया, बल्कि समस्त देवताओं को भी दिव्य सिद्धियाँ प्रदान कीं। इन अष्ट सिद्धियों के नाम हैं – अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व।
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अणिमा से सूक्ष्म से सूक्ष्म रूप धारण किया जा सकता है।
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महिमा से विशाल रूप लिया जा सकता है।
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गरिमा से अत्यधिक भार उठाने की क्षमता मिलती है।
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लघिमा से बहुत हल्का होने की शक्ति मिलती है।
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प्राप्ति से दूरस्थ वस्तु को पाना संभव होता है।
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प्राकाम्य से इच्छाओं की पूर्ति होती है।
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ईशित्व से सृष्टि पर नियंत्रण की शक्ति मिलती है।
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वशित्व से सबको अपने वश में करने की सामर्थ्य मिलती है।
इन सिद्धियों के कारण देवताओं की शक्ति और तेज बढ़ गया। तभी से माँ सिद्धिदात्री को सभी सिद्धियों की दात्री कहा जाने लगा।
नवमी का रंग : गुलाबी
नवरात्रि में हर दिन एक विशेष रंग से जुड़ा होता है। नवमी का रंग गुलाबी (पिंक) है। गुलाबी रंग प्रेम, दया, सौम्यता और करुणा का प्रतीक माना जाता है।
इस दिन गुलाबी रंग के वस्त्र पहनना, गुलाबी पुष्पों से देवी का श्रृंगार करना और गुलाबी रंग की चुनरी चढ़ाना बेहद शुभ फलदायी माना जाता है।
नवमी की पूजा विधि
नवमी की पूजा श्रद्धा और शुद्धता से की जाती है।
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करें। माँ सिद्धिदात्री की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
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पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से देवी का स्नान कराएं।
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देवी को गुलाबी वस्त्र, पुष्प, अक्षत और गंध अर्पित करें।
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दीप जलाकर धूप, कपूर और नारियल चढ़ाएं।
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देवी को भोग में पूरी, काले चने और सूजी का हलवा अर्पित करें।
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“ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें।
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अंत में आरती गाकर परिवार सहित देवी की कृपा का आह्वान करें।
कन्या पूजन का महत्व
नवमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व है। हिंदू परंपरा के अनुसार, नौ कन्याओं को आमंत्रित कर उन्हें देवी स्वरूप मानकर पूजना चाहिए। उनके चरण धोए जाते हैं, उन्हें भोजन कराया जाता है और दक्षिणा, वस्त्र या उपहार देकर विदा किया जाता है।
कन्या पूजन का संदेश यह है कि नारी ही शक्ति और सृजन की आधारशिला है। माँ दुर्गा की कृपा कन्याओं की सेवा से ही पूर्ण होती है।
नवमी के विशेष मंत्र
माँ सिद्धिदात्री की पूजा के समय इन मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है:
“ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।”
इसके अलावा यह मंत्र भी विशेष फलदायी है:
“सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्व शक्ति समान्विते, भय भ्यस्त्राहि नौ देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते।”
मंत्रोच्चारण से वातावरण पवित्र होता है और मन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।
नवमी व्रत और उपवास
भक्त इस दिन व्रत रखते हैं। उपवास का उद्देश्य केवल भोजन त्यागना नहीं, बल्कि मन और इंद्रियों को नियंत्रण में रखना है। दिनभर उपवास करने के बाद पूजा और कन्या भोज पूर्ण होने पर भक्त स्वयं प्रसाद ग्रहण करते हैं।
कई लोग इस दिन कौड़ी या शंख के उपाय भी करते हैं। मान्यता है कि नवमी पर कौड़ी की पूजा करके उसे तिजोरी में रखने से घर में धन और समृद्धि आती है।
सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष
नवमी केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। इस दिन देशभर में सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। मंदिरों में विशेष आरती, भजन संध्या, सामूहिक कन्या पूजन और हवन का आयोजन किया जाता है।
कई स्थानों पर दुर्गा प्रतिमाओं की झांकियाँ सजाई जाती हैं और भक्त मिलकर देवी के गीत गाते हैं। यह अवसर लोगों को एकजुट करता है और समाज में सकारात्मकता फैलाता है।
नवमी के बाद का उत्सव : दशहरा
नवमी के अगले दिन दशहरा या विजयादशमी मनाई जाती है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। दुर्गा माँ ने महिषासुर का संहार किया था।
नवरात्रि की नवमी से दशहरे तक का यह क्रम जीवन में बुराई को त्यागने और अच्छाई को अपनाने का प्रेरणादायक संदेश देता है।
आध्यात्मिक संदेश
नवमी का दिन हमें यह सिखाता है कि शक्ति और भक्ति का मिलन ही जीवन को सफल बनाता है।
- माँ सिद्धिदात्री हमें सिद्धि और समर्पण का महत्व सिखाती हैं।
- गुलाबी रंग हमें प्रेम और करुणा का संदेश देता है।
- कन्या पूजन हमें नारी शक्ति का सम्मान करने की प्रेरणा देता है।
- दशहरा हमें बुराई पर अच्छाई की विजय का पाठ पढ़ाता है।
नवरात्रि की नवमी केवल पूजा और अनुष्ठान का दिन नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन की दिशा तय करने वाला अवसर है। माँ सिद्धिदात्री की उपासना से आत्मबल, सुख-समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
भक्तों को चाहिए कि इस दिन शुद्ध मन, सरल भाव और प्रेमपूर्वक देवी की पूजा करें, कन्याओं का सम्मान करें और समाज में सकारात्मकता फैलाएं। यही नवमी की वास्तविक साधना है।
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