Makar Sankranti 2026: साल 2026 की शुरुआत जिस पहले पर्व से होनी है, उसी पर्व को लेकर लोगों के मन में सबसे ज्यादा असमंजस बना हुआ है। मकर संक्रांति, जिसे उत्तर भारत में खिचड़ी पर्व के नाम से जाना जाता है, इस बार परंपराओं से थोड़ा अलग नजर आने वाली है। वजह है 14 जनवरी 2026 को पड़ने वाली षटतिला एकादशी, जो पूरे 19 साल बाद मकर संक्रांति के साथ पड़ रही है। इसी कारण इस बार न तो खिचड़ी बनेगी और न ही शुभ कार्यों की शुरुआत हो सकेगी।
हर साल मकर संक्रांति को लेकर लोगों में खास उत्साह रहता है। कहीं गंगा स्नान होता है, तो कहीं दान-पुण्य और खिचड़ी प्रसाद का विशेष आयोजन किया जाता है। लेकिन इस बार तिथि और एकादशी के संयोग ने लोगों को असमंजस में डाल दिया है कि पर्व को किस तरह मनाया जाए।
Makar Sankranti 2026: क्यों बना तिथि को लेकर भ्रम

पिछले कुछ वर्षों से देखा जा रहा है कि कई बड़े पर्वों की तिथि को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रहती है। कई बार त्योहार दो-दो दिन तक मनाए गए, तो कहीं पंचांगों की गणना अलग-अलग रही। अब साल 2026 के पहले ही त्योहार में फिर वही स्थिति बनती दिख रही है।
14 जनवरी 2026 को मकर संक्रांति पड़ रही है और उसी दिन षटतिला एकादशी भी है। श्री बुद्धिबल्लभ पंचांग के संपादक आचार्य पवन पाठक के अनुसार, इस दिन सूर्यदेव दोपहर 3 बजकर 07 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को ही मकर संक्रांति कहा जाता है, लेकिन उसी दिन एकादशी तिथि होने से धार्मिक नियमों के अनुसार कई चीजों पर रोक लग जाती है।
19 साल बाद बना दुर्लभ संयोग
आचार्यों के अनुसार यह एक दुर्लभ संयोग है कि मकर संक्रांति के दिन षटतिला एकादशी पड़ रही है। ऐसा संयोग पूरे 19 वर्षों बाद बना है। एकादशी तिथि 14 जनवरी की सुबह 3 बजकर 18 मिनट से शुरू होकर शाम 5 बजकर 53 मिनट तक रहेगी। इसी कारण पूरे दिन एकादशी का प्रभाव रहेगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन चावल और चावल से बनी किसी भी सामग्री का प्रयोग वर्जित माना जाता है। यही वजह है कि इस बार मकर संक्रांति पर बनने वाली पारंपरिक खिचड़ी नहीं बनाई जा सकेगी।
क्यों नहीं बनेगी खिचड़ी इस बार
उत्तर भारत में मकर संक्रांति का नाम आते ही सबसे पहले खिचड़ी की याद आती है। माना जाता है कि इस दिन खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाया जाता है और फिर प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। लेकिन चूंकि इस बार संक्रांति के दिन एकादशी है, इसलिए चावल से बनी खिचड़ी नहीं बनाई जाएगी।
एकादशी के नियमों के अनुसार इस दिन अन्न ग्रहण करना निषिद्ध होता है। इसी कारण न केवल खिचड़ी बल्कि चावल से बनी कोई भी चीज नहीं बनाई जाएगी। यही बात लोगों के बीच भ्रम की वजह भी बन रही है। कुछ लोग मान रहे हैं कि खिचड़ी अगले दिन यानी 15 जनवरी को बनाई जा सकती है, जबकि कुछ का कहना है कि इस बार बिना खिचड़ी के ही पर्व मनाना होगा।
खिचड़ी की जगह क्या बनेगा प्रसाद

खिचड़ी न बनने का मतलब यह नहीं है कि मकर संक्रांति का पर्व फीका हो जाएगा। आचार्यों के अनुसार, इस दिन तिल से बनी चीजों का विशेष महत्व रहेगा। षटतिला एकादशी होने के कारण तिल का दान, तिल का सेवन और तिल से भगवान की पूजा करना बेहद शुभ माना गया है।
इसके अलावा, जो लोग व्रत रखते हैं, वे साबूदाने की खिचड़ी या फलाहार ग्रहण कर सकते हैं। भगवान को श्वेत तिल अर्पित किए जा सकते हैं, जो विशेष पुण्य फल प्रदान करता है।
मकर संक्रांति पर स्नान और दान का महत्व
भले ही इस बार खिचड़ी न बने, लेकिन मकर संक्रांति पर स्नान और दान का महत्व कम नहीं होता। आचार्य पवन पाठक के अनुसार, इस दिन पवित्र नदी में स्नान करना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है। खासकर गंगा, यमुना या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से जीवन के कई कष्ट दूर होते हैं।
दान की बात करें तो इस दिन कंबल, घी और तिल का दान करना विशेष शुभ फल देता है। मान्यता है कि इन चीजों के दान से भगवान सूर्य और भगवान विष्णु दोनों की कृपा प्राप्त होती है।
मकर संक्रांति से क्यों नहीं शुरू होंगे शुभ कार्य
हर साल मकर संक्रांति को शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत का दिन माना जाता है। विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य संस्कार इसी दिन से शुरू हो जाते हैं। लेकिन साल 2026 में ऐसा नहीं होगा।
ज्योतिषाचार्य डॉ. सुशांत राज के अनुसार, इस बार मकर संक्रांति के समय शुक्र ग्रह अस्त रहेगा। शुक्र ग्रह को विवाह और मांगलिक कार्यों का कारक माना जाता है। शुक्र के अस्त रहने के कारण किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत नहीं की जाती।
कब से शुरू होंगे मांगलिक कार्य
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, शुक्र ग्रह के उदय होने के बाद ही शुभ कार्यों की शुरुआत की जा सकती है। साल 2026 में 2 फरवरी के बाद शुक्र उदय होगा। इसके बाद ही विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्य शुभ माने जाएंगे।
इसका मतलब साफ है कि मकर संक्रांति से लेकर फरवरी की शुरुआत तक शुभ कार्यों पर विराम रहेगा। जो लोग जनवरी में शादी या अन्य मांगलिक आयोजन की योजना बना रहे थे, उन्हें अब अपनी तारीखों में बदलाव करना पड़ सकता है।
लोगों में क्यों है सबसे ज्यादा भ्रम
मकर संक्रांति को लेकर भ्रम इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि यह पर्व सूर्य की चाल पर आधारित होता है, जबकि एकादशी तिथि चंद्रमा पर निर्भर करती है। जब सूर्य और चंद्र आधारित तिथियां एक साथ पड़ जाती हैं, तो धार्मिक नियमों में टकराव देखने को मिलता है।
एक ओर लोग परंपरा के अनुसार खिचड़ी बनाना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर एकादशी के नियम उन्हें रोकते हैं। इसी कारण लोग यह तय नहीं कर पा रहे कि पर्व को किस रूप में मनाया जाए।
क्या कहता है धर्म शास्त्र
धर्म शास्त्रों के अनुसार, जब किसी पर्व के दिन एकादशी जैसी पवित्र तिथि पड़ जाए, तो एकादशी के नियमों को प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए इस बार खिचड़ी न बनाना और चावल से परहेज करना ही शास्त्रसम्मत माना जा रहा है।
हालांकि मकर संक्रांति का स्नान, दान और सूर्य पूजा पूरी श्रद्धा के साथ की जा सकती है। यही वजह है कि आचार्य इस दिन तिल और घी के दान पर विशेष जोर दे रहे हैं।
मकर संक्रांति 2026: परंपरा और नियमों का संतुलन
इस बार मकर संक्रांति लोगों के लिए एक सीख भी लेकर आई है कि धर्म में सिर्फ परंपरा ही नहीं, बल्कि नियमों का पालन भी जरूरी है। खिचड़ी भले ही न बने, लेकिन पर्व का आध्यात्मिक महत्व कम नहीं होता।
तिल, दान, स्नान और सूर्य पूजा के माध्यम से भी मकर संक्रांति को पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा सकता है।
साल 2026 की मकर संक्रांति कुछ अलग जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पर्व की खुशियां कम होंगी। इस बार खिचड़ी के बजाय तिल, शुभ कार्यों के बजाय साधना और भोज के बजाय दान को प्राथमिकता दी जाएगी।
जो लोग धार्मिक नियमों के अनुसार पर्व मनाना चाहते हैं, उनके लिए यही सलाह है कि एकादशी के नियमों का पालन करें और मकर संक्रांति के पुण्य फल को पूरी आस्था के साथ प्राप्त करें।
नोट: यह जानकारी सामान्य ज्योतिष दृष्टिकोण पर आधारित है और सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू नहीं हो सकता। इसे मार्गदर्शक मानें, निर्णय आपके विवेक पर निर्भर करें।
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