Low Sugar Drinks in India: भारत में पेय पदार्थों के बाजार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कुछ साल पहले तक कार्बोनेटेड कोल्ड ड्रिंक, मीठे पैकेज्ड जूस और कैफीनयुक्त एनर्जी ड्रिंक आम लोगों की पहली पसंद हुआ करते थे। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। हाल के उद्योग आंकड़ों के अनुसार 2025 में लो-शुगर और नो-शुगर ड्रिंक्स की बिक्री पिछले पाँच वर्षों के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई है। यह संकेत है कि भारतीय उपभोक्ता अब अपने स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर निर्णय ले रहे हैं।
पाँच साल में 5% से 30% तक पहुंचा बाजार हिस्सा | Low Sugar Drinks in India

उद्योग रिपोर्ट बताती हैं कि 2020 में जहाँ लो-शुगर और नो-शुगर पेय का बाजार हिस्सा लगभग 5% के आसपास था, वहीं 2025 तक यह बढ़कर लगभग 30% तक पहुँच गया है। यह वृद्धि केवल महानगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों में भी देखने को मिल रही है। बड़े ब्रांड्स के शुगर-फ्री वेरिएंट अब मुख्यधारा का हिस्सा बन चुके हैं और कई कंपनियों ने स्वीकार किया है कि उनके कुल बिक्री वॉल्यूम में कम या बिना चीनी वाले उत्पादों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है।
स्वास्थ्य जागरूकता ने बदली उपभोक्ता सोच
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ी वजह है स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता। भारत में मधुमेह और मोटापे के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। डॉक्टर और पोषण विशेषज्ञ लंबे समय से अतिरिक्त चीनी के सेवन को कम करने की सलाह देते रहे हैं। मीठे पेय पदार्थ अक्सर “खाली कैलोरी” देते हैं, जिनमें पोषण कम और चीनी ज्यादा होती है। एक सामान्य सॉफ्ट ड्रिंक की बोतल में इतनी चीनी हो सकती है कि वह दिनभर की अनुशंसित मात्रा का बड़ा हिस्सा पूरा कर दे। यही कारण है कि लोग अब विकल्प तलाश रहे हैं।
नई पीढ़ी बना रही है नया ट्रेंड
Gen Z और मिलेनियल वर्ग इस बदलाव का बड़ा कारण है। यह पीढ़ी फिटनेस, जिम, योग और हेल्दी लाइफस्टाइल को महत्व देती है। सोशल मीडिया पर “नो शुगर चैलेंज” और “हेल्दी ड्रिंक ऑप्शन” जैसे ट्रेंड लोकप्रिय हो रहे हैं। युवा उपभोक्ता अब प्रोडक्ट लेबल पढ़ते हैं, कैलोरी गिनते हैं और समझदारी से चुनाव करते हैं। इसी वजह से कंपनियों को भी अपने उत्पादों में सुधार करना पड़ा है।
सिर्फ सोडा नहीं, जूस और कॉफी भी शामिल
यह बदलाव केवल कार्बोनेटेड ड्रिंक्स तक सीमित नहीं है। पैकेज्ड जूस, फ्लेवर्ड कॉफी, एनर्जी ड्रिंक और यहां तक कि चाय आधारित पेय में भी लो-शुगर या नो-शुगर विकल्प पेश किए जा रहे हैं। कई कैफे अब ग्राहकों को अपने ड्रिंक में शुगर लेवल चुनने का विकल्प देते हैं। “नो एडेड शुगर” और “जीरो कैलोरी” जैसे शब्द अब आम हो चुके हैं।
कंपनियों की रणनीति में बड़ा बदलाव
बड़ी पेय कंपनियों ने अपने पोर्टफोलियो में शुगर-फ्री वेरिएंट्स की संख्या बढ़ा दी है। मार्केटिंग में भी अब “डाइट” शब्द की जगह “जीरो शुगर” पर जोर दिया जा रहा है ताकि उत्पाद अधिक आकर्षक लगे। कुछ कंपनियों ने छोटे पैक साइज और किफायती कीमतों में शुगर-फ्री ड्रिंक लॉन्च किए हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इन्हें आजमा सकें।
क्या शुगर-फ्री मतलब पूरी तरह हेल्दी?
हालांकि लो-शुगर और नो-शुगर विकल्प लोकप्रिय हो रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञ संतुलन की सलाह देते हैं। कई शुगर-फ्री ड्रिंक्स में आर्टिफिशियल स्वीटनर का उपयोग होता है। ये पारंपरिक चीनी की तुलना में कम कैलोरी वाले हो सकते हैं, लेकिन इनका अधिक सेवन भी उचित नहीं माना जाता। इसलिए उपभोक्ताओं को सामग्री सूची पढ़कर समझदारी से चुनाव करना चाहिए।
ग्रामीण बाजारों में भी दिख रहा असर
पहले शुगर-फ्री ड्रिंक्स को केवल डायबिटिक या डाइट फॉलो करने वाले लोगों के लिए समझा जाता था। अब यह धारणा बदल रही है। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी युवा वर्ग हेल्दी विकल्पों की ओर आकर्षित हो रहा है। ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की बढ़ती पहुंच ने नए उत्पादों को हर जगह उपलब्ध करा दिया है।
गर्मियों में और तेज होता है ट्रेंड
गर्मी के मौसम में यह बदलाव और स्पष्ट दिखता है। पहले जहाँ लोग मीठे सोडा या पैकेज्ड जूस चुनते थे, अब कई लोग शुगर-फ्री फ्लेवर्ड वाटर, जीरो-शुगर कोल्ड ड्रिंक या कम कैलोरी वाले पेय पसंद कर रहे हैं। हेल्थ-फोकस्ड विज्ञापन भी इस बदलाव को मजबूत बना रहे हैं।
भविष्य में और मजबूत होगा बदलाव
विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में लो-शुगर और नो-शुगर ड्रिंक्स का बाजार और बढ़ेगा। जैसे-जैसे लोगों की आय बढ़ेगी और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलेगी, वैसे-वैसे उपभोक्ता अपने खान-पान में और सतर्क होंगे। कंपनियाँ भी स्वाद और सेहत के बीच बेहतर संतुलन बनाने के लिए रिसर्च में निवेश कर रही हैं।
भारतीय उपभोक्ता अब केवल स्वाद के आधार पर निर्णय नहीं ले रहा है। वह यह भी देख रहा है कि जो वह पी रहा है, उसका उसके शरीर पर क्या असर पड़ेगा। यही कारण है कि मीठे पेयों की जगह लो-शुगर और नो-शुगर विकल्प तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। यह बदलाव केवल एक ट्रेंड नहीं, बल्कि स्वास्थ्य-केंद्रित सोच की ओर बढ़ता कदम है।
अगर यही रफ्तार जारी रही, तो आने वाले समय में भारतीय पेय बाजार की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है — जहाँ “कम चीनी” और “बिना चीनी” सामान्य विकल्प बन जाएंगे।
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