लेह-लद्दाख आंदोलन 2025: राज्यत्व और छठे अनुसूची की मांग पर उभरे विरोध का सच

लेह-लद्दाख आंदोलन 2025: 2025 की सितंबर तिथि में लेह (लद्दाख) में एक विरोध आंदोलन हिंसक रूप ले गया, जिसमें चार लोगों की मौत और दर्जनों घायल होने की सूचनाएँ आईं। यह संघर्ष केवल तात्कालिक घटना नहीं है, बल्कि वर्षों से चल रही गहरी राजनीतिक, सांस्कृतिक और परिसंपत्ति संबंधी मांगों के परिणामस्वरूप उभरा है। इस ब्लॉग में हम इस आंदोलन की पृष्ठभूमि, मुख्य मांगें, घटनाक्रम और आने वाली चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

लेह-लद्दाख आंदोलन 2025
           लेह-लद्दाख आंदोलन 2025

पृष्ठभूमि: लद्दाख की संवैधानिक स्थिति:

  • अगस्त 2019 में भारत सरकार ने जम्मू एवं कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया और राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों — “जम्मू एवं कश्मीर” और “लद्दाख” — में विभाजित किया।

  • लेकिन लद्दाख को विधानसभा नहीं दी गई, अर्थात् वह सीधे केंद्र के नियंत्रण में आ गया। इससे स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की शक्ति सीमित रह गई।

  • लद्दाख में लंबे समय से ऐसी आवाजें उठती रही हैं कि इस क्षेत्र को विशेष संवैधानिक संरक्षण मिले, ताकि वह अपनी सांस्कृतिक, भौगोलिक और पारिस्थितिक विशिष्टताओं को सुरक्षित रख सके।

  • दो प्रमुख स्थानीय संगठन — Leh Apex Body (LAB) और Kargil Democratic Alliance (KDA) — इस क्षेत्र की मांगों के अग्रदूत हैं। पहले वे अलग-अलग सक्रिय थे, पर बाद में उन्होंने सहयोग किया।

  • 2024 में 3 फरवरी को Leh व Kargil में बड़े पैमाने पर शांत प्रदर्शन हुए, जिसमें पूरी बंदी (shutdown) की गई और संवैधानिक सुरक्षा तथा राज्यत्व की मांग की गई।

  • वर्ष 2025 में, बातचीत की पहल हुई, और केंद्र सरकार ने कुछ मस्यौं पर मसौदा नियम जारी किए — जैसे स्थानीय निवासियों के लिए 85 % आरक्षण, 15 वर्ष निवास अवधि की शर्त, 33 % महिलाओं के लिए आरक्षण, पाँच राजभाषाओं को मान्यता देना आदि।

मुख्य मांगें और उत्प्रेरक कारण:

लद्दाख के विरोधी आंदोलनों की मूल मांगें निम्नलिखित हैं:

  1. राज्यत्व (Statehood)
    लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की माँग है ताकि वहाँ विधानसभा और अपनी सरकार रहे, न कि केवल केंद्रशासित प्रदेश बनें।

  2. संविधान का छठा अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल करना
    छठा अनुसूची (Sixth Schedule) भारत के उन आदिवासी आदर क्षेत्रों को विशेष स्वायत्तता देता है जहाँ स्थानीय जनजातीय समुदायों को ज़मीन, निजी संपत्ति, शासन और संसाधन पर नियंत्रण मिलता है। लद्दाख में यह सुरक्षा माँगी जा रही है।

  3. स्थानीय आरक्षण और रोजगार
    क्षेत्रीय युवाओं को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता, स्थानीय निवासियों के लिए आरक्षण सुनिश्चित करना।

  4. भूमि और विकास परियोजनाओं पर नियंत्रण
    बाहरी निवेश, बड़े उद्योग और अवांछित परियोजनाओं से भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय प्रभाव का भय। लद्दाख की भौगोलिक स्थिति बहुत संवेदनशील है, ग्लेशियर और पानी की समस्या वहाँ सदा से रही है।

  5. संस्कृति, भाषा और पहचान की रक्षा
    क्षेत्रीय भाषा, धर्म व जातीय पहचान को खतरा महसूस करना। केंद्र द्वारा निर्णय लेने में स्थानीय समुदायों का अभाव।

ताजा घटनाक्रम: किस तरह विरोध हिंसक हुआ:

  • सितंबर 2025 में LAB ने 10 सितंबर से 15 लोगों द्वारा अनशन (हंगर स्ट्राइक) शुरू की, मांगों के पूरा न होने पर जोर देने के लिए।

  • 23 सितंबर को दो अनशन में बैठे लोगों की सेहत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल ले जाया गया।

  • LAB के युवा विंग ने 24 सितंबर को लेह में शटडाउन और विरोध मार्च बुलाया।

  • विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ युवाओं द्वारा पत्थरबाजी हुई, भाजपा कार्यालय और एक CRPF वाहन आग लगाई गई।

  • पुलिस ने अश्रु गैस छोड़ी, लाठी चार्ज किया। कुछ स्थानों पर गोलीबारी भी हुई, परिणामस्वरूप कम से कम चार लोगों की मौत एवं दर्जनों घायल।

  • लेह में कर्फ्यू लगाया गया और सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगाया गया।

  • इसी अवसर पर सोनम वांगचुक ने अनशन छोड़ने की घोषणा की और युवाओं से शांतिपूर्ण राह अपनाने की अपील की।

  • अब केंद्र और स्थानीय प्रतिनिधियों के बीच वार्ता 6 अक्टूबर 2025 को प्रस्तावित है।

विश्लेषण: संघर्ष की गहराई और चुनौतियाँ

एकता बनाम विभाजन:

लद्दाख में पहले सांप्रदायिक और क्षेत्रीय विभाजन की स्थिति थी — Leh मुख्यतः बौद्ध बहुल और Kargil मुस्लिम बहुल। पर यह आंदोलन दोनों इकाइयों ने मिलकर उठाया है, जिससे पुरानी दूरी कम हुई है।

कट्टरपंथ और हिंसा का जोखिम:

जब शांतिपूर्ण आंदोलन जरूरत और समय पर सकारात्मक प्रतिक्रिया न मिले, तो युवा गुस्से में हिंसा की ओर बढ़ जाते हैं। पर यह कदम आंदोलन के उद्देश्य को प्रभावित कर सकते हैं और जन समर्थन को कम कर सकते हैं।

केंद्र-राज्य संबंध:

केंद्र सरकार को यह संतुलन बनाना है कि वह लद्दाख की संवेदनशीलता समझे और प्रतिक्रियाशील कदम उठाए। अगर केंद्र की नीतियाँ ढीली या विलंबित हों, तो आंदोलन और तीव्र हो सकता है।

पर्यावरणीय दबाव:

लद्दाख हिमालयी, को colder desert क्षेत्र है, जहाँ जल संकट, ग्लेशियर पिघलना और भूमि क्षरण प्रमुख चुनौतियाँ हैं। विकास परियोजनाएँ इससे और बिगड़ सकती हैं।

संवाद की कमी:

अक्सर स्थानीय आवाज़ें केंद्र तक नहीं पहुँच पाती। संवाद और भरोसा बहाल करना अहम है।

लेह-लद्दाख का यह विरोध आंदोलन सिर्फ राजनीतिक मांगों तक सीमित नहीं है — यह एक जातीय पहचान, पर्यावरणीय संरक्षण और स्वायत्तता की लड़ाई है। हालिया हिंसा ने इस संघर्ष को एक नए मोड़ पर ला दिया है। हालाँकि आंदोलन के हिंसक हो जाने की घटनाएँ चिंता का विषय हैं, पर यह दिखाती हैं कि समुदाय में जवाबदेही की मांग कितनी गंभीर हो चुकी है।

आगे की दिशा के लिए ये सुझाव हो सकते हैं:

  • केंद्र सरकार को स्थानीय प्रतिनिधियों से तुरंत वार्ता शुरू करनी चाहिए।

  • किसी भी हिंसा की बजाय शांतिपूर्ण आंदोलन की रूपरेखा बनाए रखना चाहिए।

  • संवैधानिक संरक्षण चाहिए — छठा अनुसूची या अन्य विशेष प्रावधान।

  • पर्यावरण एवं विकास को बराबर प्राथमिकता देना चाहिए।

  • संवाद व विश्वास स्थापित करना होगा — राजनीतिक दलों को भी इस संघर्ष में संवेदनशीलता दिखानी होगी।

अगर तुम चाहो, तो मैं इस ब्लॉग को और सुगठित कर सकता हूँ, सबटाइटल बदल सकता हूँ या इसे सोशल मीडिया पोस्ट के रूप में तैयार कर सकता हूँ। करना चाहूगे?

ऐसे और भी National लेखों के लिए हमारे साथ जुड़े रहें! Khabari bandhu पर पढ़ें देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरें — बिज़नेस, एजुकेशन, मनोरंजन, धर्म, क्रिकेट, राशिफल और भी बहुत कुछ।

71st National Film Awards 2025: मोहनलाल, शाहरुख खान, रानी मुखर्जी और विक्रांत मैसी का जलवा, 71वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में गूंजी तालियां

Leave a Comment

Exit mobile version