ISRO’s X-Ray-satellite: ISRO का धांसू ऐलान! XPoSat से भारतीय वैज्ञानिक खुद करेंगे अंतरिक्ष की जासूसी, रिसर्चर्स को सीधी पहुंच

ISRO’s X-Ray-satellite: भारत ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में एक और बड़ी छलांग लगाई है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने खास X-ray Polarimeter Satellite (XPoSat) मिशन को भारतीय वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए खोल दिया है। अब देश के वैज्ञानिक खुद इस सैटेलाइट का इस्तेमाल कर ब्रह्मांड के रहस्यों को जान सकेंगे। यह कदम भारतीय खगोलशास्त्र और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ने जा रहा है।

क्या है XPoSat सैटेलाइट मिशन? | ISRO’s X-Ray-satellite

XPoSat का पूरा नाम है X-ray Polarimeter Satellite, यानी एक्स-रे ध्रुवीकरण उपग्रह। इसे ISRO ने 1 जनवरी 2024 को श्रीहरिकोटा से PSLV C-58 रॉकेट के जरिए लॉन्च किया था। यह भारत का पहला ऐसा मिशन है जो एक्स-रे पोलरिमेट्री पर केंद्रित है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष में मौजूद चरम स्थितियों वाले खगोलीय स्रोतों जैसे ब्लैक होल, न्यूट्रॉन स्टार, पल्सर और सुपरनोवा रिमनेंट्स से आने वाले एक्स-रे विकिरण का अध्ययन करना है।

एक्स-रे पोलरिमेट्री यानी X-ray ध्रुवीकरण का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि ये विकिरण किस दिशा और किस तीव्रता में निकलते हैं। इससे इन खगोलीय स्रोतों के अंदर के चुंबकीय क्षेत्रों और उनकी भौतिक संरचना का पता लगाया जा सकता है।

सरल शब्दों में कहें तो XPoSat अंतरिक्ष के उन रहस्यमय इलाकों की झलक दिखाएगा जहाँ अब तक हमारी समझ सीमित रही है।

भारत के वैज्ञानिकों के लिए खुला नया मौका

ISRO ने घोषणा की है कि XPoSat के पहले ऑब्जर्वेशन चक्र में इस ऑब्ज़र्वेटरी के कुल समय का 60 प्रतिशत भारतीय वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए आरक्षित रहेगा। यह अवसर भारत के सभी विश्वविद्यालयों, संस्थानों और कॉलेजों में काम कर रहे शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ा मौका है।

अब भारत के वैज्ञानिक भी विश्वस्तरीय एक्स-रे डेटा के साथ काम कर सकेंगे और अपने शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत कर पाएंगे।

प्रस्ताव स्वीकार किए जाने पर वैज्ञानिकों को उपग्रह से प्राप्त डेटा पर छह महीने तक का विशेष अधिकार (proprietary period) दिया जाएगा। इस अवधि के बाद डेटा सार्वजनिक किया जाएगा ताकि अन्य वैज्ञानिक भी उसका उपयोग कर सकें।

XPoSat में कौन-कौन से उपकरण लगे हैं?

XPoSat सैटेलाइट में दो मुख्य वैज्ञानिक उपकरण यानी पेलोड लगे हैं – POLIX और XSPECT।

POLIX (Polarimeter Instrument in X-rays) मुख्य पेलोड है जो 8 से 30 keV ऊर्जा सीमा में X-ray ध्रुवीकरण मापेगा। यह उपकरण भारत में पूरी तरह से विकसित किया गया है। इससे पता लगाया जा सकेगा कि किसी एक्स-रे स्रोत से निकलने वाले विकिरण की दिशा क्या है और उसकी तीव्रता कितनी है।

XSPECT (X-ray Spectroscopy and Timing) दूसरा पेलोड है जो 0.8 से 15 keV रेंज में एक्स-रे स्पेक्ट्रोस्कोपी और टाइमिंग डेटा देगा। इसका मतलब है कि यह यह बताएगा कि एक्स-रे की तीव्रता समय के साथ कैसे बदलती है और किन परिस्थितियों में यह विकिरण उत्पन्न होता है।

POLIX और XSPECT मिलकर किसी भी एक्स-रे स्रोत के बारे में बहुत गहराई से जानकारी देंगे — जैसे कि उसकी ऊर्जा संरचना, तापमान, चुंबकीय क्षेत्र और घूर्णन गति।

XPoSat की कक्षा और तकनीकी जानकारी

यह सैटेलाइट 650 किलोमीटर ऊँचाई पर near-equatorial orbit में काम कर रहा है। इस कक्षा में रहने का फायदा यह है कि यह सैटेलाइट नियमित और स्थिर तरीके से लक्ष्य स्रोतों का अवलोकन कर सकता है।

इसका संचालन भारत के उपग्रह डेटा केंद्रों से किया जा रहा है। XPoSat का मिशन लाइफ लगभग 5 वर्ष रखी गई है, जिससे वैज्ञानिक लंबे समय तक अंतरिक्ष के चरम स्रोतों का अध्ययन कर सकेंगे।

कौन कर सकता है आवेदन?

ISRO ने साफ कहा है कि यह अवसर केवल भारतीय वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए है। देश के किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय, शोध संस्था, कॉलेज या प्रयोगशाला में काम कर रहे वैज्ञानिक, शिक्षक या छात्र इस अवसर का लाभ उठा सकते हैं।

प्रस्ताव (Proposal) जमा करने वाले व्यक्ति को “Principal Investigator” यानी PI कहा जाएगा। PI को यह प्रमाण देना होगा कि वह इस मिशन से मिलने वाले डेटा को विश्लेषण करने की क्षमता रखता है। साथ ही यह भी बताना होगा कि उसके पास डेटा प्रोसेसिंग और विश्लेषण के लिए आवश्यक तकनीकी संसाधन हैं।

कैसे करें आवेदन?

प्रस्ताव जमा करने की प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन होगी। इसके लिए ISRO ने XPoSat Proposal Processing System (XPPS) नाम का पोर्टल बनाया है।

सभी इच्छुक शोधकर्ता इसी पोर्टल पर जाकर अपना प्रस्ताव सबमिट कर सकेंगे। प्रस्ताव में लक्ष्य स्रोत, अवलोकन समय, वैज्ञानिक उद्देश्य, उपयोग किए जाने वाले उपकरण और तकनीकी तैयारी से जुड़ी सभी जानकारी देनी होगी।

प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तिथि 30 नवंबर 2025 रखी गई है। जनवरी 2026 से दिसंबर 2026 तक XPoSat से ऑब्जर्वेशन के लिए चुने गए प्रस्तावों पर काम किया जाएगा।

कैसे होगा मूल्यांकन?

सभी प्रस्तावों का मूल्यांकन XPoSat Time Allocation Committee (XTAC) नामक विशेष समिति द्वारा किया जाएगा। यह समिति प्रस्तावों को दो मानकों पर परखेगी —

  1. वैज्ञानिक महत्व (Scientific Merit)

  2. तकनीकी व्यवहार्यता (Technical Feasibility)

जो प्रस्ताव वैज्ञानिक रूप से मजबूत और तकनीकी रूप से संभव होंगे, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी।

यदि किसी वैज्ञानिक का प्रस्ताव चुना जाता है, तो उन्हें छह महीने तक अपने डेटा पर विशेष अधिकार मिलेगा। इसके बाद वही डेटा अन्य वैज्ञानिकों के लिए सार्वजनिक कर दिया जाएगा ताकि पूरे भारत का वैज्ञानिक समुदाय उसका उपयोग कर सके।

ISRO की तैयारी और वैज्ञानिकों के लिए सहूलियत

ISRO ने वैज्ञानिकों को आवेदन प्रक्रिया आसान बनाने के लिए कई तकनीकी दस्तावेज और सॉफ्टवेयर टूल उपलब्ध कराए हैं। इसमें XSPECT User Handbook और XPoViewer नामक टूल शामिल हैं, जो शोधकर्ताओं को यह पता लगाने में मदद करते हैं कि उनका चुना गया लक्ष्य उपग्रह के दृष्टि क्षेत्र में कब आएगा।

इससे वैज्ञानिक अपने प्रस्ताव को अधिक सटीक बना पाएंगे और यह सुनिश्चित कर सकेंगे कि उनका अध्ययन तकनीकी रूप से संभव है।

भारत के खगोलशास्त्र के लिए क्यों खास है XPoSat

यह मिशन भारत के लिए सिर्फ एक वैज्ञानिक परियोजना नहीं बल्कि एक राष्ट्रीय गौरव है। XPoSat ने भारत को उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल कर दिया है जो X-ray Polarimetry जैसी उन्नत तकनीक से लैस हैं। इससे पहले यह क्षमता अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों तक सीमित थी।

अब भारतीय वैज्ञानिक अपने खुद के उपग्रह से एक्स-रे डेटा जुटा सकेंगे। इससे भारत के विश्वविद्यालयों और रिसर्च सेंटरों में खगोलभौतिकी अनुसंधान को बड़ा बल मिलेगा।

क्या मिलेंगे नए रहस्य उजागर करने के मौके

XPoSat के जरिए वैज्ञानिक उन जगहों को भी देख पाएंगे जहाँ से एक्स-रे विकिरण निकलता है, जैसे —

  • ब्लैक होल के चारों ओर बनने वाले गैस डिस्क

  • न्यूट्रॉन स्टार के तीव्र चुंबकीय क्षेत्र

  • सुपरनोवा विस्फोटों के अवशेष

  • पल्सर जैसे तेज़ी से घूमते सितारे

इन सभी क्षेत्रों में ध्रुवीकरण मापन से बहुत सी नई जानकारियाँ मिलेंगी। यह डेटा खगोलभौतिकी के पुराने सिद्धांतों को जांचने और नए सिद्धांत बनाने में सहायक होगा।

XPoSat से भारत की अंतरराष्ट्रीय स्थिति मजबूत

XPoSat मिशन ने भारत को अंतरराष्ट्रीय खगोलशास्त्र में एक मजबूत आवाज दी है। पहले ऐसे मिशन सिर्फ अमेरिका के NASA या यूरोपियन स्पेस एजेंसी जैसे संगठनों के पास थे। अब भारत भी इस उन्नत वैज्ञानिक तकनीक के साथ विश्व मंच पर खड़ा है।

इसके डेटा से भारतीय वैज्ञानिक न केवल देश के अंदर बल्कि विदेशों में भी संयुक्त शोध कर सकेंगे। आने वाले समय में भारत कई अंतरराष्ट्रीय ऑब्जर्वेटरी मिशनों का अहम सहयोगी बन सकता है।

भारत के अंतरिक्ष विज्ञान का नया अध्याय

ISRO का XPoSat मिशन न केवल भारत के वैज्ञानिकों के लिए बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। अब भारतीय खगोलशास्त्री ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने के लिए खुद का मंच प्राप्त कर चुके हैं।

यह कदम भारत के विज्ञान जगत को नई ऊँचाइयों तक ले जाएगा, और आने वाले वर्षों में हमारी खोजें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाएंगी।

अगर सब कुछ योजना के अनुसार चलता रहा, तो 2026 भारत के खगोलशास्त्र के इतिहास में वो साल होगा जब देश के वैज्ञानिकों ने पहली बार अपने ही एक्स-रे सैटेलाइट से अंतरिक्ष की गहराइयों को समझा।

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