Four Stars of Destiny: भारत की संसद में फरवरी 2026 में एक तीव्र राजनीतिक तूफ़ान उठ गया जब राहुल गांधी ने लोकसभा में पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवाने की एक अपप्रकाशित किताब का हवाला देने की कोशिश की। इस दौरान नियम‑व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और संसदीय प्रक्रिया की सीमाओं पर गहरा विवाद शुरू हो गया, जिससे सदन में हंगामा, बार‑बार स्थगन और राजनीतिक आरोप‑प्रत्यारोप देखने को मिले। यह मामला सिर्फ राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश की चीन नीति, सेना‑सरकार के बीच बातचीत, और लोकतांत्रिक प्रथाओं पर भी व्यापक बहस खड़ी कर रहा है।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
लोकसभा में राहुल गांधी, विपक्ष के नेता, ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा करते हुए नरवाने की कथित अंशों का उद्धरण देने की कोशिश की, जिनके अनुसार 2020 में भारत‑चीन सीमा पर गंभीर तनाव मौजूद था। उन्होंने कहा कि उस समय चीन की सेनाएँ भारतीय क्षेत्र की ओर बढ़ रही थीं और सेना प्रमुख ने राजनीतिक नेतृत्व से स्पष्ट आदेश मांगने की कोशिश की थी।
लेकिन समस्या यह थी कि जिस किताब का हवाला दिया जा रहा था – Four Stars of Destiny – वह अभी प्रकाशित नहीं हुई है और अभी तक रक्षा मंत्रालय की मंजूरी के लिए समीक्षा में है। इसी कारण सत्तापक्ष के नेता और संसदीय अधिकारियों ने कहा कि इसे संसद में उद्धृत नहीं किया जा सकता।
संसदीय नियमों का तर्क:
संसद के नियमों के तहत Rule 349 का हवाला दिया गया, जिसके मुताबिक “सदन के भीतर बैठते समय किसी भी पुस्तक, समाचारपत्र या पत्र को पढ़ा नहीं जा सकता जब तक वह सदन के काम से सीधे संबद्ध न हो।” इस नियम को आधार मानते हुए स्पीकर ओम बिरला ने राहुल गांधी को किताब के अंश पढ़ने से रोका।
सरकार के नेताओं जैसे रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि अपप्रकाशित सामग्री का हवाला देना उचित नहीं है, क्योंकि वह सत्यापित या आधिकारिक स्रोत नहीं मानी जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस प्रकार के उद्धरण की अनुमति दी जाती है तो यह संसदीय प्रक्रिया को कमजोर करेगा।
किताब क्यों विवादित है?
जनरल एम.एम. नरवाने, 2019 से 2022 तक भारतीय सेना प्रमुख रहे, और उनकी किताब Four Stars of Destiny में कथित तौर पर 2020 के भारत‑चीन तनाव के दौरान होने वाली बातचीत, सैन्य परिस्थितियाँ और राजनीतिक आदेशों पर किए गए फैसलों का वर्णन है। किताब में बताया गया है कि कैसे सैनिकों ने चार चिनियाँ टैंकों के भारतीय क्षेत्र की ओर बढ़ने के समय स्थिति पर चिंता जताई, लेकिन स्पष्ट राजनीतिक आदेश नहीं मिल पाने की वजह से सेना को सीमित कार्रवाई करनी पड़ी।
यह किताब रक्षा मंत्रालय की समीक्षा में पड़ी है क्योंकि इसमें संवेदनशील सैन्य और सुरक्षा विवरण हो सकते हैं, जिसे बिना स्वीकृति के प्रकाशित नहीं किया जा सकता। ऐसे में इस पर संसद में चर्चा करना संवैधानिक और नियम‑आधारित मानदंडों के खिलाफ बताया जा रहा है।
BJP कहती है कि वो आतंकवाद से लड़ती है, लेकिन वो एक Quote से डरती है।
आखिर जनरल मनोज मुकुंद नरवणे जी की किताब ‘Four Stars of Destiny’ में ऐसा क्या लिखा है, जिससे मोदी सरकार के लोग इतना घबरा रहे हैं कि मुझे पढ़ने ही नहीं दे रहे हैं।
: संसद में नेता विपक्ष श्री @RahulGandhi जनरल… pic.twitter.com/Aci4P7uIdJ
— Congress (@INCIndia) February 2, 2026
संसद में क्या हुआ?
राहुल गांधी ने संसद में किताब के कथित अंश पढ़ने का प्रयास किया, लेकिन जैसे ही उन्होंने “…Chinese tanks…” जैसे विवरण देना शुरू किया, उन्हें रोका गया और नियमों का हवाला दिया गया। संसद में कई बार स्थगन हुआ और हंगामा बढ़ गया, और अंततः उस दिन सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी गई।
विपक्ष ने कहा कि उद्धृत सामग्री एक प्रकाशित मैगज़ीन के लेख में उपलब्ध थी, जो किताब के अंशों पर आधारित था, इसलिए इसे उद्धृत करना चाहिए। वहीं सत्तापक्ष ने जोर देकर कहा कि अगर किताब खुद प्रकाशित नहीं हुई है तो उसके बारे में जानकारी संसद में नहीं दी जा सकती।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ:
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राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार 2020 के सीमा विवाद के असली तथ्यों को छिपा रही है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार पर कोई सचमुच का उत्तरदायित्व है, तो उन्हें खुलकर इस बारे में चर्चा करनी चाहिए थी।
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कांग्रेस सांसदों ने कहा कि यह मुद्दा केवल संसदीय प्रक्रिया का नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की गंभीर विषयों पर खुलकर बहस करने का मामला है।
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सत्तापक्ष के नेताओं ने राहुल गांधी पर संसदीय नियमों का उल्लंघन करने और सेना के सम्मान को कमजोर करने का आरोप लगाया।
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प्रियंका गांधी ने कहा कि उद्धृत सामग्री को गलत तरीके से समझा गया और यह सेना का अपमान नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दे पर चर्चा का प्रयास था।
यह विवाद क्यों बड़ा बना?
यह विवाद केवल अपप्रकाशित किताब का हवाला नहीं है – बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा नीति, संसदीय नियमों, राजनीतिक आरोपों और सत्ता‑विपक्ष के बीच लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भरोसे से जुड़ा है। यह दिखाता है कि जब सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक चर्चा में आती है, तो राजनीतिक दल इसे अलग‑अलग पक्षों से देख सकते हैं।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किताब वास्तव में 2020 के उस विवाद के अंदरूनी हालात स्पष्ट करती है, तो जनता को इसका प्रकाशन और स्वतंत्र समीक्षा मिलनी चाहिए। वहीं अन्य का कहना है कि ऐसी जानकारी को बिना समीक्षा के उजागर करना खतरनाक हो सकता है।
संसद में नारवाने विवाद सिर्फ एक संसदीय तकनीकी तकरार नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतंत्र, पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही के बीच की जटिल सीमाओं पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। यह मुद्दा दिखाता है कि कैसे संवेदनशील सुरक्षा‑संबंधी सामग्री का संदर्भ लोकतांत्रिक मंचों पर गहरी और जटिल बहस को जन्म दे सकता है।
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