Ethiopia Volcano Eruption: इथियोपिया के हायली गुब्बी ज्वालामुखी ने लगभग 12,000 साल बाद अचानक विस्फोट कर दुनिया भर में सुर्खियाँ बटोरीं। इस प्राचीन ज्वालामुखी के फटने से उठी राख और सल्फर डाइऑक्साइड की ऊँची परत हवा के बहाव के साथ कई देशों को पार करती हुई भारत तक पहुँच गई। जैसे ही यह बादल भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में दाखिल हुआ, सबसे पहले जिस शहर पर चिंता की परत छाई, वह था राजधानी दिल्ली—जो पहले ही लगातार कई हफ्तों से भारी प्रदूषण का सामना कर रही थी।
लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि क्या यह राख राजधानी की पहले से खराब हवा को और ज़हरीला बना देगी? क्या इससे स्मॉग बढ़ेगा, सांस लेने में दिक्कत बढ़ेगी? क्या यह दिल्ली की हवा को एक और संकट की ओर धकेल देगा?
हालाँकि, मौसम वैज्ञानिकों ने इस मुद्दे पर राहत की खबर भी दी है। इस ब्लॉग में हम सरल भाषा में समझेंगे कि यह राख कहाँ से आई, कैसे दिल्ली तक पहुँची, इसका असर क्या होगा और लोगों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
आइए पूरी कहानी समझते हैं…
हायली गुब्बी ज्वालामुखी: 12,000 साल बाद पहली बार फटा | Ethiopia Volcano Eruption

हायली गुब्बी ज्वालामुखी इथियोपिया के अफ़ार क्षेत्र में स्थित है, जो राजधानी अदीस अबाबा से लगभग 800 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में आता है। इस ज्वालामुखी ने अचानक इतनी ऊर्जा के साथ विस्फोट किया कि राख और गैसें लगभग 14 किलोमीटर ऊँचाई तक पहुँच गईं। यह राख का गुबार बेहद महीन कणों, ग्लास जैसी सामग्री और सल्फर डाइऑक्साइड से भरा था।
इसकी ऊँचाई और सामग्री दोनों ही इसे बेहद खतरनाक बनाती हैं। लेकिन खतरा हर जगह एक जैसा नहीं होता, यह इस बात पर निर्भर करता है कि राख किस स्तर पर हवा में तैर रही है।
राख का सफर: इथियोपिया से दिल्ली तक
जैसे ही ज्वालामुखी फटा, उच्च स्तरीय हवाओं ने राख को तेजी से आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। ये हवाएँ 25,000 से 45,000 फीट की ऊँचाई पर 120 से 130 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से बह रही थीं। हवा का यह तेज़ बहाव राख को इथियोपिया से रेड सी, फिर यमन, ओमान और उसके बाद उत्तर-पश्चिमी भारत तक ले आया।
यह लंबा सफर हमें यह समझने में मदद करता है कि राख जमीन की ओर नहीं गिर रही, बल्कि आसमान में बहुत ऊपर तैर रही है। यही कारण है कि इसका असर जमीन पर रहने वाले लोगों पर सीमित बताया जा रहा है।
क्या दिल्ली की हवा और खराब होगी?
दिल्ली पहले ही कई हफ्तों से गंभीर प्रदूषण की गिरफ्त में है। AQI लगातार ‘बहुत खराब’ से ‘गंभीर’ के स्तर से नीचे आ ही नहीं रहा। ऐसे में जब लोगों को पता चला कि ज्वालामुखी की राख दिल्ली के ऊपर पहुँच रही है, तो स्वाभाविक रूप से डर बढ़ गया।
लेकिन मौसम वैज्ञानिकों ने राहत देते हुए कहा है कि राख की यह परत जमीन पर नहीं गिर रही है। यह 25,000 से 45,000 फीट की ऊँचाई पर तैर रही है। यही वजह है कि यह दिल्ली की जमीन स्तर की हवा में मिल नहीं पाएगी।
इसका मतलब है कि यह राख AQI को इतनी हद तक खराब नहीं करेगी कि लोगों की सांसें और मुश्किल में पड़ जाएं।
हालाँकि डर पूरी तरह गलत नहीं है। क्योंकि राख में कांच के बारीक कण, सिलिका और सल्फर डाइऑक्साइड मौजूद होते हैं, जो अगर जमीन पर आ जाएँ तो खतरनाक हो सकते हैं। लेकिन इस मामले में राख इतनी ऊँचाई पर है कि यह दिल्ली की हवा के साथ घुल-मिल नहीं रही।
अजीब सूर्योदय और सुंदर आसमान—राख का एक अनोखा असर
भले ही इस राख से हवा में बहुत अधिक खराबी न हो, लेकिन लोग आसमान में कुछ बदलाव ज़रूर महसूस कर सकते हैं।
राख की यह परत सूरज की रोशनी को अलग तरीके से बिखेरती है, जिससे मौसम में थोड़ी हल्की लालिमा या आसमान में खूबसूरत रंग दिखाई दे सकते हैं। सूर्योदय और सूर्यास्त थोड़ा अलग दिख सकते हैं। यह असर कुछ ही दिनों के लिए रहेगा।
IMD का अनुमान: राख का असर बहुत कम, और 25 नवंबर तक हट जाएगी
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने साफ कहा है कि ज्वालामुखी की राख का असर दिल्ली पर बहुत कम और बहुत अल्पकालिक है। राख का बादल तेजी से आगे बढ़ रहा है और 25 नवंबर 2025 तक भारत से बाहर निकलकर चीन की ओर बढ़ जाएगा।
अर्थात, दिल्ली को लंबे समय तक इसके असर का सामना नहीं करना पड़ेगा।
Breaking :
The Hayli Gubbi volcano in northern Ethiopia has erupted for the first time in recorded history.
Satellite data shows:
• Black: current ash cloud
• Green: +6 hrs forecast
• Yellow: +12 hrs
• Red: +18 hrsAuthorities and monitoring agencies are assessing the… pic.twitter.com/U1P3ALld0A
— Africalix (@Africa_lix) November 24, 2025
क्या हिमालय पर होगा असर?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह राख ज़मीन से बहुत ऊपर है, इसलिए इसका सीधा असर जमीन के प्रदूषण पर नहीं पड़ेगा। लेकिन ऊँचाई वाले क्षेत्रों में सल्फर डाइऑक्साइड का असर थोड़ा अधिक हो सकता है। हिमालय जैसे ऊँचाई वाले इलाकों में इसके कुछ पर्यावरणीय प्रभाव महसूस किए जा सकते हैं, हालांकि ये भी बहुत गंभीर होने की संभावना नहीं है।
राख से सबसे ज्यादा खतरा किसे है?
राख जमीन पर रहने वाले लोगों के लिए उतनी खतरनाक नहीं है जितनी यह हवाई जहाज़ों के लिए होती है। दरअसल, ज्वालामुखी की राख में मौजूद ग्लास जैसी महीन सामग्री इंजन को नुकसान पहुँचा सकती है। यही कारण है कि DGCA ने तुरंत एयरलाइंस को एडवाइजरी जारी की है।
पायलटों को राख वाले क्षेत्र से दूर राह चुनने की सलाह दी गई है, और उड़ानों की ऊँचाई व दिशा में बदलाव किए जा रहे हैं ताकि किसी भी तरह का खतरा टाला जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि आसमान में फैली राख रात के तापमान को थोड़ा बढ़ा सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि राख की परत एक पतले बादल की तरह काम करती है, जो धरती की गर्मी को ऊपर जाने से थोड़ा रोक लेती है। हालाँकि, यह असर भी बहुत अधिक नहीं होगा।
क्या लोगों को कोई सावधानी बरतनी चाहिए?
दिल्लीवालों को चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। हवा की खराब गुणवत्ता अभी भी स्थानीय प्रदूषण स्रोतों—जैसे वाहन, धूल, पराली और मौसम के कारण ही है। ज्वालामुखी की राख इसका मुख्य कारण नहीं बनेगी।
यदि किसी को सांस संबंधी समस्या है, तो सामान्य प्रदूषण से बचने वाले उपाय जारी रखने चाहिए जैसे मास्क पहनना, सुबह जल्दी बाहर न निकलना, और घर में वेंटिलेशन का ध्यान रखना।
राख का दिल्ली पर असर डर जितना बड़ा नहीं
इथियोपिया के ज्वालामुखी विस्फोट की राख का दिल्ली तक पहुँचना एक दिलचस्प और दुर्लभ घटना है, लेकिन इसका जमीन पर रहने वाले लोगों के जीवन पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा। दिल्ली की हवा वैसे ही खराब है, लेकिन इस राख से उसमें और गंभीर गिरावट आने की उम्मीद नहीं है।
यह घटना मौसम विज्ञान के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, और हमें यह समझने में मदद करती है कि प्रकृति का हर बदलाव दुनिया के दूसरे हिस्सों तक कैसे पहुंच सकता है।
अभी के लिए राहत की बात यही है कि राख ऊपर-ऊपर से गुज़र रही है, कुछ दिनों में पूरी तरह हट जाएगी और तब तक इसके प्रभाव बहुत हल्के रहेंगे।
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