दशहरा में रावण और अन्य पुतले: उत्तराखंड की शिल्प कला का अनोखा सफर

दशहरा में रावण और अन्य पुतले: रावण दहन भारतीय संस्कृति और विशेषकर उत्तर भारत में दशहरा पर्व का एक प्रमुख हिस्सा है। दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहते हैं, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन रावण, कुम्भकरण, मेघनाद जैसे राक्षसों के पुतले जलाए जाते हैं। इन पुतलों का निर्माण केवल एक कला नहीं बल्कि सामाजिक और धार्मिक परंपरा का प्रतीक है।

दशहरा में रावण और अन्य पुतले
          दशहरा में रावण और अन्य पुतले

पुतले बनाने का इतिहास और महत्व:

पुतले बनाने की परंपरा कई सदियों पुरानी है। प्राचीन समय से ही लोग नाट्य और लोककथाओं के माध्यम से अच्छाई और बुराई के संघर्ष को दर्शाते आए हैं। रावण, जो कि महाकाव्य रामायण का प्रमुख खलनायक है, बुराई का प्रतीक माना जाता है। दशहरे के दिन उसके पुतले को जलाना इस बात का प्रतीक है कि बुराई पर अच्छाई हमेशा विजय पाती है।

उत्तराखंड और खासकर अल्मोड़ा, देहरादून, और नैनीताल में पुतले बनाने की कला बेहद प्रसिद्ध है। यहां के कारीगर महीनों पहले से पुतलों की तैयारी शुरू कर देते हैं। पुतले केवल जलाने के लिए नहीं बनाए जाते, बल्कि ये अपने आप में कला और संस्कृति का मिश्रण होते हैं।

पुतले बनाने की सामग्री:

पुतला बनाने के लिए पारंपरिक रूप से इन सामग्रियों का उपयोग होता है:

  1. बांस और लकड़ी – पुतले की संरचना (Skeleton) बनाने के लिए।

  2. खुरदरी मिट्टी और गन्ने का रस – शरीर को आकार देने और मजबूती देने के लिए।

  3. कपड़े और रंग – चेहरे और वस्त्रों की सजावट के लिए।

  4. कागज और रंगीन सजावट – छोटे हिस्सों की सजावट और आंखों, दाढ़ी व बालों के लिए।

  5. बारूद या पटाखे – दहन के समय विस्फोट के लिए।

पुतले की ऊँचाई छोटे स्थानों के लिए 10–15 फीट तक और बड़े मेले में 50–60 फीट तक होती है। अल्मोड़ा में खास तौर पर 20–30 फीट ऊँचे पुतले बनाने की परंपरा है।

पुतले बनाने की प्रक्रिया:

  1. ढांचा तैयार करना:
    सबसे पहले बांस और लकड़ी का ढांचा बनाया जाता है। यह ढांचा पुतले की ऊँचाई और भार को सहन करने में सक्षम होना चाहिए।

  2. मॉडलिंग और आकार देना:
    इसके बाद गन्ने का रस और मिट्टी मिलाकर ढांचे पर शरीर का आकार दिया जाता है। चेहरे और हाथ-पांव का विवरण बड़े ध्यान से बनाया जाता है।

  3. सजावट और रंगाई:
    चेहरे और वस्त्रों को रंगीन कपड़ों और कागज से सजाया जाता है। आंखों और बालों की सजावट में कारीगर अपनी विशेषज्ञता दिखाते हैं।

  4. पुतले को भरना:
    पुतले के अंदर पटाखे और बारूद की छोटी मात्रा भरी जाती है ताकि दहन के समय विस्फोट का दृश्य नाटकीय लगे।

  5. जाँच और अंतिम स्पर्श:
    पुतले को दहन के लिए सुरक्षित रूप से खड़ा किया जाता है। इसे देखने के लिए कई बार परीक्षण किया जाता है।

रावण दहन का आयोजन:

अल्मोड़ा और उत्तराखंड के अन्य हिस्सों में दशहरे के अवसर पर बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। रावण, कुम्भकरण और मेघनाद के पुतले को शहर के मुख्य मैदान में स्थापित किया जाता है।

दहन के दिन भारी भीड़ एकत्र होती है। पहले किसी धार्मिक अनुष्ठान या पूजा के माध्यम से पुतले को ‘शुभ’ घोषित किया जाता है। इसके बाद, लोग रंग-बिरंगी आतिशबाजी और पटाखों के साथ पुतले को जलाते हैं। यह दृश्य अत्यंत रोमांचक और दर्शनीय होता है।

अन्य पुतले और उनका महत्व:

सिर्फ रावण ही नहीं, बल्कि कुम्भकरण और मेघनाद जैसे पुतले भी बनते हैं। कुम्भकरण की नींद और उसकी विशालता का प्रतीक दर्शाया जाता है, जबकि मेघनाद की वीरता और युद्ध कौशल को उजागर किया जाता है। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय पात्रों और आधुनिक संदर्भों पर आधारित पुतले भी बनाए जाते हैं।

पुतले बनाने की कला का सामाजिक पहलू:

पुतले केवल धार्मिक प्रतीक नहीं हैं, बल्कि यह कारीगरों के लिए आजीविका का साधन भी हैं। कई पीढ़ियों से यह कला परिवार से परिवार तक चली आ रही है। इसके अलावा, पुतले बनाने की प्रक्रिया में स्थानीय समुदाय की सहभागिता, सहयोग और रचनात्मकता देखने को मिलती है।

रावण और अन्य पुतले बनाना केवल एक उत्सव का हिस्सा नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत है। यह कला धर्म, समाज और लोककथा का संगम है। पुतले दहन का उत्सव हमें यह सिखाता है कि बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अच्छाई अंततः विजयी होती है। अल्मोड़ा और अन्य उत्तराखंडी शहरों में यह परंपरा हर साल नए उत्साह और नये रंगों के साथ जीवित रहती है।

पुतले बनाने की यह कला, उसके दहन और उत्सव का दृश्य, भारतीय संस्कृति की जीवंतता और रचनात्मकता का प्रतीक है। हर पुतला, चाहे वह छोटा हो या विशाल, हमारी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है और इसे सुरक्षित रखना हम सभी का कर्तव्य है।

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