Delhi Pollution Protest: दिल्ली, भारत की राजधानी, जहां कभी बसंती हवाओं का स्वागत किया जाता था, आज वहीं लोग साफ़ हवा के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। “साँस लेना मेरा हक़ है” के नारों से इंडिया गेट से लेकर राजपथ तक की हवा गूंज उठी। नवंबर 2025 में जब दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 400 के पार चला गया, तब आम नागरिकों ने खुद अपने हक़ की लड़ाई लड़ने का फैसला किया।

दिल्ली की हवा – एक ज़हरीला सच:
दिल्ली की हवा पिछले कुछ वर्षों में धीरे-धीरे जहर बन चुकी है। हर सर्दी में धुंध और स्मॉग की परत शहर को इस कदर ढक लेती है कि सूरज की किरणें भी धुंधली पड़ जाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, दिल्ली में हर साल सर्दियों के महीनों में वायु प्रदूषण का स्तर 10 गुना तक बढ़ जाता है।
गाड़ियों का धुआं, पराली जलना, औद्योगिक धुआं, निर्माण कार्यों की धूल और कमजोर प्रशासनिक नियंत्रण – ये सभी मिलकर राजधानी को गैस चैंबर बना रहे हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि हर साल लाखों लोग श्वसन और हृदय रोगों से जूझ रहे हैं।
“Every 3rd Child Has Damaged Lungs”: Protest Over Air Pollution In Delhi https://t.co/VmgdHS2Cz4 pic.twitter.com/g36ebb9aCI
— NDTV (@ndtv) November 9, 2025
इंडिया गेट पर हुआ शांतिपूर्ण विरोध:
रविवार, 9 नवंबर 2025 को सैकड़ों दिल्लीवासी इंडिया गेट पर एकजुट हुए। उनके हाथों में तख्तियां थीं – “Clean Air is Our Right”, “Stop Killing Us Slowly”, “Saas Lena Mushkil Hai, Sarkar Kahan Hai?”
यह प्रदर्शन किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि नागरिकों की जागरूकता का प्रतीक था। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी ने अपनी आवाज़ मिलाई। माता-पिता अपने बच्चों के साथ पहुंचे ताकि वे दिखा सकें कि यह लड़ाई सिर्फ आज के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी है।
प्रदर्शन के दौरान भी कई लोगों को मास्क और इनहेलर की जरूरत पड़ी। वहीं कुछ लोग अपने साथ पौधे लेकर आए और प्रतीकात्मक रूप से उन्हें इंडिया गेट के आसपास लगाया – यह संदेश देने के लिए कि “अगर सरकार नहीं लगाएगी, तो हम खुद लगाएंगे।”
सरकार और प्रशासन की प्रतिक्रिया:
प्रदर्शन के बाद दिल्ली पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को थोड़ी देर के लिए हिरासत में लिया, यह कहते हुए कि इंडिया गेट प्रदर्शन स्थल नहीं है। लेकिन इस कार्रवाई से लोगों का आक्रोश और बढ़ गया।
दिल्ली सरकार ने अपने बयान में कहा कि वह ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) के तहत निर्माण कार्य रोक रही है, स्कूलों में छुट्टी दी जा रही है और वर्क फ्रॉम होम की सलाह दी गई है।
हालांकि प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यह उपाय हर साल होते हैं लेकिन स्थिति वैसी की वैसी रहती है। एक छात्रा ने कहा –
“हर साल यही होता है, कुछ दिन का हल्ला, कुछ ट्वीट्स, और फिर सब भूल जाते हैं। लेकिन हम अब नहीं भूलेंगे।”
पराली, वाहन और राजनीति का ताना-बाना:
दिल्ली का प्रदूषण सिर्फ दिल्ली का नहीं, पूरे उत्तर भारत का मसला है। पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की परंपरा अब भी जारी है। लाख कोशिशों के बावजूद किसान इसे रोक नहीं पा रहे क्योंकि उनके पास वैकल्पिक उपाय नहीं हैं।
इसके अलावा दिल्ली की सड़कों पर करीब 1.4 करोड़ से ज्यादा वाहन हैं, जिनमें से आधे पुराने और प्रदूषणकारी हैं। डीज़ल जनरेटर, धूलभरी सड़कों और निर्माण स्थलों की वजह से हवा में सूक्ष्म कण (PM2.5) का स्तर लगातार बढ़ रहा है।
राजनीति भी इस मुद्दे से अछूती नहीं रही। एक ओर केंद्र सरकार राज्य सरकार पर लापरवाही का आरोप लगा रही है, वहीं राज्य सरकार कहती है कि “हवा को पार्टी नहीं, नीति चाहिए।”

स्वास्थ्य पर बढ़ता खतरा:
दिल्ली में हर तीसरे व्यक्ति को खांसी, आंखों में जलन या सांस लेने में दिक्कत की समस्या है। डॉक्टरों का कहना है कि बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
एम्स (AIIMS) की एक रिपोर्ट के अनुसार, लगातार खराब हवा में रहने से फेफड़ों की क्षमता 20% तक घट सकती है।
एक डॉक्टर ने कहा –
“हम अब ऐसे मरीज देख रहे हैं जो न तो धूम्रपान करते हैं, न फैक्ट्री में काम करते हैं, लेकिन उनके फेफड़े 60 साल के व्यक्ति जैसे हो गए हैं।”
प्रदर्शनकारियों की मांगें:
प्रदर्शन में उठी प्रमुख मांगें थीं:
- पराली जलाने पर सख्त कानून और विकल्प – किसानों को सब्सिडी और उपकरण दिए जाएं ताकि वे पराली को जलाने की बजाय उपयोग में ला सकें।
- पुराने वाहनों पर पूर्ण प्रतिबंध – पुराने डीज़ल वाहनों को बंद कर इलेक्ट्रिक गाड़ियों को प्रोत्साहन मिले।
- निर्माण धूल नियंत्रण – हर निर्माण स्थल पर धूल रोकने की व्यवस्था अनिवार्य हो।
- सार्वजनिक परिवहन का विस्तार – मेट्रो और बसों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि लोग निजी वाहनों का कम इस्तेमाल करें।
- रियल-टाइम वायु मॉनिटरिंग डेटा – सरकार रोज़ाना पारदर्शी तरीके से हर इलाके की एयर क्वालिटी रिपोर्ट जारी करे।
लोगों की पहल – उम्मीद की किरण:
जहां सरकारें योजनाएं बना रही हैं, वहीं कुछ नागरिक समूह अपने स्तर पर कदम उठा रहे हैं। कई NGOs ने “ग्रीन दिल्ली मिशन” शुरू किया है, जिसके तहत हर व्यक्ति साल में कम से कम पाँच पेड़ लगाने की शपथ लेता है।
स्कूलों में बच्चों को अब “एयर हेल्थ एजुकेशन” दी जा रही है ताकि वे समझ सकें कि हवा की शुद्धता भी उतनी ही जरूरी है जितनी पानी की।
अब हवा मांग रही है न्याय:
दिल्ली का यह विरोध सिर्फ एक दिन की घटना नहीं थी – यह उस पीड़ा की आवाज़ थी जो हर खिड़की, हर छत, और हर फेफड़े से निकल रही है।
यह प्रदर्शन एक चेतावनी थी कि अगर अब नहीं चेते, तो आने वाले वर्षों में दिल्ली में “साँस लेना” एक विलासिता बन जाएगा।
लोगों का कहना है कि अब वक्त “जुर्माने” या “छिड़काव” से आगे बढ़ने का है। हमें हवा के लिए कानून नहीं, संकल्प चाहिए। क्योंकि अगर हवा नहीं रहेगी, तो विकास का क्या मतलब?
दिल्ली का प्रदूषण सिर्फ एक शहर की समस्या नहीं, यह एक सभ्यता की चेतावनी है। आज दिल्ली में जो हो रहा है, कल वह हर महानगर की हकीकत हो सकती है।
इंडिया गेट पर उठी यह आवाज़ आने वाली पीढ़ियों की सांस बचाने की शुरुआत है।
जैसा कि एक छोटे बच्चे ने अपनी तख्ती पर लिखा था –
“मुझे डॉक्टर नहीं चाहिए, मुझे साफ हवा चाहिए।”
अगर यह मासूम आवाज़ भी हमें झकझोर नहीं सकती, तो शायद हम अपने भविष्य से मुँह मोड़ चुके हैं।
अब वक्त आ गया है कि हर दिल्लीवासी, हर भारतीय, अपनी साँसों के अधिकार के लिए एकजुट हो – क्योंकि हवा भी अब न्याय मांग रही है।
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