Delhi Crackers News: दिल्ली हर साल सर्दियों की शुरुआत के साथ एक ही संकट झेलती है — जहरीली हवा का। धुंध, पराली, वाहनों का धुआं और औद्योगिक उत्सर्जन मिलकर राजधानी को धुंध के पर्दे में ढक देते हैं। ऐसे में दीपावली का त्योहार आते ही प्रदूषण पर बहस फिर तेज हो जाती है।
इस साल सुप्रीम कोर्ट ने इस बहस को एक नया मोड़ दिया है। अदालत ने दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में ग्रीन पटाखों की बिक्री और जलाने की सीमित अनुमति दी है। यह फैसला एक ओर लोगों में खुशी का कारण बना है, तो दूसरी ओर पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या कहता है | Delhi Crackers News
सर्वोच्च न्यायालय ने साफ किया है कि दिल्लीवासी दीपावली पर केवल ग्रीन पटाखे जला सकेंगे — और वह भी सीमित समय के भीतर।
- अनुमति अवधि: 18 अक्टूबर से 21 अक्टूबर 2025 तक।
- पटाखे फोड़ने का समय: सुबह 6 से 7 बजे और रात 8 से 10 बजे तक।
- सिर्फ NEERI-प्रमाणित पटाखे: हर पटाखे पर QR कोड और “ग्रीन क्रैकर” का चिन्ह होना अनिवार्य है।
- बिक्री नियम: केवल लाइसेंसधारी विक्रेता ही तय स्थानों पर बिक्री कर सकेंगे।
- प्रवर्तन: प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, स्थानीय प्रशासन और पुलिस की जिम्मेदारी होगी कि नियमों का पालन सुनिश्चित करें।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह अनुमति “प्रायोगिक अवधि” के रूप में दी जा रही है। यदि इससे प्रदूषण में वृद्धि देखी गई, तो भविष्य में दोबारा प्रतिबंध लगाया जा सकता है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा की प्रतिक्रिया

इस फैसले पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने खुशी जताते हुए कहा कि यह “दिल्ली की सनातन-प्रेमी सरकार की उपलब्धि” है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय दिल्लीवासियों के सही मतदान का परिणाम है, जिसने धार्मिक परंपरा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कायम किया है।
सचदेवा ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार पर “हिंदू विरोधी रवैया” अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार ने जानबूझकर गलत आंकड़े प्रस्तुत किए, जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट ने कई वर्षों तक दीपावली पर पटाखों पर रोक लगाई थी।
उनका कहना है कि भाजपा हमेशा यह दावा करती रही है कि दीपावली की एक रात में जलाए जाने वाले पटाखे दिल्ली के प्रदूषण का प्रमुख कारण नहीं हैं। प्रदूषण के असली कारण हैं — औद्योगिक उत्सर्जन, वाहनों का धुआं, और पराली जलाना।
क्या हैं ग्रीन पटाखे और क्यों खास हैं?

ग्रीन पटाखे, यानी ऐसे पटाखे जो कम धुआं और कम विषैली गैसें छोड़ते हैं। इन्हें CSIR-NEERI (नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट) और CEERI ने विकसित किया है।
इन पटाखों में पोटेशियम नाइट्रेट और सल्फर की मात्रा कम होती है, और इनमें बैरियम नाइट्रेट का उपयोग नहीं किया जाता। यही कारण है कि इनसे पारंपरिक पटाखों की तुलना में 25–30 प्रतिशत तक कम प्रदूषण होता है।
इनके तीन प्रमुख प्रकार हैं —
-
SWAS (Safe Water Releaser): यह जल वाष्प छोड़ता है और PM स्तर घटाता है।
-
STAR (Safe Thermite Cracker): यह सीमित ध्वनि और प्रकाश उत्पन्न करता है।
-
SAFAL (Safe Minimal Aluminum): इसमें एल्युमिनियम की मात्रा घटाई गई है।
हालाँकि वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि ये “कम हानिकारक” हैं, “संपूर्ण सुरक्षित” नहीं। यदि बड़ी मात्रा में फोड़े जाएँ तो प्रभाव वही होगा — हवा में धुआँ और हानिकारक कणों का बढ़ना।
दिल्ली में पिछले साल क्या हुआ था
पिछले साल दिल्ली सरकार ने पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया था। इसके बावजूद कई इलाकों में अवैध पटाखों की बिक्री और जलाना जारी रहा। प्रदूषण के स्तर में उस दौरान 350 AQI से ऊपर की वृद्धि दर्ज की गई थी।
विशेषज्ञों ने बताया कि दीपावली के बाद दिल्ली की हवा में PM2.5 की मात्रा औसतन 10 गुना तक बढ़ जाती है। हालांकि इसका बड़ा कारण पराली जलाना भी होता है, लेकिन पटाखों का तात्कालिक असर भी काफी गंभीर रहता है।
इस बार क्या होगा अलग
इस बार अदालत ने प्रतिबंध को पूरी तरह हटाया नहीं है, बल्कि सीमित छूट दी है।
- केवल “ग्रीन पटाखे” ही मान्य होंगे।
- तय समय और तारीख के अलावा फोड़ने पर सख्त कार्रवाई होगी।
- दुकानों पर बिक्री के लिए QR कोड-युक्त पैकेट ही उपलब्ध रहेंगे।
- अवैध पटाखे बेचने पर लाइसेंस रद्द किया जाएगा।
- पर्यावरण विभाग और दिल्ली पुलिस की टीमें निगरानी रखेंगी।
इस तरह यह फैसला एक “नियंत्रित स्वतंत्रता” जैसा है — जिसमें लोगों को परंपरा निभाने का मौका दिया गया है, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं।
राजनीति और परंपरा का संगम
दीपावली पर पटाखों का सवाल अब केवल पर्यावरणीय नहीं, राजनीतिक भी बन चुका है।
भाजपा ने इसे “सनातन संस्कृति की जीत” बताया, जबकि आप पार्टी और कुछ पर्यावरण समूहों ने इसे “पीछे की ओर कदम” कहा।
वीरेंद्र सचदेवा ने कहा कि “पिछली सरकार ने सनातनी त्योहारों को निशाना बनाया था। हमारी सरकार ने अदालत में सही तथ्य रखे, जिसके कारण अब न्यायालय ने जनता की भावना का सम्मान किया।”
उनका यह बयान स्पष्ट रूप से दिल्ली के राजनीतिक माहौल को धार्मिक भावनाओं से जोड़ता है। वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि पटाखों की छूट से हवा की स्थिति और खराब हो सकती है, जिससे जनता को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ झेलनी पड़ेंगी।
प्रदूषण के असली कारण— क्या पटाखे दोषी हैं?
दिल्ली की हवा को जहरीला बनाने में पटाखों का योगदान कितना है, इस पर वर्षों से बहस चल रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक —
- दीपावली की रात में प्रदूषण का स्तर अचानक बढ़ता है, लेकिन यह दो–तीन दिन में सामान्य हो जाता है।
- इसके बाद हवा की गुणवत्ता पर सबसे अधिक असर पराली जलाने और ठंडे मौसम में हवा की गति घटने से पड़ता है।
- वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले उत्सर्जन लगातार पूरे साल प्रदूषण बढ़ाते रहते हैं।
इसलिए केवल दीपावली को दोष देना पूरी तस्वीर को नजरअंदाज करना होगा। लेकिन यह भी सच है कि त्योहार के दौरान जब हवा पहले से खराब होती है, तब पटाखों का असर ज्यादा खतरनाक हो जाता है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीन पटाखे भले ही कम प्रदूषण फैलाते हों, लेकिन यदि बड़ी मात्रा में जलाए जाएँ, तो उनका असर भी गंभीर होगा।
दिल्ली में हर साल दीपावली के बाद अस्पतालों में अस्थमा, खांसी, गले की एलर्जी और फेफड़ों से जुड़ी शिकायतें 20–25 प्रतिशत तक बढ़ जाती हैं। बच्चे और बुजुर्ग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
कई डॉक्टरों ने कहा है कि अगर लोग सच में उत्सव मनाना चाहते हैं, तो दीयों और रोशनी से घर सजाएँ, न कि धुएँ और बारूद से।
जनता की जिम्मेदारी सबसे बड़ी
सुप्रीम कोर्ट ने जो भरोसा जनता पर जताया है, वह तभी सफल होगा जब दिल्लीवासी सचमुच नियमों का पालन करें।
लोगों को चाहिए कि —
- केवल ग्रीन पटाखे ही खरीदें।
- समय का पालन करें — सुबह 6–7 बजे और रात 8–10 बजे तक ही फोड़ें।
- बच्चों को बिना निगरानी पटाखे न दें।
- खुले मैदान या सुरक्षित जगह पर ही जलाएँ।
- पटाखों की जगह पर्यावरण-हितैषी विकल्पों को बढ़ावा दें, जैसे लेज़र शो या दीप जलाना।
यदि जनता सहयोग नहीं करती, तो यह निर्णय आने वाले वर्षों में फिर से सख्त प्रतिबंध में बदल सकता है।
सांस्कृतिक पहचान और आधुनिक जिम्मेदारी
दीपावली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है। यह वह दिन है जब हम अंधकार पर प्रकाश की विजय का उत्सव मनाते हैं। लेकिन क्या हम उसी अंधकार को फिर से हवा और आकाश में नहीं फैला रहे? ग्रीन पटाखों की अनुमति एक संकेत है — कि परंपरा और आधुनिकता साथ चल सकती हैं, यदि हम दोनों के बीच संतुलन बनाना सीखें। धार्मिक स्वतंत्रता और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं। प्रकृति की रक्षा करना ही असली पूजा है।
जिम्मेदार दीपावली की ओर
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न तो पूरी आज़ादी है, न पूरी रोक। यह एक “मध्य रास्ता” है, जहाँ लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी हो और प्रदूषण पर नियंत्रण भी।
वीरेंद्र सचदेवा का यह बयान कि “यह दिल्लीवासियों की जीत है”, जनता के मन को भले भाए, लेकिन असली जीत तब होगी जब दिल्ली की हवा स्वच्छ रहे, बच्चों को सांस लेने में तकलीफ न हो और हम सब दीपावली को रोशनी के साथ जिम्मेदारी से मनाएँ।
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