Chamoli Cloudburst News: उत्तराखंड में एक और आपदा, चमोली के नंदानगर में बादल फटने से तबाही, 6 मकान बहे और कई लोग लापता

Chamoli Cloudburst News: उत्तराखंड इस समय मानसून की मार झेल रहा है। कुछ दिन पहले ही देहरादून में बादल फटने से भारी तबाही मची थी और अब चमोली जिले के नंदानगर घाट क्षेत्र ने एक और दिल दहला देने वाली घटना देखी। बुधवार रात नंदानगर के धुर्मा गाँव और कुंन्त्री-लंगाफली वार्ड में बादल फटने से बाढ़ जैसे हालात पैदा हो गए। तेज बारिश और पहाड़ी से गिरे मलबे ने छह मकानों को पूरी तरह से बहा दिया। इस हादसे में कई लोग मलबे में दब गए और अब तक सात से दस लोगों के लापता होने की खबर है।

बादल फटने की घटना का विवरण | Chamoli Cloudburst News

बुधवार रात अचानक मौसम ने करवट बदली और नंदानगर घाट क्षेत्र पर कुदरत का कहर टूट पड़ा। पहाड़ की ढलानों से पानी और मलबा इतनी तेजी से नीचे आया कि घरों को संभलने का मौका ही नहीं मिला। देखते ही देखते छह मकान बह गए और गाँव का एक बड़ा हिस्सा मलबे में दब गया।

धुर्मा गाँव और कुंन्त्री-लंगाफली वार्ड इस आपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। घटना के बाद आसपास के इलाकों में दहशत फैल गई। गाँव के लोग रातभर सुरक्षित जगह की तलाश में भागते रहे। कई लोगों ने अपने परिवारजनों को मलबे में खो दिया।

लापता लोग और सुरक्षित निकाले गए

अब तक सात से दस लोगों के लापता होने की पुष्टि हो चुकी है। इनमें से कुछ लोगों की पहचान सामने आई है।

कुंवारी सिंह (42), उनकी पत्नी कान्ता देवी (38) और उनके जुड़वा बेटे विकास और विशाल (10 वर्ष) इस आपदा में गुम हैं।
इसके अलावा नरेंद्र सिंह (40), जगदम्बा प्रसाद (70), भग देवी और देवेश्वरी देवी (65) भी मलबे में दबे बताए जा रहे हैं।
धुर्मा गाँव से गुमन सिंह (75) और ममता देवी (38) लापता हैं।

प्रशासन और राहत-बचाव दल अब तक दो लोगों को सुरक्षित निकालने में सफल रहे हैं।

मौसम और नदियों का उफान

Chamoli Cloudburst News

भारी बारिश के कारण मोक्ष नदी उफान पर है। नदी का जलस्तर अचानक बढ़ने से आसपास के गाँवों के रास्ते कट गए हैं। छोटे-छोटे नाले भी रौद्र रूप में आ गए हैं। लोगों ने बताया कि देखते ही देखते नाले इतने बड़े हो गए कि पूरे घर, खेत और सड़कें पानी में बह गईं।

मौसम विभाग ने अगले कुछ दिनों तक राज्य में भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। इससे लोगों की चिंता और बढ़ गई है क्योंकि अब भूस्खलन और बाढ़ का खतरा और तेज हो सकता है।

राहत-बचाव अभियान

जैसे ही बादल फटने की खबर मिली, प्रशासन ने तुरंत राहत और बचाव दल रवाना कर दिए। गोचर से NDRF की टीम मौके पर भेजी गई है। SDRF की टीम, स्थानीय पुलिस और मेडिकल टीम भी राहत कार्यों में लगी हुई है।

जिला प्रशासन की ओर से तीन एम्बुलेंस और चिकित्सक दल तैनात किए गए हैं ताकि घायल लोगों को तुरंत प्राथमिक उपचार मिल सके। मलबे में दबे लोगों को निकालने के लिए JCB मशीनें लगाई गई हैं।

गाँव के लोग भी प्रशासन की मदद कर रहे हैं। वे मलबे में दबे लोगों को खोज रहे हैं और प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थान तक पहुंचा रहे हैं।

स्थानीय लोगों का दर्द

गाँव वालों के लिए यह रात किसी भयावह सपने से कम नहीं थी। कई परिवारों ने अपनी आंखों के सामने अपने घरों को बहते देखा। बच्चे और बुजुर्ग दहशत में हैं। कुछ लोग अपने परिजनों की तलाश में लगातार मदद की गुहार लगा रहे हैं।

एक ग्रामीण ने बताया कि रात के समय अचानक इतनी जोर से पानी आया कि सब लोग घबरा गए। “हमारे पास भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। जो घर रास्ते में थे, सब बह गए।”

प्रशासन और सरकार की प्रतिक्रिया

चमोली के जिलाधिकारी संदीप तिवारी ने बताया कि घटना बहुत गंभीर है और राहत-बचाव कार्य युद्ध स्तर पर जारी है। उन्होंने कहा कि जितने भी संसाधन संभव हैं, सभी मौके पर भेज दिए गए हैं।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी स्थिति पर नज़र बनाए रखी है। उन्होंने जिला प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि प्रभावित लोगों को तुरंत राहत सामग्री, अस्थायी आवास और स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएं।

मुख्यमंत्री ने प्रभावित परिवारों को हर संभव सहायता का भरोसा दिलाया है और कहा है कि राज्य सरकार इस आपदा की हर परिस्थिति में मदद करेगी।

देहरादून की घटना से जुड़ा संदर्भ

इससे कुछ ही दिन पहले राजधानी देहरादून के सहस्त्रधारा और कार्लीगाड़ इलाके में भी बादल फटने से बड़ी तबाही हुई थी। वहाँ अचानक आई बाढ़ ने कई होटल और रिसॉर्ट बहा दिए। नदी का जलस्तर इतना बढ़ गया कि सड़कें नदियों में तब्दील हो गईं। सलोना मार्ग पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और लोग रात में घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर भागे।

देहरादून की इस घटना के बाद लोग थोड़े संभले ही थे कि अब चमोली की घटना ने फिर से लोगों की नींद उड़ा दी है।

क्यों बढ़ रही हैं बादल फटने की घटनाएँ?

हिमालयी क्षेत्र में बादल फटना कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब इसकी आवृत्ति लगातार बढ़ रही है। इसके पीछे कई वजहें हैं।

  • सबसे पहली वजह है जलवायु परिवर्तन। तापमान में लगातार हो रही वृद्धि और मानसून पैटर्न में बदलाव पहाड़ों पर भारी बारिश का कारण बन रहे हैं।
  • वनों की कटाई और अंधाधुंध निर्माण ने मिट्टी को कमजोर कर दिया है। इससे बारिश का पानी सीधे ढलानों से नीचे आता है और बाढ़ का रूप ले लेता है।
  • ग्लेशियरों का पिघलना और पहाड़ों पर मानवीय गतिविधियाँ भी इन घटनाओं को और गंभीर बना रही हैं।

आगे क्या ज़रूरी है?

इस घटना से हमें यह सीखने की ज़रूरत है कि प्राकृतिक आपदाओं के सामने हमारी तैयारी कितनी कमजोर है।

  • पर्वतीय इलाकों में निर्माण कार्य को नियंत्रित किया जाए और आपदा प्रबंधन के नियमों का पालन अनिवार्य किया जाए।
  • उच्च जोखिम वाले गाँवों को चिन्हित कर वहाँ रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की योजना बने।
  • आधुनिक तकनीक के माध्यम से अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किए जाएं ताकि लोगों को समय रहते अलर्ट किया जा सके।
  • पहाड़ों में वनों की सुरक्षा और नए पेड़ लगाने पर ज़ोर दिया जाए ताकि मिट्टी का कटाव रोका जा सके।
  • स्कूलों और गाँवों में नियमित रूप से आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाए।

चमोली का यह बादल फटना एक बार फिर हमें चेतावनी दे रहा है कि प्रकृति के सामने हम कितने असहाय हैं। इस आपदा में कई घर उजड़ गए, मासूम बच्चे और बुजुर्ग लापता हो गए और परिवार बिखर गए। राहत-बचाव कार्य जारी है, लेकिन प्रभावित परिवारों का दर्द शब्दों में बयां करना मुश्किल है।

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में हर साल इस तरह की घटनाएँ लोगों को झकझोर देती हैं। यह समय है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर आपदा प्रबंधन को और मजबूत बनाए। ताकि अगली बार जब बादल फटे, तो लोग तैयार हों और ज़िंदगियाँ बचाई जा सकें।

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