Bihar Election Results 2025: किसकी लगी लॉटरी और कौन हुआ मैदान से बाहर?

Bihar Election Results 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ने राजनीति के कई चेहरे बदल दिए हैं। इस बार नतीजों ने साफ कर दिया कि जनता ने किसके काम पर मुहर लगाई और किसके वादों को ठुकरा दिया। 243 सीटों वाली विधानसभा में एनडीए ने 200 के जादुई आंकड़े को छूकर एक बार फिर इतिहास रच दिया। यह नतीजा न सिर्फ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लोकप्रियता की पुष्टि करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि बिहार के मतदाता स्थिरता और अनुभव को प्राथमिकता देते हैं।

पूरे चुनावी मौसम में युवा बनाम अनुभव, बदलाव बनाम निरंतरता और स्थानीय मुद्दों की गूंज सुनाई देती रही। लेकिन जैसे ही नतीजे आए, यह स्पष्ट हो गया कि बिहार की जनता ने विकास, भरोसे और सरकारी योजनाओं के असर पर अपनी पसंद तय की। इसी परिणाम ने कई नेताओं को नई ऊँचाई पर पहुंचा दिया, तो कुछ को राजनीतिक धरातल पर गिराने का काम भी कर दिया।

नीतीश कुमार का एक और दमदार वापसी-शॉट | Bihar Election Results 2025

Bihar Election Results 2025

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का नाम अब स्थिरता का प्रतीक बन चुका है। लगातार दो दशक से वह सत्ता में बने हुए हैं और इस बार भी जनता ने उन्हें भरपूर समर्थन दिया। जेडीयू को 85 सीटें मिलना इस बात का प्रमाण है कि जनता ने उनके अनुभव पर भरोसा जताया। एनडीए की कुल 202 सीटें न सिर्फ बहुमत का आंकड़ा पार करती हैं, बल्कि 2010 के ऐतिहासिक प्रदर्शन को भी पीछे छोड़ती हैं।

लोगों के बीच नीतीश की छवि एक शांत, विकास-वादी और संतुलित नेता की है जो गठबंधन राजनीति को संभालने का हुनर रखते हैं। विपक्ष ने चाहे जितना उन्हें निशाना बनाया, लेकिन मतदाताओं ने उनकी नीतियों, योजनाओं और महिला सशक्तिकरण पर किए कार्यों को महत्व दिया। यह जीत उनके राजनीतिक करियर की सबसे मजबूत वापसी मानी जा रही है।

चिराग पासवान का धमाकेदार उभार

2020 में सिर्फ एक सीट पर सिमट चुकी लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) ने इस बार चुनाव में नया इतिहास बना दिया। चिराग पासवान ने अपने करियर का सबसे चमकदार प्रदर्शन करते हुए 29 में से 19 सीटें जीत लीं। पासवान वोट के साथ-साथ युवा मतदाताओं में भी उनका प्रभाव दिखा। दलित समाज की एकजुटता और चिराग की साफ-सुथरी छवि ने बड़ी भूमिका निभाई।

इस नतीजे ने साफ कर दिया कि चिराग अब बिहार की राजनीति में एक बड़े चेहरे के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। उनकी यह जीत पासवान समुदाय की भावनाओं और राजनीतिक सूझबूझ दोनों का मिश्रण है।

एआईएमआईएम ने फिर दोहराई सीमांचल की कहानी

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने सीमांचल में एक बार फिर अपनी पकड़ दिखा दी। जोखीहाट, कोचाधामन, अमौर और बैसी—ये चारों सीटें उन्होंने 2020 में जीती थीं और इस बार भी वही इतिहास दोहराया। हालांकि उन्होंने पूरे बिहार में व्यापक विस्तार की कोशिश की, लेकिन सीमांचल ही उनका मुख्य आधार साबित हुआ।

उनकी जीत मुस्लिम बहुल इलाकों में मौजूद असंतोष और स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने का परिणाम मानी जा रही है। इस प्रदर्शन ने साबित किया कि ओवैसी अभी भी सीमांचल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण फैक्टर बने रहेंगे।


महिला मतदाताओं ने बदला चुनावी समीकरण

इस बार का चुनाव एक अनोखे बदलाव के साथ सामने आया—महिलाओं ने पुरुषों से कहीं ज्यादा वोट डाला। लगभग 71.6% महिलाओं ने मतदान किया, जबकि पुरुषों का प्रतिशत 62.8% रहा। महिलाओं की यह भारी भागीदारी चुनाव की दिशा बदलने में निर्णायक साबित हुई।

सरकार की ओर से चलाए गए महिला रोजगार, उद्यमिता और सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं का असर बेहद साफ नजर आया। मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना जैसी योजनाएँ गरीब और पिछड़े वर्ग की महिलाओं में खूब लोकप्रिय हुईं। यह नया वोट बैंक भविष्य की राजनीति को भी गहराई से प्रभावित करेगा।

एनडीए के छोटे साथी भी बने बड़ी जीत के हिस्सेदार

एनडीए के सहयोगी दलों ने इस बार अपने-अपने इलाकों में अच्छा प्रदर्शन किया। जीतन राम मांझी की हम पार्टी ने छह में से पाँच सीटें, चिराग पासवान की पार्टी ने 19 और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम ने चार सीटों पर शानदार प्रदर्शन किया।

यह नतीजे दिखाते हैं कि गठबंधन के छोटे दलों का धरातल पर मजबूत संगठन और जातिगत समीकरण चुनावी सफलता में अहम भूमिका निभाते हैं। एनडीए की बढ़त सिर्फ भाजपा और जेडीयू की वजह से नहीं, बल्कि इन छोटे दलों की मेहनत का नतीजा भी है।

तेजस्वी यादव को सबसे बड़ा झटका

तेजस्वी यादव को इस चुनाव में भारी नुकसान झेलना पड़ा। उन्हें विपक्ष की तरफ से मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में पेश किया गया था और 2020 में उनके प्रदर्शन ने पूरे राज्य में उनकी छवि मजबूत की थी। लेकिन इस बार सिर्फ 25 सीटें मिलना पार्टी के लिए बड़ा झटका है।

तेजस्वी अपने मजबूत गढ़ राघोपुर से तो जीत गए, लेकिन राज्यभर में उनकी अपील फीकी पड़ गई। यह नतीजा उनके राजनीतिक सफर में एक ठहराव का संकेत माना जा रहा है। जनता ने इस बार युवाओं के उभार की बजाय अनुभव पर भरोसा जताया।

कांग्रेस की निराशाजनक तस्वीर

कांग्रेस इस बार भी बिहार में अपने प्रदर्शन को सुधार नहीं पाई। राहुल गांधी की यात्राएँ, भाषण और ‘वोटर अधिकार’ अभियान भी जमीन पर असर नहीं डाल सके। पार्टी का सीटों का आंकड़ा एकल अंकों तक सिमट जाना बताता है कि उनकी पकड़ बिहार की राजनीति से लगभग खत्म हो चुकी है।

2020 में 70 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ 19 जीतने वाली कांग्रेस इस बार उस प्रदर्शन को भी दोहरा नहीं सकी। मतदाता कहीं ना कहीं कांग्रेस को विकल्प के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखे।

प्रशांत किशोर की जमीन पर हार

सबसे बड़ा झटका उन लोगों को लगा जो मानते थे कि प्रशांत किशोर अपनी राजनीतिक समझ और रणनीति के दम पर बिहार में नया विकल्प तैयार करेंगे। दो साल की पदयात्रा, गाँव-गाँव का संपर्क और जोश से भरे अभियान के बावजूद जन सुराज पार्टी जमीन नहीं पकड़ पाई और NOTA से भी कम वोट मिले।

उनकी रणनीति को लेकर मतदाताओं में संशय रहा, खासकर तब जब उन्होंने खुद चुनाव लड़ने का फैसला नहीं किया। इसका असर पार्टी की विश्वसनीयता पर पड़ा।

मुक़ेश सहनी का प्रभाव कम हुआ

मुक़ेश सहनी को सीमांचल और पूर्वी बिहार में एक बड़े चेहरे के तौर पर पेश किया गया था। उन्हें महागठबंधन की तरफ से उप मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी घोषित किया गया। लेकिन उनकी पार्टी वीआईपी चुनाव में उम्मीद के अनुसार प्रदर्शन नहीं कर सकी।

निषाद वोट, जिस पर सहनी की पकड़ मानी जाती थी, इस बार पूरी तरह एनडीए की ओर खिसक गया। यह नतीजा बताता है कि सिर्फ जातिगत राजनीति से चुनाव जीता नहीं जा सकता।

इंडिया ब्लॉक की सबसे बड़ी हार

इंडिया गठबंधन के लिए बिहार का यह चुनाव कमर तोड़ देने वाला रहा। सीटों का बंटवारा, मतदाताओं से जुड़ाव की कमी, नेतृत्व में अस्पष्टता और स्थानीय मुद्दों को सही तरीके से न उठा पाना इसकी हार के प्रमुख कारण रहे।

एनडीए की 202 सीटों के सामने विपक्ष सिर्फ 35 सीटों पर सिमट गया। यह उन राज्यों के लिए भी चेतावनी है जहां जल्द ही चुनाव होने वाले हैं।

बिहार ने किसके पक्ष में दिया जनादेश?

2025 का बिहार चुनाव जनता की स्पष्ट मंशा को दर्शाता है—स्थिरता, विकास और भरोसे पर आधारित नेतृत्व। नीतीश कुमार और एनडीए ने मिलकर नए इतिहास की शुरुआत की है, जबकि विपक्ष को आत्मविश्लेषण की सख्त जरूरत है।

इस चुनाव ने युवा बनाम अनुभव की बहस को फिलहाल विराम दे दिया है और यह बताकर दिया है कि बिहार की जनता सिर्फ वादों पर नहीं, बल्कि भरोसे और काम पर वोट देती है।

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