बिहार चुनाव 2025: बदलता राजनीतिक समीकरण, विकास के वादे और जनता की उम्मीदें

बिहार चुनाव 2025: बिहार, जो हमेशा से ही भारत की राजनीति में एक महत्वपूर्ण राज्य रहा है, 2025 में फिर एक नए राजनीतिक मोड़ पर खड़ा है। 6 और 11 नवंबर 2025 को राज्य में दो चरणों में विधानसभा चुनाव होंगे। चुनाव आयोग ने घोषणा करते हुए कहा कि मतगणना 14 नवंबर को होगी।

यह समय सिर्फ पार्टियों के लिए ही नहीं, बल्कि बिहार की जनता के लिए भी निर्णायक चरण है — क्योंकि अगले पांच साल के लिए राजनीतिक दिशा, विकास की रणनीति और सामाजिक व आर्थिक नीतियाँ तय होंगी।

बिहार चुनाव 2025
                     बिहार चुनाव 2025

समय-सारणी और चुनाव प्रक्रिया:

चुनाव आयोग ने प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से बांटा है:

  • पहले चरण (121 सीटों पर मतदान) : 6 नवंबर

  • दूसरे चरण (122 सीटों पर मतदान) : 11 नवंबर

  • नामांकन, जांच, नाम वापसी आदि के लिए निश्चित तिथियाँ निर्धारित की गई हैं।

  • मतगणना 14 नवंबर को की जाएगी।

चुनाव आयोग ने इस बार कई नई व्यवस्थाएँ लागू की हैं — जैसे कि हर बूथ पर अधिकतम मतदाताओं की संख्या सीमित करना, मोबाइल फोन जमा करने की सुविधा देना आदि।

मतदाता सूची संशोधन और विवाद:

चुनावों से पहले विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के माध्यम से बिहार की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर शुद्धिकरण किया गया। इस प्रक्रिया में करीब 65 लाख नाम हटाए गए। इस बात ने विपक्षी दलों के नापसंदगी जताने का मौका दिया कि यह सत्ताधारी दल को लाभ पहुंचाने हेतु हो रहा है।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने यह साफ कर दिया कि मतदान के बाद सूची में संशोधन करना उचित नहीं है और इससे चुनाव की वैधता पर प्रभाव पड़ सकता है। इस विवाद ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या सूची संशोधन पूरी निष्पक्षता से किया गया है या नहीं।

राजनीतिक गुट, गठबंधन और सीट बंटवारा:

बिहार के चुनाव में मुख्य मुकाबला एनडीए (राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन) और महागठबंधन / INDIA ब्लॉक के बीच है।

  • एनडीए ने इस चुनाव को “विकास, शुद्ध शासन और भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडा” के साथ प्रचारित किया है। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने जीत पर पूरा भरोसा जताया है।

  • महागठबंधन की रणनीति इस बार अधिक केंद्रित है — वामपंथी दलों को लगभग 35 सीटों की मांग है और तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करने की मांग तेज हुई है।

  • विपक्ष की रणनीति “गरीबी उन्मूलन” विवेकवादी वादा और “बिहार गौरव” की पहचान को उभारने की है, खासकर मतदाता सूची विवाद को लेकर।

  • साथ ही, AAP (आम आदमी पार्टी) ने घोषणा की है कि वह इस चुनाव में अकेले सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, किसी गठबंधन के बिना।

इस तरह के गठबंधन और सीट बंटवारे के समीकरण बिहार की राजनीति को और जटिल बना देते हैं — किस दल को कितनी सीटें चाहिए, किसे मुख्यमंत्री चेहरा बनाना है, ये सभी सवाल अभी अनसुलझे हैं।

चुनावी मुद्दे: विकास, पलायन और लाभ योजनाएँ:

इस चुनाव में कुछ विषय विशेष रूप से महत्व पा रहे हैं:

  1. पलायन
    बिहार का एक पुराना लेकिन गंभीर संकट है — युवा और कामगार बाहरी राज्यों को पलायन कर लेते हैं। इस मुद्दे को लेकर सरकार ने 62,000 करोड़ रुपये की योजनाएँ घोषित की हैं, ताकि युवाओं को स्थानीय रोजगार, प्रशिक्षण और अवसर मिलें। यह कदम चुनाव प्रचार की रणनीति भी बन चुका है।

  2. सरकारी योजनाओं का उद्घाटन
    मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चुनावी माहौल में विकास की छाप छोड़ने के लिए लगभग 11,921 करोड़ रुपये की नई परियोजनाएँ शिलान्यास एवं उद्घाटन की हैं। यह कदम जनता को यह दिखाने का प्रयास है कि सरकार ने सुस्त नहीं किया है।

  3. स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ती उम्मीदें
    चुनाव की घोषणा से ठीक पहले, सरकार ने जूनियर डॉक्टरों की मांग मान ली — पीजी / डिप्लोमा डॉक्टरों के सेवा बॉन्ड को तीन साल से घटाकर दो साल कर दिया गया। यह कदम स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने और चिकित्सकों की नाराजगी कम करने के लिए उठाया गया है।

  4. मतदाता जागरूकता और सुविधाएँ
    चुनाव आयोग ने यह घोषणा की है कि इस बार मतदान केंद्रों के पास मोबाइल जमा करने की सुविधा होगी, ताकि मतदाता अपने मोबाइल फोन बूथ में न ले जाएँ। यह नए चुनावी सुधारों में से एक है, जो मतदान व्यवहार को सरल बनाने का प्रयास करता है।

चुनौतियाँ और चिंताएँ:

  • सूची संशोधन विवाद यह दिखाता है कि चुनाव प्रक्रिया पर जनता का भरोसा कितना नाजुक है।

  • राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन और सीटों की होड़ सम्भावित झड़पों का कारण बन सकती है।

  • विकास और घोषणाएँ प्रचार के समय करीब की गई हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन और वास्तविक असर जनता तक पहुँचना चुनौतिपूर्ण होगा।

  • चुनाव में झूठी खबरें (फेक न्यूज) की रोकथाम भी एक गंभीर समस्या है, जिस पर आयोग ने कार्रवाई का संकल्प लिया है।

  • ग्रामीण इलाकों, दूरदराज के बूथों, नेटवर्क की समस्याओं आदि कारणों से मतदान में असमर्थता या बाधाएं हो सकती हैं, जिन्हें प्रशासन को पहले से तैयार करना होगा।

क्या बदलने की उम्मीद है?

बिहार चुनाव 2025 सिर्फ एक चुनाव नहीं है — यह एक संघर्ष है विकास के लिए, आज़ादी की राजनीति के दबाव से, और जनभावना और लोकतंत्र की परीक्षा के लिए।

अगर जनता सोच-समझकर मतदान करे, राजनीतिक दल अपने वादों का ईमानदारी से पालन करें, और प्रशासन निष्पक्ष स्वभाव से कार्य करे — तो बिहार एक नए उत्तर की ओर बढ़ सकता है।

यह चुनाव यह तय करेगा कि क्या “डबल इंजन सरकार” का वर्णन सच होता है, या जनता को बदलाव और नई उम्मीद चाहिए।

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