Aravalli News Explained: अरावली क्यों है चर्चा में? कोर्ट की 100 मीटर की परिभाषा पर उठा बवाल!

Aravalli News Explained: भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। सोशल मीडिया पर #SaveAravalli और #SaveAravallisSaveAQI जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। पर्यावरण कार्यकर्ता, वैज्ञानिक, आम नागरिक और राजनेता – सभी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि क्या अरावली को बचाने का समय अब निकलता जा रहा है।

इस चिंता की सबसे बड़ी वजह बना है 20 नवंबर 2025 को आया सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला, जिसे पर्यावरणविद अरावली के लिए “डेथ वारंट” तक कह रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर इस फैसले में ऐसा क्या है, जिसने पूरे देश का ध्यान अरावली की ओर खींच लिया?

अरावली: भारत की सबसे पुरानी ढाल | Aravalli News Explained

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अरावली पर्वत श्रृंखला करीब 2 अरब साल पुरानी मानी जाती है। पर्यावरणविद प्रणय लाल ने अपने 2019 के लेख “Aravallis: A Mountain Lost” में लिखा था कि अगर कोई अंतरिक्ष यात्री अरबों साल पहले धरती को देखता, तो भारत के उत्तरी हिस्से की पहचान सिर्फ अरावली से ही होती।

आज यही अरावली अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली यह पर्वत श्रृंखला सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं है, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत की जीवनरेखा है।

अरावली का पर्यावरणीय महत्व

अरावली कई मायनों में भारत के लिए बेहद जरूरी है। यह थार रेगिस्तान को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकती है और राजस्थान व गंगा के मैदानों को मरुस्थल बनने से बचाती है। चंबल, साबरमती और लूणी जैसी महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम भी यहीं से होता है।

यह पर्वत श्रृंखला भूजल रिचार्ज में बड़ी भूमिका निभाती है और दिल्ली-एनसीआर समेत आसपास के इलाकों के लिए एक प्राकृतिक एयर फिल्टर की तरह काम करती है। जैव विविधता के लिहाज से भी यह क्षेत्र बेहद समृद्ध है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और नया विवाद

20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली से जुड़े एक लंबे समय से चल रहे मामले में फैसला सुनाया। इस फैसले में अदालत ने अरावली की एक नई परिभाषा को स्वीकार किया।

इस नई परिभाषा के अनुसार, केवल वही पहाड़ या टीले “अरावली” माने जाएंगे, जो अपने आसपास के इलाके से कम से कम 100 मीटर ऊंचे हों। इसके अलावा, 500 मीटर के दायरे में मौजूद पहाड़ियों को एक “रेंज” माना जाएगा।

सरकार और अदालत का तर्क है कि इससे प्रशासनिक स्पष्टता आएगी और टिकाऊ विकास की योजना बनाना आसान होगा।

क्यों नाराज़ हैं पर्यावरणविद?

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह परिभाषा अरावली के लिए बेहद खतरनाक है। Forest Survey of India (FSI) की एक आंतरिक रिपोर्ट के मुताबिक, इस नियम के लागू होने से 90 प्रतिशत से ज्यादा अरावली क्षेत्र कानूनी सुरक्षा से बाहर हो जाएगा।

सिर्फ राजस्थान में ही 12,081 चिन्हित पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही इस 100 मीटर की शर्त पर खरी उतरती हैं। यानी बाकी पहाड़ अब खनन, रियल एस्टेट और अन्य गतिविधियों के लिए खुल सकते हैं।

अवैध खनन का डर और पुराने जख्म

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अरावली पहले से ही अवैध खनन की मार झेल रही है। GIS मैप्स में पिछले 30 वर्षों में 3,000 से ज्यादा खनन से प्रभावित स्थान चिन्हित किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट खुद 2018 में कह चुका है कि 31 पहाड़ पूरी तरह गायब हो चुके हैं।

पर्यावरणविदों का डर है कि नया फैसला इन जख्मों को और गहरा कर देगा और अवैध गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।

नीची पहाड़ियों का क्या होगा?

अरावली की खासियत सिर्फ उसकी ऊंची चोटियां नहीं हैं। इसकी नीची, झाड़ियों से ढकी पहाड़ियां भी उतनी ही जरूरी हैं। यही इलाके जैव विविधता को बचाते हैं, भूजल रिचार्ज करते हैं और धूल भरी आंधियों को रोकते हैं।

अगर इन पर खनन शुरू हुआ तो गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में पानी की स्थिति और खराब हो सकती है। वन्यजीवों के आवास खत्म होंगे और मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ेगा।

केंद्र के हलफनामे पर भी सवाल

पर्यावरण विशेषज्ञों ने केंद्र सरकार के हलफनामे पर भी सवाल उठाए हैं। इसमें अरावली के 39 जिलों की सूची दी गई, लेकिन चित्तौड़गढ़ और सवाई माधोपुर जैसे अहम इलाके इसमें शामिल नहीं थे।

चित्तौड़गढ़ का किला खुद एक अरावली पहाड़ी पर स्थित है, जबकि सवाई माधोपुर रणथंभौर टाइगर रिजर्व का घर है। ऐसे में इन इलाकों का बाहर रहना कई सवाल खड़े करता है।

सोशल मीडिया और सड़कों पर विरोध

इस फैसले के बाद जयपुर जैसे शहरों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। सोशल मीडिया पर पर्यावरण से जुड़े वीडियो, पोस्ट और प्रोफाइल पिक्चर बदलने का सिलसिला चल पड़ा।

पूर्व राजस्थान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत समेत कई नेताओं और हस्तियों ने #SaveAravalli अभियान का समर्थन किया। दिल्ली की खराब हवा से जोड़ते हुए कई लोगों ने चेतावनी दी कि अगर अरावली खत्म हुई, तो प्रदूषण “हजार गुना” बढ़ सकता है।

ग्रामीण इलाकों में गुस्सा और डर

अरावली से जुड़े ग्रामीण इलाकों में लोग पहले ही खनन का दंश झेल रहे हैं। हरियाणा के भिवानी और चरखी दादरी में कई पहाड़ खत्म हो चुके हैं। महेंद्रगढ़ जैसे जिलों में पानी 1,500 से 2,000 फीट नीचे चला गया है।

आज भी अवैध खनन जारी है। विस्फोटों से उड़ते पत्थर बच्चों तक को घायल कर रहे हैं। सिलिकोसिस, त्वचा रोग और फसलों की पैदावार में गिरावट आम हो चुकी है।

नेलम अहलूवालिया की चेतावनी

पिछले 12 सालों से ‘People for Aravallis’ के जरिए संघर्ष कर रहीं नेलम अहलूवालिया इस आंदोलन की सबसे मजबूत आवाजों में से एक हैं। उनका कहना है कि अरावली थार रेगिस्तान और उत्तर-पश्चिम भारत के बीच एक दीवार है।

उनके शब्दों में, अगर अरावली हट गई तो यह पूरा इलाका रेगिस्तान बन सकता है। इसका असर सीधे खाद्य सुरक्षा और जल सुरक्षा पर पड़ेगा और करोड़ों लोगों की जिंदगी प्रभावित होगी।

राजनीतिक हलचल और आरोप-प्रत्यारोप

इस फैसले के बाद राजनीतिक माहौल भी गर्म हो गया है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर खनन हितों को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया है।

राजस्थान के विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने इसे क्षेत्रीय पर्यावरण संतुलन पर बड़ा हमला बताया और कहा कि वे अरावली को बचाने की लड़ाई जारी रखेंगे।

फिलहाल इस फैसले को वापस लेने की कोई आधिकारिक प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है, लेकिन दबाव लगातार बढ़ रहा है। पर्यावरणविद मांग कर रहे हैं कि इस नई परिभाषा को हटाया जाए और पूरे अरावली क्षेत्र को “क्रिटिकल इकोलॉजिकल ज़ोन” घोषित किया जाए।

असली चिंता क्या है?

यह बहस सिर्फ कानूनी शब्दों की नहीं है। यह सवाल भारत के भविष्य से जुड़ा है। अरावली का कमजोर होना मतलब रेगिस्तान का बढ़ना, पानी का सूखना, हवा का जहरीला होना और जैव विविधता का खत्म होना।

जैसा कि नेलम अहलूवालिया कहती हैं, अरावली को 100 मीटर की टेप से नहीं मापा जा सकता। यह सिर्फ पहाड़ नहीं, बल्कि हमारी जिंदगी का सहारा है।

अरावली आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां एक फैसला उसके भविष्य को हमेशा के लिए बदल सकता है। यह मुद्दा सिर्फ पर्यावरण प्रेमियों का नहीं, बल्कि हर उस इंसान का है जो साफ हवा, पानी और सुरक्षित भविष्य चाहता है।

अब देखना यह है कि नीति निर्माता और न्याय व्यवस्था इस चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेते हैं, या अरावली सच में इतिहास की किताबों तक सिमट कर रह जाएगी।

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