Age of Consent: भारत में किशोरावस्था और रिश्तों पर बहस लंबे समय से जारी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि प्यार कोई अपराध नहीं है और इसे अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि जहां बच्चे आपसी सहमति से रोमांटिक रिश्ते में हैं, वहां उन पर अपराध का मुकदमा चलाना उनके जीवन को बर्बाद कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब पॉक्सो (POCSO) एक्ट का इस्तेमाल कई बार नाबालिगों के खिलाफ सहमति वाले रिश्तों में भी हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी | Age of Consent
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान कहा कि समाज को यह समझना होगा कि किशोरावस्था में रिश्ते बनना स्वाभाविक है। लड़के-लड़कियां साथ पढ़ते हैं, साथ समय बिताते हैं और उनमें भावनाएं पनपना कोई असामान्य बात नहीं है।
कोर्ट ने कहा— “क्या प्यार को अपराध कहा जा सकता है? यदि दो किशोर आपसी सहमति से रिश्ते में हैं, तो उन पर मुकदमा चलाना उनके भविष्य पर गहरी चोट करेगा।” अदालत ने चेताया कि POCSO कानून का गलत इस्तेमाल युवाओं के जीवन को बर्बाद कर सकता है और इसे रोकने के लिए गंभीर सोच की जरूरत है।
POCSO एक्ट और उसका उद्देश्य
पॉक्सो एक्ट (Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012) को बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए लाया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि नाबालिग किसी भी तरह के यौन अपराध का शिकार न हों।
इस कानून के तहत 18 साल से कम उम्र के किसी भी बच्चे के साथ यौन संबंध बनाना अपराध माना जाता है, चाहे वह आपसी सहमति से ही क्यों न हो। लेकिन समस्या यह है कि कई बार इस कानून का इस्तेमाल ऐसे मामलों में भी किया जा रहा है जहां रिश्ता पूरी तरह आपसी सहमति से बना है।
कोर्ट ने क्यों जताई चिंता?
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि POCSO कानून बेहद अहम है, लेकिन इसमें शोषण और आपसी सहमति से बने रिश्तों के बीच फर्क करना जरूरी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस को हर मामले में जांच करनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या वास्तव में यह शोषण है या फिर यह आपसी सहमति का रिश्ता है।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा— “अगर हम हर सहमति वाले रिश्ते को अपराध मान लेंगे, तो यह न सिर्फ बच्चों की आजादी का हनन होगा, बल्कि यह समाज में ऑनर किलिंग जैसी घटनाओं को भी बढ़ावा देगा।”
माता-पिता करते हैं कानून का गलत इस्तेमाल
कोर्ट ने यह भी कहा कि अक्सर पॉक्सो का इस्तेमाल माता-पिता अपनी ‘इज्जत’ बचाने के लिए करते हैं। जब कोई लड़की अपनी मर्जी से किसी रिश्ते या शादी का फैसला करती है, तो परिवार सामाजिक दबाव में आकर लड़के पर POCSO के तहत मामला दर्ज कर देता है।
ऐसे मामलों में जहां लड़की 17 साल 6 महीने की हो और लड़का 19 साल का हो, दोनों सहमति से रिश्ते में हों, तब भी लड़के को जेल जाना पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह बच्चों के जीवन पर भारी पड़ता है और उनकी शिक्षा, करियर और मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ और विवाद
इस मामले में एक और दिलचस्प पहलू मुस्लिम पर्सनल लॉ का है। इस्लामी कानून के मुताबिक, मुस्लिम लड़कियां यौवन (Puberty) प्राप्त करने के बाद शादी कर सकती हैं। लेकिन भारतीय कानून के तहत शादी की न्यूनतम उम्र लड़कियों के लिए 18 साल और लड़कों के लिए 21 साल है।
हाल ही में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा था कि मुस्लिम लड़कियां यौवन प्राप्त करने के बाद शादी कर सकती हैं। इस फैसले को NCPCR और नेशनल कमीशन फॉर वीमेन (NCW) ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि इन आयोगों का इसमें कोई locus standi नहीं है।
कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा— “यह अजीब है कि NCPCR, जिसका काम बच्चों की रक्षा करना है, उसने ही बच्चों की सुरक्षा करने वाले आदेश को चुनौती दी। इन जोड़ों को अकेला छोड़ दीजिए।”
याचिकाकर्ता की दलीलें
सुनवाई में एनजीओ बचपन बचाओ आंदोलन (BBA) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका ने दलील दी कि अगर नाबालिगों के बीच रिश्ते होते हैं, तो उनमें उम्र का गैप तीन साल से ज्यादा नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि तमिलनाडु के डीजीपी का वह आदेश, जिसमें पुलिस को सहमति वाले रिश्तों में तुरंत गिरफ्तारी न करने का निर्देश दिया गया था, उसका दुरुपयोग हो सकता है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि हर मामला अलग है और उसे केस-टू-केस आधार पर ही देखा जाएगा। कोर्ट ने पूछा— “आप सभी पर मुकदमा क्यों चलाना चाहते हैं? हर मामला अलग है। पुलिस को जांच करनी होगी और दिमाग लगाना होगा।”
किशोरावस्था और समाज की वास्तविकता
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किशोरावस्था में बच्चों के बीच भावनाएं विकसित होना एक सामाजिक वास्तविकता है। आज के दौर में जब लड़के-लड़कियां साथ पढ़ते हैं, साथ समय बिताते हैं, तो रिश्ते बनना स्वाभाविक है। ऐसे मामलों को अपराध मानना समाज और बच्चों दोनों के लिए हानिकारक होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब ऐसे रिश्ते सच्चे हों और दोनों शादी करना चाहते हों, तो उन्हें रोका क्यों जाए? “अगर हम हर सहमति वाले रिश्ते को अपराध मानेंगे, तो हम बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करेंगे।”
नाबालिगों के रिश्तों पर वैश्विक नजरिया
अगर हम अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य देखें, तो कई देशों में ‘एज ऑफ कंसेंट’ (Age of Consent) अलग-अलग है। अमेरिका में यह राज्यवार 16 से 18 साल के बीच तय है। यूरोप के कुछ देशों जैसे स्पेन और जर्मनी में सहमति की उम्र 14 से 16 साल के बीच है।
भारत में इसे 18 साल रखा गया है, लेकिन यह बहस लगातार चल रही है कि क्या यह उम्र बच्चों की सामाजिक और मानसिक परिपक्वता को ध्यान में रखकर तय की गई है या नहीं।
आगे का रास्ता
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से साफ है कि आने वाले समय में POCSO एक्ट में कुछ संशोधन या नए दिशा-निर्देश आ सकते हैं। कोर्ट ने सरकार और समाज से अपील की है कि बच्चों के हितों को ध्यान में रखते हुए एक संतुलन बनाया जाए।
प्यार को अपराध की श्रेणी में डालना न तो व्यावहारिक है और न ही सामाजिक दृष्टि से सही। जहां सचमुच अपराध है, वहां सख्ती जरूरी है। लेकिन जहां रिश्ते आपसी सहमति से बने हों, वहां कानून का गलत इस्तेमाल रोकना भी उतना ही जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला और टिप्पणी भारतीय समाज के लिए एक अहम संदेश है। किशोरावस्था में रिश्ते बनना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और इसे अपराध मानना बच्चों के भविष्य के साथ अन्याय है। POCSO एक्ट का मूल उद्देश्य बच्चों को शोषण से बचाना है, लेकिन इसे सहमति वाले रिश्तों पर थोपना न्याय और सामाजिक समानता दोनों के खिलाफ है।
भारत को अब इस दिशा में गंभीरता से सोचना होगा कि कैसे बच्चों की सुरक्षा और उनके अधिकारों के बीच संतुलन बनाया जाए। कानून का मकसद बच्चों का जीवन बचाना होना चाहिए, न कि उनका भविष्य छीन लेना।
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