Gandhi Ji Favourite Food: महात्मा गांधी केवल भारत के स्वतंत्रता सेनानी या राष्ट्रपिता ही नहीं थे, बल्कि वे अपने सादे जीवन और अनुशासित खान‑पान के लिए भी जाने जाते थे। उनका भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं था, बल्कि वह उनके विचार, दर्शन और जीवन‑शैली का प्रतिबिंब था। गांधी जी का मानना था कि “जैसा भोजन, वैसा मन” और इसी सोच के अनुसार उन्होंने अपने जीवन में अत्यंत सरल, सात्विक और संयमित आहार को अपनाया।
Gandhi Ji Favourite Food:

सादा और सात्विक भोजन का सिद्धांत:
महात्मा गांधी का प्रिय भोजन किसी स्वादिष्ट या भारी व्यंजन पर आधारित नहीं था। वे सादा, कम मसाले वाला और शुद्ध शाकाहारी भोजन पसंद करते थे। उनका मानना था कि भोजन जितना प्राकृतिक और सरल होगा, शरीर और मन उतने ही स्वस्थ रहेंगे। वे अक्सर कहते थे कि भोजन का उद्देश्य स्वाद नहीं, बल्कि शरीर को ऊर्जा देना होना चाहिए।
गांधी जी का भोजन जीवन भर प्रयोग और आत्मअनुशासन का विषय रहा। उन्होंने अलग‑अलग समय पर अपने खान‑पान में बदलाव किए और जो उन्हें स्वास्थ्य के लिए उचित लगा, उसी को अपनाया।
रोटी और मोटे अनाज:
महात्मा गांधी को सादी रोटी बहुत प्रिय थी, विशेषकर बाजरे, ज्वार और गेहूं की रोटी। वे मोटे अनाज को स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानते थे। उनका मानना था कि मोटे अनाज न केवल शरीर को ताकत देते हैं, बल्कि पाचन के लिए भी अच्छे होते हैं।
वे सफेद आटे की बजाय साबुत अनाज से बनी रोटी को प्राथमिकता देते थे। अक्सर वे बिना घी या तेल की सूखी रोटी खाते थे, ताकि शरीर अनावश्यक वसा से बचे।
उबली सब्जियाँ और मौसमी आहार:
गांधी जी को उबली हुई या हल्की पकी सब्जियाँ पसंद थीं। वे मौसमी सब्जियों को अधिक महत्व देते थे और मानते थे कि प्रकृति जिस मौसम में जो देती है, वही उस समय शरीर के लिए सबसे अच्छा होता है।
वे आलू, लौकी, तोरी, पालक, गाजर जैसी साधारण सब्जियाँ खाते थे। मसाले और तले हुए भोजन से वे दूर रहते थे। उनका मानना था कि अधिक मसाले मन को उत्तेजित करते हैं और संयम को कमजोर करते हैं।
दूध और बकरी का दूध:
शुरुआत में गांधी जी दूध से पूरी तरह दूर हो गए थे, क्योंकि वे इसे हिंसा से जुड़ा मानते थे। लेकिन बाद में स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने बकरी का दूध लेना शुरू किया। बकरी का दूध उनके लिए औषधि की तरह था।
वे गाय के दूध की तुलना में बकरी के दूध को हल्का और पाचन के लिए बेहतर मानते थे। यह उनके दैनिक आहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। महात्मा गांधी की बकरी का नाम “सुरभि” था।
फल और कच्चा भोजन:
महात्मा गांधी को फलाहार बहुत पसंद था। वे अक्सर फल, मूंगफली, खजूर और किशमिश जैसे सूखे मेवे सीमित मात्रा में लेते थे। कई बार उन्होंने लंबे समय तक कच्चे भोजन और फलाहार पर भी जीवन बिताया।
उनका मानना था कि कच्चा भोजन शरीर को स्वाभाविक ऊर्जा देता है और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाता है।
नमक, मसाले और स्वाद से दूरी:
गांधी जी स्वाद के लिए नहीं खाते थे। वे नमक और मसालों का बहुत सीमित उपयोग करते थे। कई बार उन्होंने नमक त्याग भी किया, यह देखने के लिए कि शरीर पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।
उनका कहना था कि स्वाद की लालसा इंसान को अनुशासन से भटका देती है। इसलिए वे भोजन को साधना की तरह लेते थे।
उपवास: भोजन से अधिक आत्मशुद्धि
महात्मा गांधी के जीवन में उपवास का विशेष महत्व था। वे उपवास को केवल राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आत्मसंयम का साधन मानते थे।
उपवास के दौरान वे केवल पानी, नींबू पानी या कभी‑कभी फलों का रस लेते थे। उनका मानना था कि उपवास से शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं।
विदेशी भोजन से दूरी:
गांधी जी विदेशी और विलासितापूर्ण भोजन के सख्त खिलाफ थे। वे मानते थे कि देशी भोजन न केवल सस्ता होता है, बल्कि स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता के लिए भी आवश्यक है।
वे अक्सर कहते थे कि भारत की गरीबी को समझने के लिए नेताओं को वही खाना चाहिए, जो आम जनता खाती है।
महात्मा गांधी ने अपने शुरुआती जीवन में प्रयोग के तौर पर मांस और धूम्रपान किया था, लेकिन यह बहुत कम समय के लिए था। किशोरावस्था में दोस्तों के प्रभाव में उन्होंने मांस खाने की कोशिश की, यह सोचकर कि इससे ताकत बढ़ेगी। इसी तरह उन्होंने चोरी से धूम्रपान भी किया, जिसे बाद में उन्होंने अपनी भूल माना। अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में गांधी जी ने इन अनुभवों को ईमानदारी से स्वीकार किया। बाद में उन्होंने इन्हें पूरी तरह त्याग दिया और जीवन भर संयम, शाकाहार और आत्मनियंत्रण के मार्ग पर चले।
भोजन और नैतिकता का संबंध:
महात्मा गांधी के लिए भोजन केवल शारीरिक आवश्यकता नहीं था, बल्कि नैतिकता से जुड़ा विषय था। वे मानते थे कि हिंसा‑रहित, संयमित और सादा भोजन इंसान को बेहतर बनाता है।
उनका जीवन यह संदेश देता है कि कम में संतोष और सादगी ही सच्चा सुख है।
महात्मा गांधी का प्रिय भोजन कोई विशेष व्यंजन नहीं, बल्कि सादगी, सात्विकता और अनुशासन का प्रतीक था। रोटी, उबली सब्जियाँ, फल और बकरी का दूध- यही उनका भोजन था। उन्होंने अपने आहार के माध्यम से यह सिखाया कि स्वस्थ शरीर और शांत मन के लिए सादा जीवन ही सबसे बड़ा मंत्र है।
आज के समय में, जब भोजन विलासिता बन गया है, गांधी जी का खान‑पान हमें संयम, स्वास्थ्य और संतुलन की याद दिलाता है।
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