Putin India Visit: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जब 2025 में दोबारा भारत पहुंचे, तो इतिहास एक बार फिर 25 साल पीछे चला गया। साल 2000 की उनकी पहली भारत यात्रा सिर्फ औपचारिकता नहीं थी। यह एक ऐसा पड़ाव था जिसने भारत-रूस संबंधों में नई जान फूंकी और भारत को वैश्विक मंच पर मजबूती से खड़ा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस यात्रा में ‘वाह ताज’ की तस्वीरें थीं, संसद में नमस्ते था, और सबसे अहम — भारत के परमाणु कार्यक्रम के लिए एक मजबूत संकेत था, जो उस समय वैश्विक आलोचना का सामना कर रहा था।
साल 2000 की इस यात्रा को आज भी भारत-रूस संबंधों की रीढ़ माना जाता है। आइए समझते हैं कि पहली यात्रा में ऐसा क्या हुआ था जिसने दोनों देशों की रणनीतिक दोस्ती को एक नई दिशा दी।
भारत-रूस दोस्ती को नई गर्माहट मिली | Putin India Visit

साल 2000 में दोनों देश मुश्किल दौर से गुजर रहे थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों से जूझ रहा था। दूसरी तरफ भारत पोखरण-II परीक्षणों के बाद वैश्विक दबाव और परमाणु प्रतिबंधों से बैकफुट पर था। ऐसे माहौल में 47 वर्षीय पुतिन की भारत यात्रा किसी राहत की हवा की तरह आई।
दिल्ली सर्द थी, लेकिन दोनों देशों के रिश्तों में फिर से गर्माहट पैदा होने वाली थी। पुतिन और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की मुलाकात ने दशकों पुराने रिश्तों को फिर से रणनीतिक ऊंचाई दी। संसद के सेंट्रल हॉल में पुतिन का नमस्ते, भारत की संस्कृति की तारीफ और कश्मीर पर संतुलित बयान ने उनका भारतीय दिलों में स्थान मजबूत कर दिया।
राजघाट से राष्ट्रपति भवन तक, और फिर ‘वाह ताज’
उनकी यात्रा की शुरुआत राजघाट से हुई, जहां पुतिन और उनकी पत्नी ल्यूडमिला ने महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी। यह एक प्रतीकात्मक संकेत था कि रूस भारत की ऐतिहासिक विरासत और वैचारिक परंपराओं का सम्मान करता है।
राष्ट्रपति केआर नारायणन ने पुतिन का स्वागत करते हुए उन्हें भारत का सच्चा मित्र बताया। यह वही समय था जब भारतीय संसद ने कुछ महीने पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का स्वागत किया था। लेकिन पुतिन के आगमन ने भारत को एक पुराने साथी की याद दिला दी।
यात्रा का सबसे चर्चित क्षण था ताजमहल की यात्रा। 50 मिनट की इस यात्रा के बाद पुतिन का छोटा सा बयान — “यह खूबसूरत है। यहां आकर अच्छा लगा।” — अगले दिन दुनिया भर के अखबारों की सुर्खियां बन गया।
इस तस्वीर ने भारत और रूस के रिश्तों की नरमी, अपनापन और सांस्कृतिक संबंधों को एक नया चेहरा दिया।
President Putin’s visit will add vigour to India-Russia ties….@KremlinRussia_E pic.twitter.com/NPUSZKAGgA
— Narendra Modi (@narendramodi) December 5, 2025
परमाणु समर्थन का संकेत जिसने दुनिया को चौंका दिया
साल 2000 की यात्रा का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक क्षण था पुतिन का मुंबई में स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) पहुंचना। वह वही जगह थी जहां भारत के परमाणु कार्यक्रम का बड़ा हिस्सा विकसित हुआ था। पोखरण-II में इस्तेमाल हुआ प्लूटोनियम इसी ध्रुव रिएक्टर से आया था।
पुतिन जिस वक्त ध्रुव रिएक्टर के सामने तस्वीर खिंचवा रहे थे, दुनिया को यह साफ संदेश चला गया —
“रूस भारत के साथ है, चाहे दुनिया कुछ भी कहे।”
उस समय भारत परमाणु परीक्षणों के कारण अंतरराष्ट्रीय दबाव से जूझ रहा था। पश्चिमी देशों ने कई जगहें बंद कर दी थीं, आयात-निर्यात कठिन हो गया था और वैश्विक मंच पर भारत को ‘परमाणु अलग-थलग’ देश की तरह देखा जा रहा था।
लेकिन पुतिन का BARC दौरा भारत को न सिर्फ नैतिक समर्थन था, बल्कि यह संकेत भी था कि रूस भारत के साथ खड़ा है और भारत के परमाणु कार्यक्रम को मान्यता देता है। पूर्व BARC प्रमुख अनिल काकोडकर ने भी बाद में बताया कि यह तस्वीर भारत की परमाणु प्रतिष्ठा के लिए बहुत बड़ा संदेश थी।
रक्षा सौदे जिन्होंने भारत की सैन्य ताकत बदल डाली
इस यात्रा ने सिर्फ दोस्ती की बातें नहीं कीं, बल्कि भारत की रक्षा क्षमता को मजबूत करने वाले ऐतिहासिक समझौतों का रास्ता भी खोला।
यही वह यात्रा थी जिसमें:
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भारत ने रूस से 310 T-90 टैंकों का सौदा तय किया
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सुखोई-30 लड़ाकू विमानों के लाइसेंस्ड उत्पादन पर सहमति बनी
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रूस ने एयरक्राफ्ट कैरियर एडमिरल गोर्शकोव की पेशकश की, जिसे बाद में INS Vikramaditya नाम दिया गया
इन सौदों ने भारतीय सेना को नई तकनीक और मजबूत बैकअप दिया।
यह वही समय था जब भारत पोखरण-II के कारण वैश्विक हथियार बाज़ार से भी दबाव झेल रहा था, लेकिन रूस ने हर मोड़ पर भारत के साथ साझेदारी निभाई।
व्यापार और रणनीतिक साझेदारी को मिला नया रोडमैप
साल 1991 में USSR के टूटने के बाद भारत-रूस व्यापार में भारी गिरावट आई थी। लेकिन पुतिन की यात्रा ने दोनों देशों को एक बार फिर बैठकर लंबे समय की रणनीति बनाने का मौका दिया। यह यात्रा औपचारिक रूप से भारत-रूस “रणनीतिक साझेदारी” के जन्म का क्षण थी।
इस साझेदारी ने आने वाले 20 वर्षों तक दोनों देशों के बीच रक्षा, विज्ञान, अंतरिक्ष, ऊर्जा और व्यापार के कई क्षेत्रों में सहयोग को नई दिशा दी।
2025 में पुतिन की वापसी और 2000 की यात्रा का महत्व
साल 2025 की उनकी भारत यात्रा शायद यह दिखाने का मौका है कि 25 साल पहले शुरू हुई रणनीतिक साझेदारी कितनी मजबूत और स्थिर है। यह उनकी लगभग 10वीं भारत यात्रा मानी जा रही है। राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री, पुतिन हमेशा भारत के साथ संबंधों को प्राथमिकता देते रहे हैं।
आज जब दुनिया भू-राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रही है, खासकर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ तनाव के कारण, भारत ने भी अपनी बहुपक्षीय विदेश नीति को मजबूत किया है। इस समय रूस वही “स्वाभाविक मित्र” बनकर खड़ा है, जैसा येल्तसिन ने 1990 के दशक में कहा था।
पहली यात्रा क्यों बनी ‘ऐतिहासिक’?
साल 2000 की पुतिन यात्रा इन कारणों से याद रखी जाएगी:
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भारत के परमाणु कार्यक्रम का खुलकर समर्थन
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ताजमहल से लेकर संसद तक सॉफ्ट-पावर जुड़ाव
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बड़े रक्षा सौदों का रास्ता
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नए व्यापार और रणनीतिक ढांचे की शुरुआत
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दोनों देशों के संघर्ष के समय एक-दूसरे का साथ
इस यात्रा ने भारत और रूस के रिश्तों को नए युग में प्रवेश कराया। यह एक प्रतीकात्मक लेकिन बेहद शक्तिशाली संदेश था कि चाहे दुनिया बदले, भारत-रूस दोस्ती कायम रहेगी।
पुतिन की पहली यात्रा सिर्फ राजनीतिक नहीं, भावनात्मक भी थी
साल 2000 की यह यात्रा भारत-रूस संबंधों का वह मोड़ थी जिसने आने वाले दशकों के सहयोग की नींव रखी। ताजमहल के सामने पुतिन की मुस्कान से लेकर ध्रुव रिएक्टर के सामने खिंची तस्वीर तक — हर पल ने भारत और रूस को और करीब लाया।
आज 2025 में जब पुतिन फिर भारत आए, तो यह सिर्फ एक राजनयिक यात्रा नहीं, बल्कि दो देशों की अटूट दोस्ती का 25 साल पुराना अध्याय फिर से खुलने जैसा है। भारत-रूस संबंधों का यह सफर न सिर्फ रणनीति पर आधारित है, बल्कि विश्वास, इतिहास और साझा हितों की नींव पर टिका है।
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