Varanasi Welcomes Putin- राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत आगमन से पहले उमड़ा उत्साह

Varanasi Welcomes Putin: उत्तर प्रदेश की धार्मिक और सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। कारण है- रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत दौरा। उनके स्वागत से पहले काशी की गलियों में जिस तरह का उत्साह दिखाई दिया, उसने न केवल स्थानीय लोगों को रोमांचित किया बल्कि यह भी साबित किया कि काशी की आत्मा सदैव अतिथि सत्कार और आध्यात्मिकता से भरी रहती है।

आध्यात्मिक धुनों के बीच स्वागत की तैयारी:

वाराणसी में गंगा आरती एक परंपरा ही नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव है। जब भी कोई विशेष अवसर आता है, यह आरती और भी भव्य रूप धारण कर लेती है। पुतिन के स्वागत से पहले भी वही दृश्य देखने को मिला। दशाश्वमेध घाट पर सैकड़ों लोगों ने दीये जलाए, शंखनाद किए, और भक्ति की धुनों में खोकर एक अद्भुत माहौल बनाया।

हवा में गूंजते “हर हर महादेव” के स्वर ने मानो पूरा वातावरण पवित्र कर दिया। लोगों की इच्छा थी कि काशी की इस परंपरा और सदियों पुरानी संस्कृति की खुशबू रूस के राष्ट्रपति तक पहुँचे और वे भारत की इस आध्यात्मिक विरासत का अनुभव कर सकें।

Varanasi Welcomes Putin

स्वागत मार्च का अनूठा दृश्य:

आरती के बाद स्थानीय लोगों और कई सांस्कृतिक समूहों ने मिलकर स्वागत मार्च निकाला। यह कोई साधारण जुलूस नहीं था; बल्कि इसमें भारत की विविधता और परंपराओं का सुंदर रूप झलक रहा था।

  • ढोल-नगाड़ों की थाप

  • रंग-बिरंगे परिधान

  • लोक कलाकारों के नृत्य

  • हाथों में ‘इंडिया-रूस मित्रता’ के संदेश लिखी तख्तियाँ

यह सब मिलकर ऐसा प्रतीत करा रहे थे जैसे पूरा शहर एक उत्सव में डूबा हो। युवा, बुज़ुर्ग, महिलाएं, बच्चे—हर कोई अपनी तरह से इस विशेष मौके का हिस्सा बन रहा था।

भारत-रूस संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:

भारतीय जनता का यह उत्साह यूँ ही नहीं है। भारत और रूस का रिश्ता दशकों पुराना और मजबूत रहा है। चाहे रक्षा क्षेत्र हो, विज्ञान, ऊर्जा या अंतरिक्ष- दोनों देशों ने हमेशा एक-दूसरे का साथ दिया है।

लोकल लोगों का मानना है कि ऐसे उच्चस्तरीय दौरे से न केवल राजनीतिक और आर्थिक संबंध मजबूत होते हैं, बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी बढ़ता है। काशी जैसे शहरों में विदेशी मेहमानों का स्वागत करना भारत की “अतिथि देवो भव” की परंपरा का जीवंत उदाहरण है।

स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया:

काशी के लोगों से बातचीत करने पर एक बात स्पष्ट तौर पर सामने आती है- वे अपने शहर पर गर्व करते हैं और चाहते हैं कि विश्व का हर नेता, हर अतिथि, इस पवित्र नगरी के सौंदर्य और आध्यात्मिक शक्ति का अनुभव करे।

एक स्थानीय पंडित जी ने कहा-
“काशी केवल एक शहर नहीं, आत्मा की शांति का स्थान है। यदि दुनिया के बड़े नेता यहां आएँगे, तो इसे वैश्विक पहचान और भी मिलेगी।”

वहीं घाट पर मौजूद युवाओं का कहना था कि ऐसी घटनाएँ उन्हें अपनी संस्कृति और इतिहास से जोड़ती हैं।

पर्यटकों के लिए खास आकर्षण:

पुतिन की यात्रा की चर्चा ने भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी वाराणसी को नया ध्यान दिलाया है। कई अंतरराष्ट्रीय पर्यटक भी इस मौके पर घाटों पर मौजूद दिखे। उन्हें यहाँ की ऊर्जा और सजावट ने मंत्रमुग्ध कर दिया।

स्थानीय दुकानदारों ने भी इस आयोजन के कारण बढ़ी गतिविधियों का स्वागत किया। वे बताते हैं कि जब भी कोई बड़ा कार्यक्रम होता है, घरेलू और विदेशी पर्यटक अधिक संख्या में आते हैं, जिससे व्यापार को भी सकारात्मक बढ़ावा मिलता है।

काशी की संस्कृति का वैश्विक संदेश:

वाराणसी का आकर्षण उसकी आध्यात्मिकता, संगीत, शिल्प और हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता में छिपा है। काशी का हर भाव, हर रंग, हर परंपरा विश्व को यह संदेश देती है कि विविधता में एकता ही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है।

रूस के राष्ट्रपति के आने से पहले दिखाई दिया यह उत्साह इस बात का प्रमाण है कि काशी के लोग दुनिया के किसी भी कोने से आने वाले अतिथि का सम्मान करने के लिए सदैव तैयार रहते हैं।

आगामी उम्मीदें और संभावनाएँ:

यह उम्मीद की जा रही है कि यह दौरा भारत-रूस संबंधों में नई ऊर्जा भर सकता है। दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा, शिक्षा, और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में नए अवसर खुल सकते हैं।

काशी के लोग भी आशावान हैं कि यदि ऐसे दौरे बढ़ते हैं, तो शहर की वैश्विक पहचान और भी मजबूत होगी और पर्यटन उद्योग को नया आयाम मिलेगा।

काशी की रौनक और उम्मीदों का संगम:

पुतिन के स्वागत से पहले वाराणसी की सड़कों पर जो रोशनी, भक्ति और उत्साह देखने को मिला, वह इस शहर की आत्मा को दर्शाता है। काशी केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर का धड़कता हुआ हृदय है।

इस स्वागत आयोजन ने यह साबित कर दिया कि काशी विश्व के लिए केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक अनोखा अनुभव है। और जब भी कोई मेहमान यहां आता है, काशी उसे अपना बनाकर ही छोड़ती है।

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