Diwali Crackers And Animals: भारत में दीपावली, नववर्ष, शादियाँ और अन्य पर्वों के दौरान पटाखों का इस्तेमाल एक आम परंपरा बन चुकी है। रंग-बिरंगी रोशनी, धमाकों की आवाज़ें और धुएँ का माहौल लोगों को उत्सव का एहसास कराता है। लेकिन इन खुशियों के बीच एक ऐसी सच्चाई छिपी है जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं – हमारे आस-पास के निर्दोष जानवरों का डर, दर्द और परेशानी।
जहाँ इंसानों के लिए पटाखे मस्ती का प्रतीक हैं, वहीं जानवरों के लिए यह आतंक का कारण बन जाते हैं।

जानवरों पर पटाखों का सीधा प्रभाव:
पटाखों की तेज आवाज़ और चमक जानवरों पर शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से असर डालती है।
यह असर अलग-अलग प्रजातियों पर अलग रूप में दिखाई देता है:
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कुत्ते और बिल्लियाँ:
इनकी सुनने की क्षमता इंसानों से कई गुना अधिक होती है। तेज आवाज़ के कारण ये घबराहट, बेचैनी, दिल की धड़कन बढ़ना और कंपकंपी जैसी स्थितियों से गुजरते हैं। कई बार डर के कारण ये घर से भाग जाते हैं और दुर्घटनाओं का शिकार बन जाते हैं। -
पक्षी:
पटाखों की आवाज़ और धुआँ पक्षियों के लिए जानलेवा साबित होता है। तेज आवाज़ से पक्षी दिशा भूल जाते हैं, पेड़ों से गिर जाते हैं या दिल का दौरा पड़ने से मर जाते हैं। रात में उड़ान भरते समय पटाखों की चमक उनकी दृष्टि को भ्रमित कर देती है। -
गाय, भैंस और अन्य पालतू पशु:
गाँवों या शहरों में रखे गए पशु पटाखों की आवाज़ से डर कर भाग जाते हैं। कई बार यह सड़क पर दुर्घटनाओं का कारण भी बनते हैं। छोटे बछड़ों और बकरियों में तो यह डर भोजन न करने और बीमार पड़ने तक पहुँच जाता है। -
सड़क के आवारा जानवर:
जिनके पास छिपने की जगह नहीं होती, वे पटाखों की आवाज़ से कानों में तकलीफ, आँखों में जलन, जलने के घाव और धुएँ से सांस लेने में दिक्कत जैसी समस्याओं का सामना करते हैं।
धुएँ और प्रदूषण का प्रभाव:
पटाखों से निकलने वाला धुआँ सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं बल्कि जानवरों के लिए भी घातक है।
इसमें मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रेट्स, भारी धातुएँ और कार्बन कण जानवरों की साँसों के साथ शरीर में चले जाते हैं, जिससे उन्हें:
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साँस लेने में कठिनाई
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खाँसी और नाक से पानी बहना
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फेफड़ों में संक्रमण
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आँखों में जलन और पानी आना जैसी समस्याएँ होती हैं।
कई बार छोटे पक्षी और पालतू जानवर इतने धुएँ में घुटकर दम तोड़ देते हैं।
मानसिक तनाव और डर का असर:
जानवर शब्दों में अपना दर्द नहीं बता सकते, लेकिन उनके व्यवहार से यह साफ दिखता है।
पटाखों के दौरान कई जानवर कंपकंपाने, छिपने, भौंकने, काँपने या भाग जाने जैसी हरकतें करते हैं।
यह उनके मानसिक तनाव (stress) का संकेत होता है।
लगातार तेज आवाज़ें सुनने से उनमें भय (phobia) विकसित हो जाता है, जिससे बाद में भी किसी अचानक आवाज़ पर वे डर जाते हैं।
कुछ मामलों में डर के कारण जानवर खुद को चोट पहुँचा लेते हैं या सड़क दुर्घटना में मारे जाते हैं।
वन्यजीवों पर असर:
केवल पालतू या शहरी जानवर ही नहीं, पटाखों का असर जंगलों और ग्रामीण क्षेत्रों के वन्यजीवों पर भी पड़ता है।
तेज धमाकों से हिरण, बंदर, सियार, लोमड़ी, हाथी जैसे जानवर घबरा जाते हैं और अपने प्राकृतिक आवास से दूर भाग जाते हैं।
कई बार यह भगदड़ उनके झुंड से बिछड़ने या शिकारियों के हाथों मरने का कारण बनती है।
रात में शोरगुल से पक्षियों और कीटों की प्राकृतिक परागण प्रक्रिया (pollination) भी प्रभावित होती है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है।
कानूनी प्रावधान और जागरूकता:
भारत में ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम (Noise Pollution Control Rules) के तहत रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक पटाखे चलाना प्रतिबंधित है।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने कई बार पर्यावरण और पशु हित को ध्यान में रखते हुए “ग्रीन पटाखों” के उपयोग की सलाह दी है।
फिर भी, कानून से ज़्यादा ज़रूरत है जागरूकता और संवेदनशीलता की।
जब तक हम खुद नहीं समझेंगे कि इन आवाज़ों के पीछे कोई मौन पीड़ा है, तब तक बदलाव मुश्किल है।
हम क्या कर सकते हैं?
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पटाखों का इस्तेमाल कम करें:
त्योहार मनाएँ लेकिन बिना शोर और प्रदूषण के। दीये, सजावट, संगीत या मिठाइयों से भी उत्सव खूबसूरत बन सकता है। -
जानवरों को सुरक्षित जगह दें:
दीपावली या शादी जैसे दिनों में अपने पालतू जानवरों को घर के अंदर रखें। खिड़कियाँ बंद रखें और उन्हें शांत माहौल दें। -
सड़क के जानवरों की मदद करें:
डर के मारे भागते हुए जानवरों को चोट लग सकती है। यदि कोई घायल जानवर दिखे तो तुरंत एनजीओ या पशु चिकित्सक से संपर्क करें। -
ग्रीन पटाखों का प्रयोग करें:
यदि पटाखे चलाना ही है तो केवल पर्यावरण-अनुकूल “ग्रीन पटाखे” चुनें, जिनमें आवाज़ और धुआँ कम होता है। -
बच्चों को शिक्षित करें:
बच्चों को समझाएँ कि जानवर भी दर्द महसूस करते हैं। उन्हें यह सिखाएँ कि असली खुशी दूसरों को डराकर नहीं बल्कि प्यार देकर मिलती है।
संवेदना का दीया जलाएँ:
पटाखे कुछ पलों की खुशी देते हैं, लेकिन जानवरों के लिए यह घंटों या दिनों की पीड़ा बन जाते हैं।
हमारी छोटी-सी संवेदनशीलता उनके लिए राहत बन सकती है।
त्योहारों का असली अर्थ सिर्फ रोशनी या शोर नहीं, बल्कि करुणा और सौहार्द है।
इस बार दीपावली या कोई भी उत्सव मनाएँ, लेकिन इस तरह कि किसी भी जीव को भय या तकलीफ न हो।
क्योंकि जब तक धरती पर सभी जीव सुरक्षित नहीं, तब तक हमारी खुशियाँ अधूरी हैं।
दुनिया की असली रोशनी तब होती है जब हम किसी के डर को मिटाते हैं, न कि उसे बढ़ाते हैं।
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