कन्नड़ साहित्य के दिग्गज लेखक एस. एल. भैरप्पा का 94 वर्ष की आयु में निधन: भारतीय साहित्य जगत को 24 सितंबर 2025 का दिन हमेशा याद रहेगा। कन्नड़ साहित्य के महान उपन्यासकार, चिंतक और दार्शनिक एस. एल. भैरप्पा का 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने बेंगलुरु में अंतिम सांस ली। हृदय गति रुकने के कारण उनका निधन हुआ। उनके निधन के साथ ही भारतीय साहित्य ने एक ऐसा महान रचनाकार खो दिया है, जिसकी लेखनी ने न केवल कन्नड़ भाषा को समृद्ध किया बल्कि पूरे देश की साहित्यिक परंपरा को नई दृष्टि प्रदान की।

भैरप्पा का जीवन परिचय:
एस. एल. भैरप्पा का जन्म 20 अगस्त 1931 को मैसूर ज़िले के संतशिवर गाँव में हुआ। बचपन कठिनाइयों से भरा रहा। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन उन्होंने शिक्षा को अपना आधार बनाया और संघर्षों के बीच उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर और बाद में पीएचडी की डिग्री हासिल की। यही कारण है कि उनके उपन्यासों में गहन दार्शनिक दृष्टि और मानवीय मनोविज्ञान की गहराई दिखाई देती है।
साहित्यिक योगदान:
भैरप्पा ने कन्नड़ भाषा में 25 से अधिक उपन्यास लिखे, जिनका अनुवाद हिंदी, अंग्रेज़ी और कई अन्य भारतीय भाषाओं में हुआ। उनके उपन्यास न केवल लोकप्रिय हुए, बल्कि विचारों और विमर्शों का केंद्र भी बने।
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परवा – यह उपन्यास महाभारत की कथा को आधुनिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। इसमें उन्होंने महाभारत के पात्रों को मानवीय स्तर पर देखा और उनकी मानसिकता को समझने की कोशिश की।
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आवराणा – यह उपन्यास ऐतिहासिक तथ्यों और धार्मिक-सांस्कृतिक विमर्श के कारण चर्चित रहा। इसमें इतिहास और वर्तमान के बीच गहरे सवाल उठाए गए।
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सारथी – यह कृति आठवीं शताब्दी के भारत की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति को उजागर करती है।
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तात्कालिक (तंतु) – स्वतंत्रता के बाद भारत में आए सामाजिक-राजनीतिक बदलावों की गहरी झलक इस उपन्यास में मिलती है।
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धर्मश्री – उनका पहला उपन्यास जिसने उन्हें साहित्यिक जगत में पहचान दिलाई।
लेखन की शैली और विशेषताएँ:
भैरप्पा का लेखन यथार्थवादी, गहन और ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध था। वे किसी भी विषय को सतही तौर पर नहीं छूते थे, बल्कि उसके मूल तक जाते थे। उनके पात्र जीवन्त और वास्तविक लगते हैं। उनके उपन्यासों में समाज, धर्म, इतिहास और व्यक्ति के बीच की जटिलताओं का गहन विश्लेषण मिलता है।
उनकी खासियत यह थी कि वे विवादास्पद विषयों को भी बिना किसी डर या संकोच के उठाते थे। यही कारण है कि कई बार उनके उपन्यासों को लेकर विरोध भी हुआ, लेकिन पाठकों ने हमेशा उनकी ईमानदारी और गहराई की सराहना की।
सम्मान और पुरस्कार:
एस. एल. भैरप्पा को साहित्य में योगदान के लिए अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए।
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2010 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
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2012 में उन्हें सरस्वती सम्मान मिला।
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2016 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया।
इसके अलावा भी उन्हें कर्नाटक राज्य और अन्य संस्थाओं से अनेक बार सम्मानित किया गया।
आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा:
भैरप्पा केवल एक साहित्यकार ही नहीं थे, बल्कि एक मार्गदर्शक भी थे। उनके उपन्यास आज की पीढ़ी को यह सिखाते हैं कि साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाना और सत्य की खोज करना है। उनकी रचनाएँ पाठकों को सोचने पर मजबूर करती हैं और इतिहास, धर्म तथा राजनीति जैसे विषयों पर नए दृष्टिकोण देती हैं।
निधन और शोक की लहर:
उनके निधन की खबर से साहित्यिक जगत, पाठकों और उनके प्रशंसकों में गहरा शोक है। प्रधानमंत्री, कर्नाटक सरकार के नेताओं और देशभर के साहित्यकारों ने उनके निधन पर संवेदना प्रकट की। लोगों का कहना है कि भैरप्पा का जाना भारतीय साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है।
एस. एल. भैरप्पा का जीवन और लेखन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने अपने उपन्यासों के माध्यम से भारतीय समाज, इतिहास और मानवीय मनोविज्ञान की गहराइयों को उजागर किया। उनका निधन साहित्य के लिए एक युग का अंत है, लेकिन उनकी रचनाएँ आने वाले समय में भी लोगों को प्रेरित करती रहेंगी।
वे हमें यह संदेश देकर गए कि साहित्य का असली दायित्व समाज और इतिहास को समझना तथा सत्य की खोज करना है। उनकी स्मृतियाँ और लेखन हमेशा जीवित रहेंगे।
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